बिहार की सियासत और प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक ही बयान सबसे ज्यादा गूंज रहा है, “भ्रष्टाचार करने वाला कोई भी हो, सीधे बेउर जेल जाएगा।” मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने ‘बिहार सतर्कता जागरूकता दिवस’ के मौके पर ज्ञान भवन से न केवल भ्रष्टाचारियों को खुली चेतावनी दी, बल्कि राज्य के पूरे एंटी-करप्शन ढांचे को बदलने का एक बड़ा खाका भी सामने रख दिया है।
न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने भ्रष्टाचार मुक्त बिहार के लिए ‘ट्रिपल टी’ (Transparency, Technology, Trust) का मंत्र दिया है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या यह महज एक राजनीतिक ‘ऐलान’ है या बिहार में वाकई नौकरशाही और सफेदपोशों के गठजोड़ पर नकेल कसने की कोई गंभीर तैयारी? आइए, इस घोषणापत्र के तीन सबसे बड़े प्रशासनिक और राजनीतिक पहलुओं का विश्लेषण करते हैं।
विजिलेंस का विकेंद्रीकरण: प्रमंडल से लेकर अनुमंडल तक जाल
अब तक बिहार में निगरानी (Vigilance) की अदालतें और मुख्य चौकसी पटना केंद्रित रही हैं। लेकिन सरकार के नए प्लान के तहत राज्य के सभी 9 प्रमंडलों में विशेष निगरानी अदालतें (Special Vigilance Courts) खुलेंगी ताकि मुकदमों का त्वरित निपटारा हो सके। हर जिले में निगरानी थाना और सभी अनुमंडलों में निगरानी ओपी बनाई जाएगी।
यह कदम जमीनी स्तर पर भ्रष्टाचार की शिकायत और जांच को आसान बनाएगा। जब जिला और अनुमंडल स्तर पर ही निगरानी की टीमें बैठेंगी, तो प्रखंड स्तर के अफसरों और बिचौलियों में एक खौफ पैदा होगा। हालांकि, इसके लिए बड़े पैमाने पर मैनपावर और पुलिस बल की जरूरत होगी, जो वर्तमान में एक बड़ी चुनौती है।
‘शॉर्टकट से अमीर’ बनने वालों पर चोट: स्कूल चलेंगे, संपत्ति जब्त होगी
मुख्यमंत्री ने साफ कहा है कि जो भी गलत तरीके से या ‘शॉर्टकट’ से अमीर बनने की कोशिश करेगा, उसकी जगह जेल में होगी, चाहे वह मंत्री हो, विधायक हो या शीर्ष स्तर का अधिकारी। इसमें सबसे दिलचस्प घोषणा यह है कि भ्रष्टाचारियों को चिह्नित कर उनके जब्त किए गए परिसरों में सरकारी विद्यालय खोले जाएंगे।
भ्रष्टाचारियों की संपत्ति जब्त कर स्कूल खोलना एक बेहतरीन ‘सिम्बॉलिक’ और मनोवैज्ञानिक कदम है। नीतीश कुमार के कार्यकाल में भी कुछ ऐसे प्रयास हुए थे। अगर सम्राट चौधरी इसे पूरी सख्ती से लागू करते हैं, तो यह समाज में एक बड़ा संदेश देगा कि जनता का पैसा लूटने वालों की संपत्ति आखिरकार जनता के ही काम आएगी।
गवाहों को सुरक्षा और खर्च: जांच एजेंसियों की स्वायत्तता पर जोर
अक्सर देखा जाता है कि रसूखदार भ्रष्टाचारियों के खिलाफ गवाह मुकर जाते हैं या डर से कोर्ट नहीं जाते। मुख्यमंत्री ने घोषणा की है कि आर्थिक अपराध और भ्रष्टाचार के मामलों में सरकारी गवाहों को आने-जाने का खर्च सरकार देगी।
इसके साथ ही, उन्होंने बिहार की तीन सक्षम जांच एजेंसियों, निगरानी अन्वेषण ब्यूरो (VBU), विशेष निगरानी इकाई (SVU), और आर्थिक अपराध इकाई (EOU) , को सीधे और स्वतंत्र कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। मुख्यमंत्री का यह बयान भी बेहद अहम है कि हमारी एजेंसियां इतनी मजबूत हों कि विशेष परिस्थितियों में ही सीबीआई या ईडी की मदद की जरूरत पड़े, यानी केंद्रीय एजेंसियों पर निर्भरता खत्म हो।
नीयत साफ, पर ‘सिस्टम’ से लड़ना असली चुनौती
बिहार जैसे राज्य में, जहां विकास योजनाओं में पीसी कमीशनखोरी और टेंडर फिक्सिंग की शिकायतें आम रहती हैं, वहां मुख्यमंत्री का यह कड़ा रुख स्वागत योग्य है। ‘ट्रिपल टी’ (पारदर्शिता, तकनीक और विश्वास) का फॉर्मूला कागजों पर बेहद मजबूत है।
लेकिन असल परीक्षा जमीन पर होगी। क्या विजिलेंस ब्यूरो बिना किसी राजनीतिक दबाव के सचमुच “मंत्रियों और विधायकों” पर हाथ डाल पाएगा? क्या अनुमंडल स्तर तक बनने वाले निगरानी ओपी केवल फाइलों के ढेर बनकर नहीं रह जाएंगे? मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने एक बड़ी लकीर खींच दी है, अब देखना यह है कि बिहार का पुराना ‘प्रशासनिक सिस्टम’ इस नई रफ्तार का साथ दे पाता है या नहीं।
































