अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के पावन अवसर पर, समर्थगुरुधारा के वरिष्ठ आचार्य एवं इंडियन योग एसोसिएशन (बिहार चैप्टर) के उपाध्यक्ष आचार्य अंशु जी की के विचार आपको जरूर पढ़ना चाहिए।
अक्सर जब हम ‘योग’ शब्द सुनते हैं, तो हमारे मस्तिष्क में तरह-तरह के शारीरिक आसनों या कठिन प्राणायामों की तस्वीरें उभरने लगती हैं। लेकिन योग को केवल शारीरिक या सांसों की कसरत तक सीमित कर देना इसकी विशालता को सिकोड़ना है। वास्तव में, योग हमारे स्थूल शरीर से लेकर सूक्ष्म आत्मा तक को एक सूत्र में पिरोने का, उनके बीच एक गहरा सामंजस्य स्थापित करने का विज्ञान है। सीधे और सरल शब्दों में कहें तो योग का वास्तविक अर्थ है, “परम ठहराव”।

आज के आधुनिक युग में हमारी सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि हम सब एक अंतहीन और अंधी दौड़ का हिस्सा बन चुके हैं। हर कोई भाग रहा है, गति के पीछे दीवाना है। नतीजा यह है कि हम अनचाहे ही तनाव, मानसिक अवसाद, तीव्र क्रोध, गहरी चिंता और असमय आने वाली ढेरों बीमारियों के चक्रव्यूह में फंसते जा रहे हैं। मन चौबीसों घंटे अशांत रहता है और इसी मानसिक व्याकुलता के कारण हम समाज में अनजाने ही कई कुरीतियों और गलत प्रवृत्तियों को बढ़ावा देने लगते हैं। ऐसे में महर्षि पतंजलि का अष्टांग योग हमारे लिए एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाता है, जो आठ चरणों के माध्यम से हमें उस खोए हुए ठहराव को वापस पाने की कला सिखाता है।
महर्षि पतंजलि का अष्टांग योग: जीवन में ठहराव के आठ चरण
- यम (संयम) – हमारे सामाजिक व्यवहार का ठहराव
हम एक सामाजिक प्राणी हैं। परिवार, मित्रों और समाज के बीच हमारा उठना-बैठना है, लेकिन कड़वा सच यह है कि हमारे आपसी व्यवहार में कोई स्थिरता नहीं है। हिंसा, झूठ, चोरी, अनियंत्रित वासना (ब्रह्मचर्य का अभाव) और अत्यधिक भौतिक चीजों का संचय करना ही अशांति की जड़ है। यम हमें सिखाता है कि हम अहिंसा और सत्य को अपनाएं। हम न केवल भौतिक वस्तुओं की, बल्कि वैचारिक चोरी करने से भी बचें। जितनी जरूरत हो उतना ही रखें। जब ऐसा संयम सधता है, तो समाज के साथ हमारे व्यवहार में एक अद्भुत ठहराव आ जाता है। - नियम – हमारे व्यक्तिगत आचरण का ठहराव
नियम का सीधा संबंध हमारे निजी चरित्र और आचरण से है। इसके पांच मुख्य स्तंभ हैं, स्वच्छता, जीवन की सरलता, संतोष, स्वाध्याय (स्वयं का निरंतर अध्ययन व आत्म-मंथन) और ईश्वर प्राणिधान (उस परम शक्ति के प्रति पूर्ण समर्पण)। जब ये नियम हमारे जीवन का हिस्सा बनते हैं, तो हमारा अंतःकरण शुद्ध होता है और हमारे आचरण का भटकाव रुक जाता है। - आसन – हमारे भौतिक शरीर का ठहराव
महर्षि पतंजलि ने बहुत ही सुंदर सूत्र दिया है, “स्थिरसुखमासनम्”। इसका अर्थ है कि जिस भी शारीरिक मुद्रा में आप स्थिरतापूर्वक और सुख से बैठ सकें, वही आसन है। लोग समझते हैं कि योग के लिए बहुत कठिन व एडवांस्ड पोस्चर करने जरूरी हैं, जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है। हल्के-फुल्के, सहज आसन और थोड़ा सा सामान्य व्यायाम भी आपके शरीर को स्वस्थ, स्फूर्तिवान और स्थिर रखने के लिए पर्याप्त है। - प्राणायाम – हमारी सांसों का ठहराव
