बिहार में मानसून की लगातार छठी बेरुखी : सूखे खेतों से लेकर आम आदमी की सेहत तक… जानिए इस जल संकट का क्या होगा असर

बिहार में मानसून का मिजाज पूरी तरह बदल चुका है। जुलाई का महीना, जिसे राज्य में खेती-किसानी और विशेषकर धान की रोपाई के लिए पीक सीजन माना जाता है, लगातार छठे साल सूखे की मार झेल रहा है। आंकड़ों के मुताबिक, इस साल (2026) जुलाई में सामान्य (340.5 मिमी) से 40% कम (महज 203 मिमी) बारिश हुई है। हालात इतने गंभीर हैं कि राज्य के 33 जिले अल्पवृष्टि की चपेट में हैं, जिनमें सीतामढ़ी (71% कमी), दरभंगा (67%) और पटना (40% कमी) जैसे जिले बुरी तरह प्रभावित हैं।

न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
बिहार में जुलाई महीने में बारिश की यह भारी कमी कोई एक साल की घटना नहीं, बल्कि पिछले छह वर्षों का लगातार चलने वाला ट्रेंड बन गया है। यह स्पष्ट रूप से जलवायु परिवर्तन का संकेत है। अब समय आ गया है कि सरकार और किसान पारंपरिक खेती के बजाय ‘क्लाइमेट रेजिलिएंट एग्रीकल्चर’ (कम पानी में उपजने वाली फसलें) और वर्षा जल संचयन पर युद्ध स्तर पर काम करें, अन्यथा भविष्य में यह संकट और भी विकराल रूप ले लेगा।
मानसून की इस बेरुखी का कारण भले ही मानसून ट्रफ का बिहार से खिसक जाना हो, लेकिन इसका असर केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है। इस जल संकट का सीधा प्रभाव राज्य की कृषि, पर्यावरण और आम लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाला है। यहाँ समझिए इस बदलते वर्षा चक्र का विस्तृत विश्लेषण :-

  1. खेती-बाड़ी और किसानों पर प्रहार: कर्ज और लागत का बढ़ता बोझ
    धान की रोपाई पर संकट: जुलाई में भरपूर बारिश नहीं होने से धान की रोपाई का काम सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है। पानी के अभाव में या तो रोपाई पिछड़ रही है या खेतों में दरारें पड़ रही हैं। इससे सीधा असर धान के उत्पादन पर पड़ेगा।
    खेती की लागत में भारी इजाफा: जिन किसानों ने बिचड़े तैयार कर लिए हैं, उन्हें अपनी फसल बचाने के लिए मजबूरन पंपसेट का सहारा लेना पड़ रहा है। लगातार पंप चलाने से डीजल और बिजली का खर्च कई गुना बढ़ गया है, जिससे खेती घाटे का सौदा बन रही है।
    खाद्य सुरक्षा और महंगाई: उत्पादन घटने और लागत बढ़ने का सीधा असर बाजार पर पड़ेगा। आने वाले समय में चावल और अन्य कृषि उत्पादों की कीमतों में उछाल आ सकता है, जिससे आम आदमी की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।
  2. मौसम और पर्यावरण पर मंडराता खतरा: रसातल में जाता भूजल
    भूजल स्तर में खतरनाक गिरावट: बारिश कम होने का सबसे बड़ा साइड इफेक्ट भूजल दोहन है। बारिश का पानी जमीन के अंदर न जाने और खेतों को बचाने के लिए अंधाधुंध पंपिंग होने से राज्य का वाटर टेबल तेजी से नीचे जा रहा है। आने वाले महीनों में ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में गंभीर पेयजल संकट पैदा हो सकता है।
    उमस और झुलसाने वाली गर्मी: सावन के महीने में आसमान साफ रहने और बादलों की बेरुखी से तापमान में कमी नहीं आ रही है। नमी और बढ़े हुए तापमान के कारण खतरनाक उमस (Humidity) का सामना करना पड़ रहा है, जो आम जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर रही है।
  3. स्वास्थ्य पर असर: बीमारियों और तनाव का बढ़ता ग्राफ
    डिहाइड्रेशन और हीट एग्जॉशन: सावन में चिलचिलाती धूप और उमस के कारण लोगों में डिहाइड्रेशन, चक्कर आना और हीट एग्जॉशन के मामले बढ़ रहे हैं। यह स्थिति बच्चों, बुजुर्गों और दिहाड़ी मजदूरों के लिए सबसे ज्यादा जानलेवा है।
    जलजनित और मौसमी बीमारियां: भूजल स्तर नीचे जाने से कई जगह हैंडपंप या तो सूख रहे हैं या दूषित पानी दे रहे हैं। इसके कारण डायरिया, टाइफाइड और पीलिया जैसी जलजनित बीमारियों का खतरा काफी बढ़ गया है।
    मानसिक और आर्थिक तनाव: फसल बर्बाद होने का डर किसानों के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाल रहा है। दूसरी तरफ, बढ़ती खाद्य महंगाई शहरी और ग्रामीण मध्यम वर्ग के घरेलू बजट को बिगाड़ रही है, जो सामूहिक तनाव का कारण बन रहा है।