पीरपैंती के गुड़ की मिठास फीकी पड़ी, उम्मीद की नई किरण, गन्ना संकट पर किसानों की दास्तां

प्रदीप विद्रोही, भागलपुर

कभी भागलपुर के पीरपैंती प्रखंड की पहचान गुड़ की मीठी महक हुआ करती थी। जहां रात भर ईख पेराई की मशीनें घूमती थीं। वहां आज खामोशी पसरी है। मथुरापुर मंडी में दिसंबर की ठंड भी उस उत्साह को ठहरा नहीं पाती थी, मकर संक्रांति के पूर्व जब देशभर से व्यापारी आते और ट्रकों में भर-भरकर गुड़ खरीदकर ले जाते। दो दशक पहले तक यहां के किसान करीब दो हजार एकड़ में गन्ना बोते थे। वही खेती जो अब सिमटकर मात्र 100–200 एकड़ में रह गई है। गुड़ का बाजार टूट गया। समर्थन मूल्य गायब हो गया और लागत आसमान छूने लगी। परिणाम किसान गन्ने से मुंह मोड़ने लगे। कई गांवों में तो हालात इतने बदतर हुए कि लोग ईख के खेतों में अब आम के पेड़ लगा रहे हैं।

गुड़ की मंडी से सन्नाटे तक का सफर

किसान इस ख़ामोशी की वजह बताते हैं कि 2005 के बाद से ईख की खेती लगातार घटती चली गई। सरकारी योजनाओं में शामिल 128 प्रभेद के बीज की खूब चर्चा हुई, लेकिन ज़मीनी स्तर पर किसानों को न तो सही बीज मिला, न खाद, न बिजली और न ही बाजार। जब बिहार में बिजली अपूर्ति दुरुस्त हुई तब तक ईख की खेती चौपट हो चुकी थी। कटाई से ठीक पहले ईख सूखने लगी, लेकिन किसी किस्म का मुआवज़ा किसानों को नहीं मिला। उस भारी नुकसान ने उनकी पीढ़ियों की कमर तोड़ दी।

लागत चार गुना, मुनाफा शून्य

डीजल की कीमत, मशीन पार्ट्स और मजदूरी तीनों पर महंगई का चौगुना बोझ। किसान बताते हैं कि गुड़ बनाने में ढाई लीटर नहीं, सवा डेढ़ लीटर डीज़ल में ही एक ताव गुड़ तैयार होता है, लेकिन गुड़ की कीमत वहीं की वहीं। बाजार में बिचौलिये 1800 से 2300 रुपये प्रति क्विंटल की दर देते हैं, जिससे लागत भी पूरी नहीं होती।

किसान कहते हैं ‘पहले 30 बीघे में गन्ना लगाता था, अब सिर्फ 5 बीघा। खर्च के सामने भाव कुछ नहीं मिलता। लागत निकालना भी मुश्किल है। किसान हर तरफ से घाटे में है। गुड़ को उचित बाजार नहीं। बिचौलियों को बेचना मजबूरी है। ईख की खेती दो फसलों का नुकसान कराती है। फायदा शून्य।जिनके पास अपनी पेराई मशीन है, वे किसी तरह बराबरी पर आ जाते हैं, लेकिन जिनके पास मशीन नहीं है वे कर्ज में धंसते चले जाते हैं।

उम्मीद की नई किरण, चिन्हित हुई संभावनाएं

इधर नव-निर्वाचित भाजपा विधायक मुरारी पासवान ने किसानों को नई सौगात देने का आश्वासन दिया है। उन्होंने कहा – ‘पीरपैंती में चीनी मिल स्थापित की जाएगी।’ इस घोषणा ने वर्षों से हताश किसानों में फिर उम्मीद जगा दी है। फिलहाल सबकी नज़रें समय पर टिकी हैं। कब यह सौगात वास्तविकता में बदलेगी?

क्यों टूटी पीरपैंती की मिठास?

समर्थन मूल्य न होना, मंडियों का खत्म होना, महंगी खेती, सस्ती खरीद,बिजली व सिंचाई की परेशानियां, बीज सुविधाओं का अभाव और सरकारी योजनाओं की नाकामी के कारण पीरपैंती के गुड़ की मिठास जमींदोज हो गई। इन सबने मिलकर उस खेती को निगल लिया, जिसने कभी पीरपैंती को देश के गुड़ मानचित्र में चमकाया था।

गन्ना सिर्फ एक फसल नहीं पीरपैंती की परंपरा, रोज़गार और पहचान था। आज किसान खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं। लेकिन चीनी मिल की घोषणा में उन्हें एक नयी उम्मीद दिखाई दे रही है।यदि यह वादा सच हुआ तो शायद पीरपैंती की मिट्टी में फिर से मिठास लौट आएगी। वही गुड़ की खुशबू, वही उत्साह और वही आत्मनिर्भर किसान।