न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
महागठबंधन की राजनीति के एंगल से देखें तो राज्यसभा की हार तो बस एक झांकी है, असली कहानी बहुत पुरानी है। बिहार की राजनीति में ‘पॉलिटिकल ड्रामा’ कभी खत्म नहीं होता, लेकिन हालिया राज्यसभा चुनाव के नतीजों ने जो पटकथा लिखी है, उसने महागठबंधन के भविष्य पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है। एनडीए ने दो साल के भीतर दूसरी बार जो ‘झटका’ विपक्ष को दिया है, वह केवल विधायकों की संख्या कम करने तक सीमित नहीं है। यह उस गहरे अविश्वास की कहानी है, जिसकी नींव 2025 के विधानसभा चुनाव के दौरान ही पड़ चुकी थी।
नेतृत्व का वो अनसुलझा सवाल: चुप्पी जो चुभती रही
कहानी शुरू होती है विधानसभा चुनाव की तैयारियों से। राजनीति में गठबंधन का मतलब होता है, एक साझा विजन और एक सर्वमान्य चेहरा। लेकिन महागठबंधन के भीतर ‘चेहरे’ को लेकर एक ऐसी खींचतान चल रही थी, जिसे ढकने की लाख कोशिशें नाकाम रहीं। आरजेडी के खेमे से तेजस्वी यादव को भावी मुख्यमंत्री के तौर पर पेश किया गया। तेजस्वी ने रैलियों में हुंकार भरी कि “अगर हम जीते तो बिहार की कमान मेरे हाथ में होगी और केंद्र में राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनेंगे।” यह एक सीधा और सरल समीकरण लग रहा था, लेकिन पेंच फंसा था दिल्ली में। कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व, विशेषकर राहुल गांधी ने तेजस्वी के इस दावे पर एक अजीब सी ‘रणनीतिक खामोशी’ अख्तियार कर ली।
जब पत्रकारों ने राहुल गांधी से सीधे तौर पर पूछा कि क्या तेजस्वी ही महागठबंधन का चेहरा हैं, तो राहुल ने जवाब देने के बदले चुप रहना बेहतर समझा। उन्होंने बस इतना कहा, “गठबंधन में सब ठीक है।” लेकिन राजनीतिक गलियारों में इस ‘सब ठीक है’ का मतलब सबको पता था। कांग्रेस ने तेजस्वी को अपना नेता दिल से स्वीकार नहीं किया था।
हार का ‘ठीकरा’ और बिखरता कुनबा
जब विधानसभा चुनाव के नतीजे आए, तो वे महागठबंधन के लिए किसी वज्रपात से कम नहीं थे। एनडीए ने शानदार तरीके से सत्ता में वापसी की और महागठबंधन बुरी तरह पिछड़ गया। यहीं से असली ‘ब्लेम गेम’ शुरू हुआ। नतीजे आने के कुछ ही घंटों बाद दोनों पार्टियों के बीच की दरारें चौड़ी हो गईं। आरजेडी समर्थकों का कहना था कि कांग्रेस को दी गई सीटें ‘वेस्ट’ गईं, जबकि कांग्रेस ने आरोप लगाया कि आरजेडी के अति-आत्मविश्वास और क्षेत्रीय वर्चस्व ने गठबंधन की लुटिया डुबो दी। इसके बाद खुलेआम बयानबाजी का दौर शुरू हुआ, जिसने कैडरों के बीच के भरोसे को पूरी तरह खत्म कर दिया।
राज्यसभा चुनाव: घर के भेदियों ने ढहा दी लंका
इसी पृष्ठभूमि में राज्यसभा के चुनाव आए। महागठबंधन के रणनीतिकार और एडी सिंह अपनी जीत को लेकर आश्वस्त थे, लेकिन वे भूल गए कि राजनीति में जो दिखता है, वह होता नहीं। एनडीए ने मौके को भुनाने में कोई चूक नहीं की। बीजेपी और जेडीयू के नेतृत्व ने उन ‘कमजोर कड़ियों’ को पहचान लिया जो लंबे समय से अपनी ही पार्टी में उपेक्षा और असंतोष का सामना कर रहे थे। कांग्रेस के तीन विधायक, सुरेंद्र प्रसाद (वाल्मीकिनगर), मनोज विश्वास (फारबिसगंज) और मनोहर प्रसाद सिंह (मनिहारी) अचानक सीन से गायब हो गए। जब मतदान का समय आया, तो इन तीनों के मोबाइल बंद थे। प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम और पार्टी के बड़े नेता लगातार संपर्क की कोशिश करते रहे, लेकिन संवाद का रास्ता पूरी तरह बंद हो चुका था। इन विधायकों की अनुपस्थिति ने आरजेडी उम्मीदवार अमरेंद्रधारी सिंह की हार की स्क्रिप्ट फाइनल कर दी।
विधायकों का तर्क: “पार्टी में ही दम नहीं
अब जब पार्टी सख्त हुई है और नोटिस जारी कर रही है, तो विधायकों के तेवर भी तीखे हैं। कोई ‘अगड़ी जाति’ के उम्मीदवार होने का बहाना बना रहा है, तो कोई सीधा आरोप लगा रहा है कि पार्टी नेतृत्व के पास उनसे बात करने का समय ही नहीं है। यह ‘संवादहीनता’ ही वह दीमक है जो कांग्रेस और महागठबंधन को अंदर ही अंदर खोखला कर रही है।
एनडीए का ‘दूरगामी’ संदेश
इस पूरे घटनाक्रम से एनडीए ने एक साफ संदेश दिया है, वे अब केवल अपनी सरकार बचाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि विपक्ष को मनोवैज्ञानिक रूप से पूरी तरह ध्वस्त करने के मोड में हैं। वहीं, तेजस्वी यादव के लिए यह आत्ममंथन का समय है। क्या वे बिना सहयोगियों का पूरा भरोसा जीते बिहार की सत्ता तक पहुँच पाएंगे? बिहार की राजनीति अब उस मोड़ पर है जहाँ ‘सत्ता की लड़ाई’ और भी तीखी होगी, और आने वाले दिनों में कुछ और बड़े ‘उलटफेर’ देखने को मिल सकते हैं।
































