आज 15 अगस्त 2026 को देश अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। इस पावन अवसर पर पूर्णिया के आनंद हॉस्पिटल में आयोजित ध्वजारोहण समारोह में प्रख्यात चिकित्सक डॉ. केएस आनंद ने राष्ट्र निर्माण में समाज के हर वर्ग, विशेषकर चिकित्सक समुदाय की भूमिका पर गहराई से अपनी बात रखी। उन्होंने युवा डॉक्टरों और छात्रों को उनके असली कर्तव्यों का स्मरण कराया। ‘द न्यूज स्कैन’ के पाठकों के लिए प्रस्तुत है डॉ. आनंद के ही शब्दों में उनके प्रेरक विचार
आज जब इस पावन सुबह में हमारे सिर के ऊपर तिरंगा लहराता है, तो मेरा मन स्वतः ही उन अनगिनत ज्ञात-अज्ञात वीरों के सम्मान में झुक जाता है, जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर हमारे आज को सुरक्षित किया। यह आजादी हमें किसी ने उपहार में नहीं दी है; इसके पीछे जेल की अंधेरी कोठरियां, फांसी के फंदे और वो सीने रहे हैं जिन्होंने हंसते-हंसते गोलियां खाईं। उनके लिए स्वयं से हमेशा बड़ा यह राष्ट्र था।
“तिरंगा केवल कपड़ा नहीं, करोड़ों सपनों की उड़ान है; इसके हर रंग में भारत की आत्मा और बलिदानों की पहचान है।”
आज हम स्वतंत्र भारत की 80वीं वर्षगांठ मना रहे हैं। यह दिन केवल जश्न मनाने का नहीं, बल्कि खुद के भीतर झांकने और आत्ममंथन करने का भी है। हमें खुद से यह सवाल जरूर पूछना चाहिए कि जिस भारत को आजाद कराने के लिए हमारे पूर्वजों ने अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया, उस देश को और महान बनाने के लिए हम अपने स्तर पर क्या कर रहे हैं? भारत हमसे केवल नारों की गूंज नहीं चाहता, बल्कि वह चाहता है कि हमारे कर्मों से वह और बेहतर राष्ट्र बने।
अस्पताल में होने वाली हर निस्वार्थ सेवा भी राष्ट्रभक्ति है
मेरा हमेशा से यह मानना रहा है कि देशभक्ति का मतलब केवल सरहद पर बंदूक लेकर खड़े रहना नहीं है। बेशक, एक सैनिक सीमा की रक्षा करता है, लेकिन उसी तरह एक किसान हमारे अन्न की, शिक्षक हमारे भविष्य की और एक वैज्ञानिक हमारी प्रगति की रक्षा करता है। एक चिकित्सक के रूप में हमारी जिम्मेदारी मानव जीवन की रक्षा करना है। जब कोई मरीज हमारे अस्पताल में आता है, तो वह किसी न किसी परिवार की टूटती हुई उम्मीद होता है। इलाज करते समय उसकी जाति, धर्म, भाषा या उसकी हैसियत हमारे लिए मायने नहीं रखनी चाहिए; वह सबसे पहले एक मनुष्य है और एक भारतीय है।
जब हम पूरी ईमानदारी और करुणा के साथ किसी घायल को दोबारा उसके पैरों पर खड़ा करते हैं, किसी बीमार बुजुर्ग का दर्द कम करते हैं या किसी गरीब को सम्मानजनक इलाज देते हैं, तो हम केवल अपना पेशा नहीं निभा रहे होते, हम उस भारत की नींव को मजबूत कर रहे होते हैं जिसका सपना हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने देखा था।
भारत का भविष्य ऑपरेशन थिएटर और वार्ड में भी बनता है
मैं अपने युवा छात्रों और सहयोगी डॉक्टरों से हमेशा कहता हूं कि भारत का भविष्य केवल संसद या बड़े मंत्रालयों में तय नहीं होता। इसका निर्माण आपकी कक्षाओं में, आपके वार्ड में, ऑपरेशन थिएटर में और सबसे बढ़कर आपके चरित्र में होता है। आप खूब ज्ञान हासिल करें, अपनी विधा में सर्वश्रेष्ठ बनें, लेकिन सफलता की सीढ़ियां चढ़ते हुए अपने भीतर की संवेदना को कभी मरने न दें।
तिरंगे के तीनों रंग आज भी हमें बहुत कुछ सिखाते हैं। इसका केसरिया रंग हमें साहस और त्याग की प्रेरणा देता है, सफेद रंग सत्य और पारदर्शिता सिखाता है, जबकि हरा रंग हमारी उम्मीदों और निरंतर श्रम का प्रतीक है। बीच में मौजूद अशोक चक्र हमें बताता है कि यह राष्ट्र रुकने वाला नहीं है, बल्कि हमारे कर्मों से निरंतर आगे बढ़ने वाला है।
हमेशा यह पूछने के बजाय कि “देश ने हमें क्या दिया?”, आज जरा यह सोचकर देखिए कि “हमने देश को क्या दिया?”
“न पूछो वतन ने तुम्हें क्या दिया, अपने कर्म से पूछो, वतन को तुमने क्या दिया; तिरंगा तभी सबसे ऊँचा रहेगा, जब हर भारतीय ने अपना सर्वश्रेष्ठ दिया।”
आइए, आज आनंद हॉस्पिटल के इस प्रांगण से हम यह प्रण लें कि हमारे लिए चिकित्सा केवल पैसा कमाने का पेशा नहीं, बल्कि मानव सेवा का एक माध्यम होगी। हम ऐसा जीवन जिएं कि आने वाली पीढ़ी फख्र से कह सके कि हमने आजादी को केवल विरासत में नहीं पाया, बल्कि उसे अपने कर्मों से और अधिक महान बनाकर उन्हें सौंपा है।
भारत माता की जय! वंदेमातरम्! जय हिन्द!
































