बिहार में मानव तस्करी के खिलाफ सरकार का ‘जीरो टॉलरेंस’: 18 जिले ‘हाई रिस्क’ पर, जानें बच्चों की रिकवरी और पलायन रोकने का पूरा मास्टरप्लान

बिहार में बच्चों की गुमशुदगी और मानव तस्करी एक बेहद गंभीर चिंता का विषय बन गया है। राजधानी पटना के ज्ञान भवन में गृह विभाग की ओर से आयोजित एक दिवसीय ‘पूर्वी क्षेत्रीय सम्मेलन’ में इस बात का खुलासा हुआ है कि पटना सहित राज्य के 18 जिले मानव तस्करी के दृष्टिकोण से अति संवेदनशील यानी हाई रिस्क श्रेणी में चिह्नित किए गए हैं। इन जिलों में पूर्वी चंपारण, पश्चिमी चंपारण, सारण, सिवान, किशनगंज, अररिया, पूर्णिया, कटिहार, गया, नालंदा, पटना, वैशाली, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी, मधुबनी, दरभंगा, मुंगेर और बेगूसराय शामिल हैं। चिंता की बात यह है कि मानव तस्करी के मामले में बिहार अब सिर्फ एक सोर्स नहीं रह गया है, बल्कि यह डेस्टिनेशन और ट्रांजिट के रूप में भी बुरी तरह प्रभावित है।

न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
सम्मेलन में यह भी सामने आया कि असम, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, झारखंड, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ और नेपाल से पीड़ितों की तस्करी के मामले बिहार में चिह्नित हुए हैं, जबकि बिहार से महाराष्ट्र, राजस्थान, हरियाणा, गुजरात, दिल्ली, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों तक मानव तस्करी के प्रकरण सामने आए हैं। इस गंभीर स्थिति से निपटने के लिए राज्य सरकार ने जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई है। कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति ए. अमानुल्लाह और पटना हाईकोर्ट के न्यायाधीश राजीव रंजन प्रसाद ने इस विषय पर गहरी चिंता व्यक्त की। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि तस्करों के खिलाफ त्वरित और कठोर कार्रवाई सरकार की प्राथमिकता है। वहीं, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति अमानुल्लाह ने इस दर्द को रेखांकित करते हुए कहा कि तस्करी से सिर्फ एक इंसान नहीं, बल्कि पूरा परिवार प्रभावित होता है और जिंदगी भर उसके लौट आने का इंतजार आंखों में होता है, इसलिए पुलिस और न्यायिक व्यवस्था को इस दर्द को समझना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित समिति के तत्वावधान में आयोजित इस सम्मेलन में तस्करी के मामलों के लिए मानक संचालन प्रक्रिया तैयार करने पर भी जोर दिया गया।

पीड़ितों की मदद और उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए सरकार कई मोर्चों पर काम कर रही है। गुमशुदगी के मामलों में पुलिस को तुरंत एक्टिव होकर कार्रवाई करने के सख्त निर्देश दिए गए हैं, जिसके सकारात्मक परिणाम भी दिख रहे हैं। राज्य में स्पेशल जुवेनाइल पुलिस यूनिट का गठन किया गया है, जिसकी मदद से अब तक 1,200 से अधिक लापता बच्चों की रिकवरी की जा चुकी है। इसके अलावा, राज्य सरकार ‘नया सवेरा 3.0’ अभियान चला रही है। इसके तहत मानव तस्करी के विरुद्ध जागरूकता, रोकथाम और बचाव के साथ-साथ पीड़ितों के पुनर्वास को अधिक प्रभावी बनाया जा रहा है। सरकार का प्रयास है कि तस्करी से मुक्त कराए गए प्रत्येक व्यक्ति को केवल फौरी राहत ही न मिले, बल्कि उन्हें कौशल विकास, रोजगार और सम्मान के साथ आत्मनिर्भर जीवन जीने का अवसर भी प्राप्त हो।

मानव तस्करी की रोकथाम का एक बड़ा और महत्वपूर्ण पहलू रोजगार के लिए होने वाला पलायन है। सरकार का मानना है कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के सुरक्षित और वैध अवसर उपलब्ध कराकर तस्करी के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है। मुख्यमंत्री ने बताया कि राज्य में औद्योगिक निवेश बढ़ाने के लिए स्टील प्लांट और न्यूक्लियर प्लांट आदि लगाने के प्रस्ताव पर काम हो रहा है, जिससे पलायन में और कमी आएगी। इसके साथ ही, कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए उत्तर बिहार में बाढ़ की समस्या को कम करने और सिंचाई की सुविधाओं के विस्तार पर भी जोर दिया जा रहा है। बड़ी नदियों जैसे गंगा, गंडक और कोसी को जोड़ने और जल संसाधनों के बेहतर प्रबंधन की दिशा में महत्वपूर्ण योजनाएं तैयार की जा रही हैं। इसके अलावा, आम लोगों की शिकायतों के 30 दिनों में निष्पादन के लिए ‘सहयोग शिविर’ का आयोजन भी किया जा रहा है, ताकि प्रशासन और जनता के बीच सीधा संवाद स्थापित हो सके।