देवाधिदेव आदिनाथ भगवान का जन्म व तप कल्याणक महोत्सव कल, चंपापुर सहित शहर के जिनालयों में विशेष आयोजन

न्यूज स्कैन रिपाेर्टर, भागलपुर
जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर देवाधिदेव 1008 श्री ऋषभनाथ भगवान (आदिनाथ) का जन्म कल्याणक एवं तप कल्याणक महोत्सव हर्षोल्लास और श्रद्धा के साथ गुरुवार को मनाया जाएगा। इस अवसर पर श्री चंपापुर सिद्ध क्षेत्र सहित भागलपुर के सभी जिनालयों में विशेष पूजा-अर्चना, अभिषेक और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
जैन समाज के अध्यक्ष विजय जैन एवं महामंत्री पदम जैन ने बताया कि इस वर्ष भगवान ऋषभनाथ का जन्म कल्याणक उपाध्याय श्री विज्ञानंदी जी मुनिराज के संघ सानिध्य में बड़े ही उत्साह और भक्ति भाव के साथ मनाया जाएगा। श्रद्धालु प्रातःकालीन अभिषेक, पूजन, प्रवचन और धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेंगे।

मानव सभ्यता के प्रथम प्रवर्तक माने जाते हैं ऋषभदेव

जैन परंपरा के अनुसार भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ) जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर और प्रवर्तक हैं। उनका जन्म अयोध्या में इक्ष्वाकु वंश के राजा नाभिराय और महारानी मरूदेवी के घर हुआ था। वे अवसर्पिणी काल के प्रथम राजा और प्रथम दिगंबर मुनि माने जाते हैं।
धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान ऋषभदेव ने मानव समाज को सभ्य और संगठित जीवन की दिशा दी। उन्होंने समाज को असि (रक्षा), मसि (लेखन), कृषि (खेती), विद्या, वाणिज्य और शिल्प सहित षट्कर्मों की शिक्षा दी तथा पुरुषों की 72 और स्त्रियों की 64 कलाओं का ज्ञान प्रदान किया।

भरत-बाहुबली सहित 100 पुत्रों के पिता

भगवान ऋषभदेव के 100 पुत्र थे, जिनमें भरत चक्रवर्ती और बाहुबली प्रमुख माने जाते हैं। उनकी दो पुत्रियां ब्राह्मी और सुंदरी थीं, जिन्हें उन्होंने क्रमशः ब्राह्मी लिपि और अंकगणित की शिक्षा दी। जैन परंपरा के अनुसार ब्राह्मी लिपि का नाम भी ब्राह्मी के नाम पर ही पड़ा।

नीलांजना की मृत्यु से हुआ वैराग्य

राजदरबार में नीलांजना नामक अप्सरा के नृत्य के दौरान अचानक हुई मृत्यु को देखकर भगवान ऋषभदेव को संसार की नश्वरता का बोध हुआ। इसके बाद उन्होंने अपना राजपाट त्यागकर वैराग्य धारण किया और तपस्या के मार्ग पर चल पड़े।

कठोर तपस्या के बाद प्राप्त किया केवलज्ञान

दीक्षा के बाद भगवान ऋषभदेव ने कठोर तपस्या की। एक वर्ष तक उपवास के बाद अक्षय तृतीया के दिन उन्होंने इक्षु रस से पारणा किया। अंततः उन्होंने घातिया कर्मों का नाश कर कैलाश पर्वत से मोक्ष (निर्वाण) प्राप्त किया।

जैन धर्म के आदिप्रवर्तक

मंत्री अशोक पाटनी और प्रकाश बड़जात्या ने बताया कि भगवान ऋषभदेव ने ही सर्वप्रथम षट्कर्म, बहत्तर कलाएं, ब्राह्मी लिपि, अंकगणित, विवाह संस्था और वर्ण व्यवस्था जैसी सामाजिक व्यवस्थाओं की स्थापना की थी। इसी कारण उन्हें जैन धर्म का आदिप्रवर्तक माना जाता है।
वहीं चंपापुर सिद्ध क्षेत्र के मंत्री सुनील जैन ने कहा कि भगवान ऋषभदेव का जन्म कल्याणक केवल जैन समाज के लिए ही नहीं बल्कि पूरे विश्व के लिए कल्याणकारी और सर्वमंगलकारी है।
समाज के कर्मठ सदस्य एवं सिद्ध क्षेत्र कमेटी सदस्य सुमित जैन ने बताया कि यह महोत्सव श्री चंपापुर सिद्ध क्षेत्र सहित भागलपुर के सभी जैन मंदिरों तथा देश-विदेश के जिनालयों में श्रद्धा और भक्ति के साथ धूमधाम से मनाया जाएगा।