बांकीपुर के जनप्रतिनिधि प्रशांत किशोर का राज्य के दो सबसे बड़े अफसरों से मिलना अचानक बिहार की सियासत में ‘पावर गेम’ बन गया, जिस पर सोशल मीडिया में बहस छिड़ते ही सरकार को खुद सामने आकर आधिकारिक चिट्ठी जारी करनी पड़ी।
न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
इस बीच पीके ने दो टूक साफ कर दिया कि यह किसी खौफ या रुतबे की नहीं बल्कि जनता की समस्याओं के समाधान की बात है, जिसके लिए वे थानेदार के पास जाने से भी परहेज नहीं करेंगे। जानिए इस मुलाकात के पीछे की पूरी इनसाइड स्टोरी और कैसे पीके ने इस प्रशासनिक विवाद का रुख सीधे शिक्षा माफिया, पेपर लीक और बेरोजगारी के बड़े मुद्दों की तरफ मोड़ दिया।
- ‘न डर, न औरा… यह अफसरों का बड़प्पन’: पीके का सीधा रुख
शीर्ष अधिकारियों से मुलाकात के बाद जब सोशल मीडिया और सियासी गलियारों में यह चर्चा शुरू हुई कि प्रशांत किशोर अपने रसूख और ताकत के दम पर अधिकारियों पर हावी हो रहे हैं, तो पीके ने इसे सिरे से खारिज कर दिया। पीके ने कहा कि इसे किसी व्यक्ति के ‘दबदबे’ के रूप में देखना गलत है; अधिकारियों ने जनता की समस्या सुनने के लिए समय निकाला, यह उनका बड़प्पन है। उन्होंने स्पष्ट संदेश दिया कि वे किसी ‘वन-अपमैनशिप’ में नहीं हैं। यदि बांकीपुर की जनता के काम के लिए मुख्य सचिव के पास जाना पड़े तो वहां भी जाएंगे, और अगर थानेदार या प्रखंड स्तर के दफ्तर में बैठना पड़े तो वहां जाने में भी कोई झिझक नहीं होगी। - सरकार की चिट्ठी: टाइमिंग, जगह और प्रोटोकॉल पर सफाई
बैठक को लेकर बनते राजनीतिक नैरेटिव के बीच सरकार के मुख्य सचिव कोषांग की ओर से आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी किया गया। पत्र में साफ किया गया कि यह कोई औचक या असाधारण बैठक नहीं थी, बल्कि 20 अगस्त 2026 को दिए गए औपचारिक अनुरोध पत्र के आधार पर 27 अगस्त को शाम 5 बजे का समय निर्धारित किया गया था। मुख्य सचिव के कक्ष में पहले से अन्य पूर्व-निर्धारित बैठक चल रही थी, इसलिए यह मुलाकात अतिथि कक्ष (Guest Room) में हुई जहां अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद थे। सरकार का यह त्वरित स्पष्टीकरण दिखाता है कि सत्ता प्रतिष्ठान किसी भी सूरत में यह संदेश नहीं जाने देना चाहता कि किसी गैर-परंपरागत नेता को कोई विशेष या गैर-प्रोटोकॉल तरजीह दी गई। - मुलाकात के बहाने बड़ा दांव: शिक्षा, कोचिंग सिंडिकेट और बेरोजगारी पर सवाल
प्रशांत किशोर ने प्रशासनिक मुलाकात के विवाद को जल्द ही राज्य के सबसे ज्वलंत मुद्दों से जोड़ते हुए विमर्श को व्यापक फलक पर ला खड़ा किया। उन्होंने देश और राज्य के छात्रों की नाराजगी को जायज ठहराते हुए तीन गंभीर संकटों की ओर ध्यान खींचा:
लगभग 50 फीसदी बच्चों का निजी स्कूलों में जाना आम परिवारों की जेब पर भारी बोझ बना हुआ है। अनियंत्रित कोचिंग संस्थानों के बढ़ते प्रभाव और परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता की कमी को पेपर लीक जैसी घटनाओं का मुख्य कारण बताया। करोड़ों युवाओं के लिए रोजगार के अवसरों की कमी। पीके के अनुसार, जब तक इन बुनियादी समस्याओं पर सख्त कदम नहीं उठेंगे, तब तक छात्रों का सड़कों पर उतरना और आंदोलन जारी रहेगा।
प्रशांत किशोर ने शीर्ष अफसरों से मुलाकात के इर्द-गिर्द खड़े किए जा रहे ‘पावर पॉलिटिक्स’ के विवाद को बड़ी चतुराई से ‘जमीनी जवाबदेही’ और ‘छात्र-युवा सरोकार’ में बदल दिया है। वहीं, सरकार की औपचारिक सफाई यह दर्शाती है कि प्रशासनिक पदानुक्रम और राजनीतिक संदेश को लेकर शासन स्तर पर भी पूरी सतर्कता बरती जा रही है।
































