बिहार में औद्योगिक क्रांति की तैयारी: 2 साल में बिजली आत्मनिर्भरता, 30 दिन में क्लीयरेंस; जानें CM सम्राट चौधरी का पूरा प्लान

उद्योग, निवेश और कड़े श्रम से बदलेगी बिहार की तस्वीर: अभूतपूर्व बुनियादी ढांचा विस्तार, बिजली आत्मनिर्भरता और 20 घंटे कार्ययोजना का विश्लेषणात्मक मूल्यांकन

बिहार के आर्थिक और औद्योगिक परिदृश्य को पुनर्जीवित करने के लिए राज्य सरकार ने एक साहसिक और महत्वाकांक्षी रोडमैप तैयार किया है। पटना में आयोजित कार्यक्रमों में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने स्पष्ट किया कि बिहार अब केवल पारंपरिक नीतियों के भरोसे नहीं रहेगा, बल्कि ‘उद्योग, निवेश और जनभागीदारी’ के त्रिसूत्र से समृद्धि का नया अध्याय लिखेगा। वर्तमान शासन का यह विजन कार्य संस्कृति में एक क्रांतिकारी बदलाव की मांग करता है।

न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने प्रशासनिक तंत्र और जनता को संबोधित करते हुए “न सोएंगे, न सोने देंगे” तथा “24 घंटे में से 20 घंटे काम” करने का कड़ा संकल्प दोहराया है। उनका मानना है कि भारत को विकसित बनाने का सपना तभी साकार हो सकता है, जब बिहार आर्थिक रूप से समृद्ध होगा।
राज्य के चहुंमुखी विकास को गति देने के लिए सरकार ने तीन प्रमुख स्तंभों को चिन्हित किया है, जिन पर आगामी परियोजनाओं की नींव रखी जा रही है :

  1. बिजली उत्पादन में आत्मनिर्भरता और उपभोक्ता राहत:
    ऊर्जा क्षेत्र में बिहार सरकार एक अभूतपूर्व बदलाव की ओर अग्रसर है। मुख्यमंत्री के अनुसार, जिस बिजली ग्रिड और बुनियादी ढांचे को तैयार करने में सामान्यतः 30 साल की जरूरत होती, उसे सरकार आगामी 2 वर्षों में पूरा करने का लक्ष्य लेकर चल रही है। अगले 5 वर्षों में राज्य की उत्पादन क्षमता में भारी बढ़ोतरी होगी। इसके साथ ही, उपभोक्ताओं को राहत देने के मामले में बिहार देश में सबसे आगे है, जहां सरकार सालाना 23,000 करोड़ रुपये की बिजली सब्सिडी दे रही है, जो पूरे देश में सर्वाधिक है। यह सुदृढ़ ग्रिड व्यवस्था नए उद्योगों को बिना किसी बाधा के निर्बाध बिजली सुनिश्चित करेगी।
  2. सांस्कृतिक विरासत और पर्यटन का आधुनिकीकरण:
    पर्यटन को रोजगार सृजन और आर्थिक प्रगति का एक बड़ा माध्यम माना गया है। इस दिशा में ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों को वैश्विक स्तर पर संवारा जा रहा है। पटना में 200 करोड़ रुपये की लागत से भगवान महावीर का भव्य मंदिर बनाया जा रहा है, जो अगले 6 महीनों में तैयार हो जाएगा। इसके अतिरिक्त राजगीर, वाल्मीकि नगर, बोधगया और विक्रमशिला जैसे ऐतिहासिक केंद्रों को संवारकर जहां एक ओर बिहार की सांस्कृतिक पहचान मजबूत की जा रही है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय स्तर पर रोजगार के लाखों अवसर पैदा किए जा रहे हैं।
  3. इंफ्रास्ट्रक्चर व गंगा तट का व्यापक विस्तार:
    परिवहन और आधुनिक शहरीकरण को औद्योगिक विकास की रीढ़ मानते हुए कनेक्टिविटी को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है। परिवहन को गति देने के लिए राज्य में तीन नए एक्सप्रेस-वे का निर्माण किया जा रहा है, साथ ही गंगा-सोन नदी पर नए पथ (कॉरिडोर) विकसित किए जा रहे हैं ताकि व्यापारिक गतिविधियों में तेजी आए। इसके अलावा, गंगा तट पर नागरिक सुविधाएं और हरियाली बढ़ाई जा रही है, तथा सिंचाई विभाग के गेस्ट हाउसों को पीपीपी (PPP) मॉडल पर आम जनता के लिए खोलने का निर्णय लिया गया है।

