विक्रमशिला सेतु ‘महा-हादसा’: जब दिन के उजाले में जनता चिल्लाती रही और प्रशासन रात के अंधेरे का इंतजार करता रहा

भागलपुर की लाइफलाइन कहा जाने वाला 4.7 किमी लंबा विक्रमशिला सेतु रविवार देर रात एक बड़े प्रशासनिक अपराध की भेंट चढ़ गया। पुल का 34 मीटर लंबा स्लैब गंगा की लहरों में समा गया, जिससे न केवल सीमांचल बल्कि उत्तर और दक्षिण बिहार के 16 जिलों की कनेक्टिविटी पूरी तरह ध्वस्त हो गई है। यह हादसा तकनीकी खराबी से ज्यादा एक ‘सिस्टम’ की आपराधिक उदासीनता का परिणाम है। जनता दिन में ज्वाइंट में आ रहे गैप को देख रही थी और खतरे को समझ रही थी। प्रशासन को देर रात पता चला।

न्यूज स्कैन ब्यूरो, भागलपुर
प्रशासनिक ‘अंधापन’ को समझिए। दिन में आम लोग वीडियो के माध्यम से खतरे को बता रहे थे। वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हैं। प्रशासन और सरकारी नींद में मस्त। इस हादसे का सबसे शर्मनाक पहलू वह विरोधाभास है, जो आम नागरिक और प्रशासन के बीच दिखा। सोशल मीडिया पर दिन के उजाले में ही आम लोगों द्वारा बनाए गए वीडियो वायरल हो रहे थे, जिनमें पुल का हिस्सा साफ तौर पर धंसता हुआ दिख रहा था। पुल के विजुअल्स दिन में ही खतरे का शोर मचा रहे थे, लेकिन प्रशासनिक तंत्र की नींद रात के 12:35 बजे टूटी। तब जाकर गाड़ियों को रोका गया। सवाल यह है कि जब आम आदमी को दिन में खतरा दिख रहा था, तो विभाग के तैनात पहरेदार और इंजीनियर क्या कर रहे थे? जहाँ प्रशासन इसे ‘सजगता’ बताकर अपनी पीठ थपथपा रहा है कि बड़ा हादसा टल गया, वहीं हकीकत यह है कि अगर जनता ने शोर न मचाया होता, तो शायद यह ‘सजगता’ भी न दिखती।

भ्रष्टाचार की क्रोनोलॉजी: मरम्मत के नाम पर सिर्फ ‘पेंट-पॉलिश’?
विक्रमशिला सेतु की बदहाली का रिकॉर्ड महीनों से सुर्खियाँ बटोर रहा था, जिसे जानबूझकर नजरअंदाज किया गया। महज 30 दिन पहले ही यह खबर आई थी कि पिलर संख्या 17, 18 और 19 की प्रोटेक्शन वॉल तेज बहाव में ध्वस्त हो गई है। उस वक्त भी चेतावनी दी गई थी कि इसका सीधा असर पिलर्स पर पड़ेगा। मीडिया में ये खबरें आई कि 60 में से 22 चेंबर धंस चुके हैं और एक्सपेंशन जॉइंट्स का गैप 1-2 इंच से बढ़कर 6 इंच तक पहुँच गया है। पिछले 10 साल में तीन बार मरम्मत हुई, और ताजा ‘रिपेयर वर्क’ मार्च 2026 में ही संपन्न हुआ था। सवाल यह है कि करोड़ों खर्च होने के महज दो महीने बाद ही पुल का 34 मीटर स्लैब गंगा में कैसे समा गया?

समय से क्यों नहीं हुई मरम्मत, कैसे फिट बताया जाता रहा
ये सवाल सबसे गंभीर है कि मरम्मत की प्रक्रिया इतनी लंबी क्यों रही। अब कहा जा रहा है कि नए सिरे से टेंडर होगा। रविवार देर रात पुल के 133 नंबर पाये के पास स्लैब टूटकर गंगा में समा गया। आवागमन पूरी तरह ठप हो गया। 4.7 किलोमीटर लंबे पुल के मेंटेनेंस को लेकर मंथन चल रहा था। अधिकारियों और इंजीनियरों की टीम खर्च का आकलन और सर्वे कर रही थी। पथ निर्माण विघार ने वित्त विभाग से मंतव्य और तकनीकी स्वीकृति मांगी थी ताकि मरम्मत का काम शुरु कराया जा सके। पथ निर्माण विभाग के सचिव पंकज कुमार पाल ने भी हाल में ही निरीक्षण किया था। आलम यह है कि 2016 में बड़े पैमाने पर मरम्मत कराया गया था। पिलरों की बियरिंग बदली गई थी और कार्बन प्लेट लगाकर दरातों को ठीक किया गया था। मुंबई की एक एजेंसी को मेंटेनेंस का जिम्मा भी दिया गया था। लेकिन 2020 के बाद कंपनी ने काम बंद कर दिया। इसके बाद रखरखाव तक नहीं हो रहा था। सिर्फ बालू-गिट्टी हटाना और दरारों को सीमेंट से ढंकने का काम हो रहा था।

सुलगते सवाल और राजनीतिक घेराबंदी
पूर्व में पथ निर्माण विभाग ने एक एग्जीक्यूटिव इंजीनियर को सस्पेंड कर अपना पल्ला झाड़ लिया था। लेकिन उन बड़े चेहरों और ठेकेदारों का क्या, जिन्होंने पुल को ‘सुरक्षित’ होने का प्रमाण पत्र दिया था? विपक्ष का हमला: नेता प्रतिपक्ष ने सरकार को घेरते हुए कहा है कि महीने भर पहले आगाह करने के बावजूद भ्रष्ट व्यवस्था को बचाने के लिए सरकार पल्ला झाड़ती रही। महीनों क्या सालों पत्राचार होना और ऊपर से रिस्पांस नहीं आना क्या दिखाता है। क्या व्यवस्था इतनी बेशर्म और असंवेदनशील है?