राजनीति की बिसात पर कोई भी मोहरा यूं ही नहीं खिसकाया जाता। यहां हर ‘त्याग’ के पीछे एक तयशुदा ‘इनाम’ छिपा होता है, और हर फैसले की पटकथा में जातीय समीकरणों की गहरी स्याही होती है। बिहार की राजनीति में इन दिनों ऐसा ही एक गुणा-गणित चर्चा के केंद्र में है, जिसके मुख्य किरदार हैं, बीजेपी के वरिष्ठ नेता देवेश कुमार, राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश और बिहार का सवर्ण (भूमिहार) वोट बैंक।
न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
पत्रकार से राजनेता बने और वर्तमान में मिजोरम के बीजेपी प्रभारी देवेश कुमार को बिहार राज्य योजना बोर्ड का उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया है। नियुक्ति की तारीख से अगले तीन साल तक के लिए उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त होगा। लेकिन इस नियुक्ति को महज एक प्रशासनिक या राजनीतिक आदेश के तौर पर देखना बिहार की सियासत की अधूरी समझ होगी। यह दरअसल गठबंधन के दबाव और वोट बैंक के डैमेज कंट्रोल का एक बेहतरीन उदाहरण है।
गठबंधन की मजबूरी और एक एमएलसी की ‘कुर्बानी’
इस पूरी सियासी कहानी की शुरुआत पिछले महीने हुई। 2021 में राज्यपाल कोटे से विधान परिषद (MLC) भेजे गए देवेश कुमार का कार्यकाल 2027 तक था। लेकिन अचानक उन्होंने अपनी मर्जी का हवाला देते हुए इस्तीफा दे दिया। राजनीति में ‘मर्जी’ अक्सर ‘मजबूरी’ का दूसरा नाम होती है। यह इस्तीफा असल में एनडीए (NDA) गठबंधन के सहयोगी उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश की मंत्री की कुर्सी बचाने के लिए दिलवाया गया था।
दीपक प्रकाश बिहार सरकार में मंत्री हैं, लेकिन उनके पद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान तकनीकी और कानूनी खतरा मंडरा रहा था। उन्हें जल्द से जल्द विधानमंडल का सदस्य बनना था। ऐसे में बीजेपी ने अपने सहयोगी (RLM) को साधने और गठबंधन धर्म निभाने के लिए देवेश कुमार की सुरक्षित सीट खाली करवा दी। इसे राजनीति की भाषा में ‘कुर्बानी’ कहा गया, जिससे दीपक प्रकाश के विधान परिषद जाने का रास्ता साफ हो गया।
जातीय समीकरण: भूमिहारों की नाराजगी और बीजेपी का डैमेज कंट्रोल
बिहार की राजनीति में आप सीट का लेन-देन तो कर सकते हैं, लेकिन जातियों के स्वाभिमान से समझौता करना किसी भी पार्टी के लिए भारी पड़ सकता है। देवेश कुमार का ताल्लुक एक बेहद रसूखदार राजनीतिक और सामाजिक पृष्ठभूमि से है। वे प्रख्यात किसान नेता स्वामी सहजानंद सरस्वती के दाहिने हाथ माने जाने वाले स्वतंत्रता सेनानी यमुना कार्जी के पोते हैं।
देवेश कुमार का इस्तीफा जैसे ही हुआ, बीजेपी के कोर वोटर माने जाने वाले सवर्ण समाज, विशेषकर भूमिहारों में तीखी नाराजगी फैल गई। समाज में यह संदेश जाने लगा कि गठबंधन के एक कुशवाहा नेता को सेट करने के लिए बीजेपी ने अपने ही एक स्थापित भूमिहार नेता की बलि चढ़ा दी है। बीजेपी नेतृत्व इस बात को भली-भांति समझता था कि इस नाराजगी को अगर जल्द शांत नहीं किया गया, तो यह राजनीतिक रूप से नुकसानदेह हो सकता है।
कैबिनेट मंत्री का दर्जा: एक तीर से दो निशाने
यहीं से बीजेपी ने डैमेज कंट्रोल की पटकथा लिखी। सोमवार को राज्य के योजना और विकास विभाग की अधिसूचना के जरिए देवेश कुमार को सीधे कैबिनेट मंत्री का दर्जा देकर राज्य योजना बोर्ड का उपाध्यक्ष बना दिया गया। खुद देवेश कुमार ने सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का आभार जताकर इस बात पर मुहर लगा दी कि पार्टी ने उनका पूरा ख्याल रखा है।
इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम का विश्लेषण करें तो साफ नजर आता है कि बीजेपी ने बेहद सधे हुए तरीके से अपना ‘गिव एंड टेक’ पूरा किया है। पहला निशाना: सहयोगी उपेंद्र कुशवाहा को उनके बेटे के लिए सीट देकर खुश रखा और एनडीए के भीतर एकजुटता का संदेश दिया। दूसरा निशाना: देवेश कुमार को कैबिनेट रैंक देकर भूमिहार समाज को यह साफ संदेश दे दिया कि पार्टी उनके नेताओं का सम्मान करना जानती है और किसी की भी कुर्बानी व्यर्थ नहीं जाएगी। अंततः, यह पूरा घटनाक्रम इस बात का प्रमाण है कि गठबंधन की राजनीति में फैसले सिर्फ योग्यता या जरूरत के आधार पर नहीं, बल्कि जातियों को संतुष्ट रखने और सहयोगियों को साधे रखने के जटिल गुणा-गणित के आधार पर लिए जाते हैं। देवेश कुमार की कुर्सी छिनने से लेकर उन्हें कैबिनेट मंत्री का रुतबा मिलने तक का यह सफर, बिहार की इसी विशुद्ध ‘जातीय-सियासी’ कैलकुलेशन की एक मुकम्मल केस स्टडी है।
