औद्योगिक क्रांति और ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’
निवेशकों को आकर्षित करने और प्रशासनिक लालफीताशाही को समाप्त करने के लिए राज्य सरकार ने कड़े कदम उठाए हैं। मुख्यमंत्री ने बिहारी उद्योगपतियों, चार्टर्ड अकाउंटेंटों और वित्तीय विशेषज्ञों से राज्य के इस पुनरुद्धार में भागीदार बनने की अपील की है। अब बिहार में उद्योग या स्टार्टअप लगाने के लिए सिंगल-विंडो सिस्टम के तहत 30 दिनों के भीतर सभी जरूरी क्लीयरेंस (स्वीकृतियां) देने का नियम लागू किया गया है। राज्य के योजनाबद्ध शहरीकरण के लिए 6.25 लाख एकड़ भूमि पर 12 नई टाउनशिप विकसित की जा रही हैं, जिनमें औद्योगिक कॉरिडोर और विशेष पार्क शामिल होंगे। इन टाउनशिप और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में 6.5 लाख करोड़ रुपये का भारी पूंजी निवेश होने जा रहा है, जो बिहार की अर्थव्यवस्था के लिए ‘गेमचेंजर’ साबित होगा। उद्यमियों की समस्याओं को दूर करने के लिए लगाए गए सहयोग शिविरों में भी सरकार ने मुस्तैदी दिखाई है, जहां आए 3 लाख आवेदनों में से 2.40 लाख मामलों का त्वरित निपटारा किया जा चुका है।

अस्थिरता से स्थिरता का सफर
मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में बिहार के गौरवशाली अतीत और मध्यकाल की राजनीतिक अस्थिरता का एक महत्वपूर्ण तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया। आज से लगभग 2000 वर्ष पूर्व बिहार की इस ऐतिहासिक धरती ने पूरे देश को शासन का केंद्र देकर ‘स्वर्णिम काल’ की रचना की थी, जो लगभग 200 वर्षों तक चला। परंतु, आधुनिक काल में राजनीतिक अस्थिरता ने विकास को भारी चोट पहुंचाई। वर्ष 1962 से 1990 के बीच राज्य में मुख्यमंत्रियों का औसत कार्यकाल मात्र एक से डेढ़ वर्ष का रहा, जिसके कारण कोई भी दीर्घकालिक नीति धरातल पर नहीं उतर सकी और विकास पूरी तरह बाधित रहा। इसके बाद 1990 से 2005 के लालू-राबड़ी शासनकाल के दौरान बिहार औद्योगिक दौड़ में देश के अन्य राज्यों से काफी पीछे छूट गया।
हालांकि, पिछले 20 वर्षों में स्थिति बदली है। बिहार ने अपने आंतरिक संसाधनों के दम पर सामाजिक और आर्थिक संरचना को मजबूत किया है, जिसके परिणामस्वरूप राज्य का ग्रोथ रेट लगातार डबल डिजिट (Double Digit) में बना हुआ है। कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर भी अब पुलिस अपराधियों को 24 से 48 घंटे के भीतर कड़ा जवाब दे रही है, जिससे निवेशकों के बीच सुरक्षा का माहौल तैयार हुआ है।

बिहार दुनिया का सबसे अधिक जनसंख्या घनत्व वाला राज्य है, और इस विशाल आबादी को समृद्धि की ओर ले जाने का एकमात्र मार्ग बड़े पैमाने पर औद्योगिकीकरण और इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास ही है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का यह नया रोडमैप राज्य की सुस्त पड़ चुकी कार्य संस्कृति को झकझोरने का एक साहसिक प्रयास है। यदि 6.5 लाख करोड़ रुपये का प्रस्तावित निवेश, 30 दिनों का फास्ट-ट्रैक क्लीयरेंस और बिजली क्षेत्र का यह दो-वर्षीय कायाकल्प धरातल पर पूरी तरह साकार होता है, तो भारत सरकार के पूर्ण सहयोग से बिहार निश्चित रूप से अपने पुराने स्वर्णिम युग को पुनर्जीवित करने में सफल होगा।