मालिकाना हक कागजों का मोहताज नहीं, पटना हाई कोर्ट का ‘जमीन’ से जुड़ा बड़ा फैसला

न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
बिहार में चल रहे विशेष भूमि सर्वेक्षण के बीच पटना हाई कोर्ट ने एक ऐसी लकीर खींच दी है, जो न केवल कानूनी भ्रम को दूर करती है बल्कि आम रैयतों को बड़ी राहत भी देती है। अदालत ने साफ कर दिया है कि नगर निगम या नगरपालिका के रिकॉर्ड में नाम बदल जाने मात्र से जमीन के मालिकाना हक (Ownership) पर कोई फर्क नहीं पड़ता। यह फैसला उन लोगों के लिए ढाल बनेगा जिनकी संपत्ति पर कब्जे और विरासत के दस्तावेजी सबूत पुराने होने के कारण धुंधले पड़ गए हैं।

सर्वेक्षण की आड़ में नहीं छीने जा सकते अधिकार
न्यायमूर्ति पूर्णेंदु सिंह की पीठ ने खगड़िया जिले के नौ याचिकाकर्ताओं की सुनवाई के दौरान यह व्यवस्था दी। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि वे दशकों से अपने पूर्वजों की विरासत संभाल रहे हैं, लेकिन रिकॉर्ड्स की अनुपलब्धता के कारण सर्वेक्षण में उन्हें मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि स्वामित्व का फैसला केवल ‘टाइटल सूट’ के जरिए ही हो सकता है, न कि केवल होल्डिंग टैक्स या म्यूटेशन के आधार पर।

रपट के मुख्य बिंदु: जो हर रैयत को जानना जरूरी है
कब्जा ही सर्वोपरि: अदालत ने माना कि यदि किसी का संपत्ति पर वास्तविक और भौतिक कब्जा (Physical Possession) है, तो सर्वेक्षण के दौरान उससे यह हक छीना नहीं जा सकता।

पुराने रिकॉर्ड की मजबूरी: कोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि सरकार के पास ही पुराने रिकॉर्ड (रजिस्टर-2 या खतियान) उपलब्ध नहीं हैं या खराब स्थिति में हैं, तो इसके आधार पर दशकों से चले आ रहे मालिकाना हक को समाप्त नहीं किया जा सकता।

टैक्स और टाइटल में अंतर: होल्डिंग टैक्स देना नगर निगम के प्रति एक जिम्मेदारी है, लेकिन यह किसी व्यक्ति को जमीन का ‘मालिक’ घोषित करने का एकमात्र पैमाना नहीं हो सकता।

बिहार भूमि सर्वेक्षण और ‘परगना फरकिया’ का संदर्भ
यह मामला खगड़िया के बेलदौर आंचल से जुड़ा है, जिसे ऐतिहासिक रूप से ‘परगना फरकिया’ कहा जाता था। बाढ़ प्रभावित इस इलाके में 1943-44 के दौरान हुए बंदोबस्त और जमींदारों द्वारा दिए गए मालिकाना हक को कोर्ट ने वैध माना है। राज्य सरकार की इस दलील को भी दरकिनार कर दिया गया कि याचिका समय से पहले है।