हमारा यह दिखने वाला भौतिक शरीर (स्थूल) और हमारी भीतर की ऊर्जा (सूक्ष्म शरीर), इन दोनों के बीच यदि कोई जोड़ने वाला पुल या सेतु है, तो वह हमारी सांसें हैं। प्राणायाम के माध्यम से जब हम लंबी और गहरी सांसों का अभ्यास करते हैं, तो बिखरा हुआ मन तुरंत शांत होने लगता है। यह वैज्ञानिक रूप से भी प्रमाणित है कि गहरी सांसें शरीर की आधी से ज्यादा व्याधियों को हर लेती हैं। सांसें स्थिर होती हैं, तो मन गहरे उतरने के लिए तैयार हो जाता है। - प्रत्याहार – हमारी भटकती इंद्रियों का ठहराव
हमारी ज्ञानेंद्रियाँ (आँख, कान, नाक, आदि) हमेशा बाहर संसार की तरफ भागती रहती हैं, जिससे मन लगातार विचलित रहता है। प्रत्याहार हमें कछुए की तरह जीना सिखाता है। जैसे कछुआ खतरा भांपते ही या जरूरत पड़ने पर अपने अंगों को भीतर समेट लेता है, वैसे ही हमें भी अपनी इंद्रियों का उपयोग केवल आवश्यकतानुसार करना चाहिए। जब हम बाहर की अंधी दौड़ से अपनी ऊर्जा को समेटते हैं, तो अंतर्यात्रा स्वतः ही सुगम और सहज हो जाती है। - धारणा – हमारे अनर्गल विचारों का ठहराव
हमारे मस्तिष्क में हर सेकंड लाखों-करोड़ों विचार आते-जाते रहते हैं। गौर से देखें तो इनमें से अधिकांश विचार पूरी तरह से निरर्थक, अनर्गल और भटकाने वाले होते हैं। हम हमेशा विचारों के एक कोलाहल, एक भीड़ में जी रहे होते हैं। साधना के अभ्यास से जब विचारों की यह भीड़ छंटने लगती है और मन में केवल एक या दो ही पवित्र व एकाग्र विचार बचते हैं, तो वह ‘धारणा’ कहलाती है। जैसे निरंतर अपने गुरु का ध्यान करना या किसी एक बिंदु पर मन को टिकाना। यह ध्यान की दहलीज है। - ध्यान – निराकार में हमारी चेतना का ठहराव
धारणा की अगली परम अवस्था ध्यान है। धारणा में जो एक-दो विचार बचे थे, ध्यान में आकर वे भी पूरी तरह विलीन हो जाते हैं। यह एक ऐसी ‘निर्विचार’ अवस्था है जहाँ आप पूरी तरह होश में हैं, सजग हैं, लेकिन भीतर कोई विचार नहीं है। यह तब घटित होता है जब हम निराकार (शून्य) के प्रति जाग्रत होते हैं। जब आप अपनी आँखें बंद करते हैं, तो सामने जो सांवले रंग का एक अनंत, असीम पर्दा दिखाई देता है, वही निराकार का स्वरूप है। उसे बिना किसी विचार के अनवरत देखते रहने से सारे मानसिक तरंग शांत हो जाते हैं और हम ध्यानस्थ हो जाते हैं। - समाधि – अंतराकाश में चेतना का पूर्ण विलीनीकरण
बंद आंखों के सामने दिखने वाले उस निराकार को जब हम और गहराई से देखने लगते हैं, तो वह हमारा ‘अंतराकाश’ बन जाता है। इस अंतराकाश में निरंतर डूबे रहने से साधक समाधि की अवस्था को उपलब्ध होता है। ध्यान और समाधि में एक बहुत बारीक और सुंदर अंतर है, ध्यान मनुष्य का एक सचेतन ‘प्रयास’ है, लेकिन समाधि उस परमात्मा का ‘प्रसाद’ है जो प्रयास के थकने पर स्वतः घटित होती है।
संक्षेप में कहें तो, जीवन के इन सभी आयामों पर आने वाला ठहराव ही तो है, चाहे वह हमारा सामाजिक व्यवहार हो, निजी आचरण हो, हमारा शरीर हो, हमारी सांसें हों, इंद्रियां हों या हमारी चेतना… जब इन सबमें एक पूर्ण स्थिरता आ जाती है, उसी समेकित “परम ठहराव” का नाम योग है। आइए, इस अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर हम केवल बाहरी कसरत से थोड़ा आगे बढ़ें और अपने जीवन में इस ‘परम ठहराव’ को उतारने का संकल्प लें।
































