न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
बिहार में गंगा के पानी की गुणवत्ता को लेकर आई ताजा रिपोर्ट उम्मीद जगाती है। पिछले चार सालों में बक्सर से कहलगांव तक ‘फेकल कोलीफॉर्म’ (मल-मूत्र वाला बैक्टीरिया) की मात्रा में भारी कमी आई है। दानापुर में तो स्थिति सबसे बेहतर हुई है। लेकिन कड़वा सच यह है कि सुधार के बावजूद पानी अभी भी नहाने योग्य नहीं है। सवाल यह है कि अब बाकी बची गंदगी को कैसे साफ किया जाए?
इसका असर : खतरा अभी टला नहीं है
आंकड़े बताते हैं कि भागलपुर में बैक्टीरिया का स्तर प्रति 100 एमएल 80,000 (वर्ष 2021) से घटकर 13,842 (2025) पर आ गया है। यह बड़ी गिरावट है, लेकिन मानक कहता है कि नहाने के लिए यह 500 MPN या अधिकतम 2500 MPN होना चाहिए।
स्वास्थ्य पर असर:
13,000 का स्तर भी काफी खतरनाक है। अगर कोई इस पानी में नहाता है या आचमन करता है, तो उसे टाइफाइड, पीलिया और चर्म रोग होने का खतरा बना रहता है। फेकल कोलीफॉर्म बढ़ने से पानी में ऑक्सीजन कम हो जाती है। भले ही सुधार हुआ है, लेकिन जब तक यह मानक के भीतर नहीं आता, डॉल्फिन और मछलियों के अस्तित्व पर संकट बना रहेगा।
अब हमें क्या करना होगा?
सिर्फ बड़े STP (सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट) बना देना काफी नहीं है। विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों के अनुसार, ‘जीरो डिस्चार्ज’ के लक्ष्य को पाने लिए अब माइक्रो-लेवल पर काम करना होगा :-
A. सीवरेज नेटवर्क का विस्तार: सबसे बड़ी समस्या यह है कि शहर में STP तो हैं, लेकिन हर घर की नाली सीवर लाइन से नहीं जुड़ी है। कई नालों का गंदा पानी बिना ट्रीट हुए सीधे गंगा में गिर रहा है।
समाधान: हमें ‘नमामि गंगे’ के अगले चरण में घर-घर सीवर कनेक्शन पर जोर देना होगा, ताकि एक बूंद गंदा पानी भी बाइपास होकर नदी में न जाए।
B. बायो-रेमेडिएशन तकनीक : जब तक एसटीपी पूरी क्षमता से काम नहीं करते, तब तक गिरते हुए नालों के मुहाने पर ‘फाइटोरेमेडिएशन’ (पौधों द्वारा सफाई) और बैक्टीरिया कल्चर का उपयोग करना चाहिए। यह तकनीक गंदे नाले के पानी को नदी में मिलने से पहले ही काफी हद तक साफ कर देती है।
C. विकेंद्रीकृत ट्रीटमेंट: छोटे कस्बों या मोहल्लों के लिए बड़े STP का इंतजार करने के बजाय छोटे ‘कम्युनिटी ट्रीटमेंट प्लांट’ लगाए जाने चाहिए, जो स्थानीय स्तर पर ही पानी साफ करें।
क्या हम लंदन की टेम्य नदी से सीख सकते हैं
बिहार की गंगा जैसी ही, या उससे भी बदतर हालत लंदन की टेम्स नदी (River Thames) की थी।
क्या थी समस्या:
1957 में टेम्स नदी को ‘बायोलॉजिकली डेड’ घोषित कर दिया गया था। यानी उसमें जीवन की कोई संभावना नहीं बची थी। सीवेज का गंदा पानी सीधे नदी में गिरता था।
उन्होंने कैसे ठीक किया?
सख्त कानून : ब्रिटेन ने उद्योगों और सीवेज डंपिंग पर भारी जुर्माना लगाना शुरू किया।
सुपर सीवर: उन्होंने लंदन के नीचे एक विशालकाय ‘सुपर सीवर’ सुरंग बनाई, जो बारिश के दिनों में ओवरफ्लो होने वाले सीवेज को भी नदी में जाने से रोकती है।
ऑक्सीजनेशन: नदी में ऑक्सीजन का स्तर बढ़ाने के लिए जगह-जगह ‘बबलर’ लगाए गए।
नतीजा : आज टेम्स नदी दुनिया की सबसे साफ शहरी नदियों में से एक है और वहां 125 से ज्यादा मछलियों की प्रजातियां वापस आ गई हैं।
राइन नदी तो यूरोप का नाला बन गई थी। वहां भी चमत्कार हुआ
यूरोप की राइन नदी भी ‘यूरोप का नाला’ बन गई थी। जर्मनी और स्विट्जरलैंड ने मिलकर ‘सल्मन 2000’ (Salmon 2000) प्रोजेक्ट चलाया। उन्होंने सिर्फ पानी साफ नहीं किया, बल्कि नदी के किनारों को पक्का करने के बजाय उसे प्राकृतिक रूप दिया, जिससे नदी खुद को साफ करने में सक्षम हो गई।

































