बिहार की राजनीति में इन दिनों मर्यादा और जुबानी जंग के बीच की लकीर धुंधली पड़ती जा रही है। पूर्णिया सांसद पप्पू यादव द्वारा राजनीति में सक्रिय महिलाओं को लेकर दी गई विवादास्पद टिप्पणी ने अब एक बड़े ‘जेंडर वॉर’ का रूप ले लिया है। इस मुद्दे पर बीजेपी विधायक और प्रख्यात लोक गायिका मैथिली ठाकुर ने बेहद कड़ा रुख अपनाते हुए इसे सार्वजनिक विमर्श का “निम्नतम स्तर” करार दिया है।
न्यूज स्कैन ब्यूरो, गया
मैथिली ठाकुर ने गया में मीडिया से मुखातिब होते हुए सांसद के उस बयान की धज्जियां उड़ाईं, जिसमें उन्होंने कहा था कि ’90 प्रतिशत महिलाएं नेताओं के बेडरूम के रास्ते राजनीति में आती हैं।’ मैथिली ने इसे केवल एक बयान नहीं, बल्कि उन हजारों महिलाओं के संघर्ष पर आघात बताया है जो समाज की बेड़ियाँ तोड़कर आगे बढ़ी हैं।
भरोसे का सवाल: मैथिली ने अपने निजी जीवन का उदाहरण देते हुए कहा कि उनके पिता ने उन पर भरोसा करके ही राजनीति में भेजा। ऐसे बयान उन लाखों पिताओं के भरोसे को तोड़ते हैं जो अपनी बेटियों को सार्वजनिक जीवन में भेजने का साहस जुटाते हैं।
अक्षय अपराध: विधायक ने स्पष्ट किया कि यह टिप्पणी इतनी अभद्र है कि इसके लिए ‘माफी’ भी पर्याप्त नहीं होगी। उन्होंने इसे महिलाओं की गरिमा पर किया गया एक स्थायी आघात बताया।
विपक्ष की घेराबंदी: बेनकाब होती मानसिकता?
मैथिली ठाकुर ने इस विवाद के जरिए विपक्षी गठबंधन को भी कटघरे में खड़ा किया। उन्होंने आरोप लगाया कि एक तरफ विपक्ष महिला सशक्तिकरण की बात करता है, तो दूसरी तरफ उनके समर्थक सांसद महिलाओं के चरित्र पर लांछन लगाते हैं। उन्होंने कहा, महिला आरक्षण विधेयक का विरोध करने वालों की मानसिकता आज पप्पू यादव के बयानों के जरिए सबके सामने है। यह महिलाओं के प्रति उनकी गहरी असंवेदनशीलता का प्रमाण है।
पप्पू यादव की सफाई: ‘तथ्य’ या ‘कुतर्क’?
चौतरफा घिरे सांसद पप्पू यादव ने अपने बयान पर माफी मांगने के बजाय उसे यह कहकर सही ठहराया कि ’90 प्रतिशत महिलाएं उनके समर्थन में हैं।’ उन्होंने अपनी टिप्पणी को एक ‘जनरल ऑब्जर्वेशन’ बताया, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे अपनी गलती को ढंकने का एक कुतर्क माना जा रहा है। राज्य महिला आयोग द्वारा नोटिस भेजे जाने के बावजूद सांसद के तेवर नरम नहीं पड़ रहे हैं।
राजनीति में गरिमा की दरकार
श्रेयसी सिंह, संगीता कुमारी और अनामिका सिंह पटेल जैसी प्रमुख महिला नेताओं की गोलबंदी यह संकेत देती है कि अब बिहार की राजनीति में महिलाओं के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणियां बर्दाश्त नहीं की जाएंगी। यह विवाद केवल दो नेताओं के बीच का नहीं, बल्कि इस सवाल का है कि क्या राजनीति में महिलाओं की सफलता को हमेशा पुरुषवादी चश्मे से ही देखा जाएगा?
































