विक्रमशिला सेतु हादसा: डॉ. प्रतिभा सिंह ने किया ईश्वर का धन्यवाद; स्लैब गिरने से चंद मिनट पहले पैदल पार किया पुल

न्यूज स्कैन ब्यूरो, भागलपुर
रविवार की रात जब विक्रमशिला सेतु का 34 मीटर लंबा स्लैब गंगा में समा रहा था, ठीक उसी वक्त भागलपुर की प्रसिद्ध गायनेकोलॉजिस्ट डॉ. प्रतिभा सिंह उस खौफनाक मंजर के बीच मौजूद थीं। उन्होंने बताया कि किस तरह एक जादुई बचाव ने उनकी और उनके साथ मौजूद पटना की प्रसिद्ध डॉक्टर आभा रानी सिन्हा की जान बचाई।

3 मई: यादों और हादसों का संयोग
डॉ. प्रतिभा सिंह के लिए 3 मई की तारीख हमेशा से भावुक रही है। उन्होंने साझा किया कि 3 मई 1985 को उन्होंने अपनी माँ को खोया था। नियति का खेल देखिये कि 3 मई 2026 की यह तारीख भी उनके जीवन में कभी न भूलने वाला अध्याय बन गई। सुबह उन्होंने ISOPARB भागलपुर चैप्टर के अध्यक्ष पद की शपथ ली और शाम को कटिहार में एक चिकित्सा कार्यक्रम (FOGSI REACH) में शामिल होने चली गईं।

आधी रात का वो ‘अवास्तविक’ अनुभव
रात करीब 12:30 बजे जब वे कटिहार से भागलपुर लौट रही थीं, तभी उनकी गाड़ी उस पुल पर पहुँच गई जहाँ का स्लैब धँसना शुरू हो चुका था। डॉ. प्रतिभा ने बताया कि स्थिति की गंभीरता को देखते हुए उन्होंने और डॉ. आभा रानी सिन्हा ने अद्भुत साहस दिखाया। वे तुरंत गाड़ी से नीचे उतरीं और जान जोखिम में डालकर पैदल ही धँसते हुए पुल को पार कर दूसरी ओर पहुँचीं।

उनके पुल पार करने के महज कुछ ही मिनटों बाद वह भारी-भरकम स्लैब पूरी तरह गंगा में समा गया। डॉ. प्रतिभा कहती हैं, “आधी रात को उस सुनसान और खतरनाक पुल पर पैदल चलना एक अवास्तविक अनुभव था, ऐसा लगा जैसे माँ का आशीर्वाद मेरे साथ था”।

डॉ. संजय सिंह की प्रतिक्रिया: “असंभव को संभव कर दिखाया”
डॉ. प्रतिभा सिंह के पति और प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. संजय सिंह ने इस घटना पर गहरी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि स्थिति अत्यंत गंभीर थी और डॉ. प्रतिभा की गाड़ी उसी धँसते हुए स्लैब पर फँस गई थी। डॉ. संजय ने उनकी सूझबूझ की तारीफ करते हुए कहा कि दोनों महिला डॉक्टरों ने समय रहते साहसिक निर्णय लिया, जिससे उनकी जान बच गई।

उन्होंने चुटकी लेते हुए यह भी कहा कि वे कटिहार में ‘REACH’ कार्यक्रम में गई थीं और सच में उन्होंने ‘Unreachable’ (जहाँ पहुँचना असंभव हो) को ‘Reach’ कर दिखाया।

यह घटना न केवल विक्रमशिला सेतु की जर्जर स्थिति पर मुहर लगाती है, बल्कि यह भी बताती है कि प्रशासन की ‘देर रात’ वाली सक्रियता से पहले कई जिंदगियां मौत के साये में खड़ी थीं।