थाने के चक्कर खत्म, अब घर बैठे ई-FIR… बिहार में साइबर अपराधियों के ‘कंट्रोल-ऑल्ट-डिलीट’ की पूरी तैयारी

भारत के साइबर क्राइम के नक्शे पर कभी जामताड़ा का नाम सबसे ऊपर होता था, लेकिन अब इस ‘डिजिटल डकैती’ के वायरस ने बिहार को गहराई तक जकड़ लिया है। देश के टॉप-10 साइबर क्राइम हॉटस्पॉट में बिहार के तीन जिले (नवादा दूसरे, नालंदा चौथे और पटना सातवें स्थान पर) शामिल हो चुके हैं। साइबर अपराधियों के इस बढ़ते दुस्साहस को कुचलने के लिए बिहार सरकार और पुलिस महकमे ने एक ऐसा ‘मास्टर प्लान’ तैयार किया है, जो न सिर्फ अपराधियों की कमर तोड़ेगा, बल्कि साइबर ठगी के शिकार आम आदमी को एक बड़ी राहत देगा।

न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
मुख्य सचिव और डीजीपी की उच्चस्तरीय बैठक में लिए गए फैसले इस बात का संकेत हैं कि अब सिस्टम ‘रिएक्टिव’ की जगह ‘प्रोएक्टिव’ हो रहा है। आइए समझते हैं कि कल तक इस व्यवस्था के न होने से आम आदमी को क्या झेलना पड़ता था और इस नई व्यवस्था के लागू होने से क्या बदलाव आएंगे।

कल तक की पीड़ा : जब सिस्टम की सुस्ती का फायदा उठाते थे साइबर ठग

अब तक साइबर ठगी का शिकार हुआ व्यक्ति ठगों से ज्यादा सिस्टम की जटिलताओं से हार जाता था। पुरानी व्यवस्था में निम्नलिखित भारी कमियां थीं :-

थाने-थाने भटकना और ‘सीमा’ का विवाद: अगर किसी के खाते से पैसे उड़ गए, तो वह बदहवास होकर अपने नजदीकी थाने दौड़ता था। वहां अक्सर पुलिस क्षेत्राधिकार का हवाला देकर उसे साइबर सेल या दूसरे थाने भेज देती थी। इस भागदौड़ में वो गोल्डन ऑवर बीत जाते थे, जिसमें पैसे को रोका जा सकता था।

पैसों की रिकवरी थी एक सपना : ठग पलक झपकते ही पैसे को कई अलग-अलग म्यूल अकाउंट्स में ट्रांसफर कर देते थे। जब तक पुलिस जांच शुरू करती और बैंक को खाता फ्रीज करने को लिखती, पैसा एटीएम या चेक के जरिए निकाल लिया जाता था।

कागजी कार्रवाई का बोझ : एफआईआर दर्ज करवाना एक लंबी और थकाऊ प्रक्रिया थी।

फर्जी सिम का मायाजाल : अपराधी फर्जी दस्तावेजों पर लिए गए सिम का धड़ल्ले से इस्तेमाल करते थे। घटना के तुरंत बाद सिम तोड़कर फेंक दिया जाता था और अपराधी ट्रेसलेस हो जाते थे।

कल की उम्मीद : नई व्यवस्था से कैसे पलटेगा गेम?

राज्य सरकार द्वारा उठाए गए नए कदम सीधे उन दुखती रगों पर चोट कर रहे हैं, जिनका फायदा उठाकर साइबर ठग पनप रहे थे। नई व्यवस्था से निम्नलिखित सुधार सुनिश्चित होंगे :-

ई-जीरो एफआईआर (E-Zero FIR) – क्षेत्राधिकार का झंझट खत्म: अब किसी भी पीड़ित को थाने के चक्कर काटने की जरूरत नहीं है। अगर एक लाख या उससे अधिक की ठगी होती है, तो राष्ट्रीय हेल्पलाइन 1930 पर कॉल करते ही शिकायत खुद-ब-खुद ‘ई-जीरो एफआईआर’ में बदल जाएगी। इससे तत्काल जांच शुरू हो सकेगी।

डिजिटल कॉपी की होम डिलीवरी: पीड़ित को थाने जाकर एफआईआर की कॉपी मांगने की जरूरत नहीं होगी। इसकी डिजिटल कॉपी तुरंत ईमेल या व्हाट्सएप पर मिल जाएगी।

डीएम की सख्ती और तुरंत अकाउंट फ्रीज: अब ठगी की राशि वाले खातों को फ्रीज कराने की प्रक्रिया तेज होगी। डीएम और एसपी खुद इसकी निगरानी करेंगे। म्यूल खातों (Mule Accounts) को तुरंत ब्लॉक किया जाएगा ताकि अपराधी पैसा कैश न करा सकें।

पैसा वापसी की तेज प्रक्रिया: पहले पैसा होल्ड होने के बाद भी पीड़ित को वापस मिलने में महीनों लग जाते थे। अब इस प्रक्रिया में तेजी लाई जा रही है। हाल ही में 5,642 मामलों में 224.53 लाख रुपये की रिकवरी के आदेश इसका जीता-जागता प्रमाण हैं।

जड़ पर प्रहार – फर्जी सिम विक्रेताओं पर एक्शन: साइबर क्राइम की सबसे बड़ी लाइफलाइन फर्जी सिम है। अब फर्जी दस्तावेजों पर सिम बेचने वाले एजेंटों और उनके गैंग के खिलाफ विशेष अभियान चलेगा। जब हथियार यानी सिम ही नहीं मिलेगा, तो डिजिटल डकैती करना मुश्किल हो जाएगा।

बिहार सरकार का यह कदम सिर्फ पुलिसिंग का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह आम जनता के उस भरोसे को वापस जीतने की कवायद है, जो साइबर ठगों के सामने अक्सर टूट जाता था। 6,251 म्यूल खातों का सत्यापन, 702 लोगों पर कार्रवाई और 507 की गिरफ्तारी बताती है कि ‘ऑपरेशन साइबर प्रहार’ शुरू हो चुका है। जब 1930 हेल्पलाइन पुलिस स्टेशन का काम करेगी और बैंक खाते तुरंत फ्रीज होंगे, तब साइबर अपराधियों के लिए बिहार में डिजिटल सट्टेबाजी करना किसी बुरे सपने से कम नहीं होगा।