मोहब्बत, समानता और भाईचारा ही है मुल्क की असली बुनियाद: जानिए कि संघ प्रमुख मोहन भागवत के बयान का सैयद शाह फखरे आलम ने क्यों किया इस्तकबाल?

मैं सैयद शाह फखरे आलम हसन, भागलपुर स्थित खानकाह पीर दमड़िया शाह का सज्जादानशीं हूं। आज के दौर में, जब समाज में दूरियां पैदा करने वाली आवाजें अक्सर जोर पकड़ लेती हैं, तब मैं देश के उस साझे ताने-बाने पर बात करना चाहता हूं जिसने सदियों से हमें एक धागे में पिरो कर रखा है।

हाल ही में, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत जी ने अमेरिका में एक बेहद अहम और विचारणीय बयान दिया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि, “जो व्यक्ति यह चाहता है कि हिंदुस्तान में मुसलमान न रहें, तो संभव है कि वह व्यक्ति हिंदू ही न हो।” एक जिम्मेदार भारतीय नागरिक और एक धर्मगुरु होने की हैसियत से, मैंने उनके इस विचार का पूरे खुले दिल से इस्तकबाल यानी स्वागत किया है।

लोग अक्सर यह सोच सकते हैं कि एक खानकाह के सज्जादानशीं ने इस बयान का इतनी प्रमुखता से स्वागत क्यों किया? इसका जवाब हमारी उस साझी विरासत और इंसानियत की उस मूल भावना में छिपा है, जो यह मानती है कि संपूर्ण मानव जाति एक ही परवरदिगार, एक ही ईश्वर की संतान है। भागवत जी का यह बयान इसी सार्वभौमिक सत्य की तस्दीक करता है।

मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि दुनिया के किसी भी मजहब या धर्म की वास्तविक आत्मा इंसानों को आपस में बांटना नहीं हो सकती। धर्म तो वह मरहम है जो दिलों को जोड़ता है। उसका काम हमें प्रेम, भाईचारे और इंसानियत के पवित्र रिश्ते में बांधना है। जब हम सब एक ही ईश्वर की बनाई हुई रचना हैं, तो फिर इस दुनिया में किसी भी व्यक्ति को यह अधिकार किसने दे दिया कि वह अपनी जाति, नस्ल, भाषा या धर्म के आधार पर स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझे? श्रेष्ठता का यह खोखला अहंकार ही हमारे समाज में दरारें पैदा करता है और नफरत के बीज बोता है।

हमारा देश एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां हमें मुल्क को बांटने वाली ताकतों से कहीं ज्यादा, दिलों को जोड़ने वाले हाथों की जरूरत है। इसी जिम्मेदारी और फिक्र को गहराई से महसूस करते हुए, मैं देश के नीति-निर्माताओं से एक पुरजोर अपील करना चाहता हूं। मैं देश के प्रधानमंत्री, सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों, विभिन्न धर्मों के रहनुमाओं और तमाम सामाजिक नेताओं से गुजारिश करता हूं कि वे आगे आएं। उनकी यह जिम्मेदारी है कि वे समाज में लगातार प्रेम, सद्भाव और परस्पर सम्मान का संदेश प्रसारित करें। जब तक हमारे नेता और धर्मगुरु समाज में मोहब्बत का पैगाम नहीं देंगे, तब तक देश का यह खूबसूरत सामाजिक ताना-बाना मजबूत नहीं हो सकेगा।

हमें यह हकीकत कभी नहीं भूलनी चाहिए कि भारत की असली आंतरिक शक्ति इसकी विविधता में निहित एकता में ही बसती है। यह देश अलग-अलग भाषाओं, पहनावे, और इबादत के तरीकों का एक खूबसूरत गुलदस्ता है। हमारा यह अजीम मुल्क नफरत, शक और दूरियों से कभी आगे नहीं बढ़ सकता। यह सिर्फ और सिर्फ मोहब्बत, समानता और एकजुटता के उस रास्ते पर चलकर ही समृद्ध, मजबूत और एक महान राष्ट्र बनेगा, जिसका सपना हमारे पूर्वजों ने देखा था।

आइए, हम सब मिलकर इस मुल्क की बुनियाद में इंसानियत और भाईचारे की ईंटें रखें, ताकि आने वाली नस्लें एक सुकून भरे भारत में सांस ले सकें।