न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
पटना के ‘शंभू हॉस्टल’ में नीट छात्रा की संदिग्ध मृत्यु का मामला अब केवल एक आपराधिक जांच तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह न्याय व्यवस्था और पुलिसिया कार्यशैली के प्रति उपजे गहरे अविश्वास का प्रतीक बन चुका है। शुरुआत से ही इस मामले में स्थानीय पुलिस और विशेष जांच दल (SIT) की भूमिका संदेह के घेरे में रही। परिजनों का यह आरोप कि पुलिस साक्ष्यों के साथ ‘लीपापोती’ कर रही है और उनके बयानों में बार-बार आ रहा विरोधाभास इस संदेह को और पुख्ता करता गया। जब रक्षक की भूमिका पर ही सवाल उठने लगे, तब राज्य सरकार ने जन-दबाव और न्याय की शुचिता को देखते हुए इस संवेदनशील मामले की बागडोर केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंपने की अनुशंसा की।
सीबीआई ने इस जिम्मेदारी को संभालते ही अपनी जांच की दिशा और गति से यह स्पष्ट कर दिया कि वह इस रहस्य की तह तक जाने के लिए प्रतिबद्ध है। जांच एजेंसी की टीम ने शनिवार को चित्रगुप्त नगर स्थित गर्ल्स हॉस्टल में प्रवेश करते ही सबसे पहले घटनास्थल की ‘डिजिटल मैपिंग’ पर जोर दिया। करीब तीन घंटे तक चली इस सघन छानबीन के दौरान हॉस्टल के हर उस कोने को कैमरे में कैद किया गया, जो घटनाक्रम की कड़ियों को जोड़ने में सहायक हो सकता है। यह महज एक तलाशी नहीं थी, बल्कि बिखरे हुए सुरागों को समेटने की एक वैज्ञानिक कोशिश थी।
जांच की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सीबीआई की टीम अपने साथ पांच बोरों में भरकर भौतिक साक्ष्य ले गई है। यद्यपि जांच की गोपनीयता के कारण इन बोरों में मौजूद सामग्रियों का खुलासा नहीं किया गया है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि इनमें छात्रा के निजी उपकरण, बिस्तर के अवशेष, डायरी और कमरे के अन्य सूक्ष्म फॉरेंसिक साक्ष्य शामिल हो सकते हैं। इन साक्ष्यों का केंद्रीय फॉरेंसिक लैब में परीक्षण ही यह तय करेगा कि स्थानीय पुलिस की थ्योरी में कितनी सच्चाई थी और क्या वाकई इस मामले में किसी बड़ी साजिश को छिपाने की कोशिश की गई थी।
अब सबसे बड़ी चुनौती समय के साथ धुंधले पड़ चुके साक्ष्यों को पुनर्जीवित करने की है। सीबीआई की ‘शून्य से शुरुआत’ (Investigation from Scratch) करने की यह पद्धति दर्शाती है कि वह स्थानीय पुलिस की पिछली रिपोर्टों पर आंख मूंदकर भरोसा करने के मूड में नहीं है। छात्रा के डिजिटल फुटप्रिंट्स की रिकवरी और हॉस्टल के अन्य प्रत्यक्षदर्शियों के नए सिरे से होने वाले बयान इस केस के बंद दरवाजों को खोलने की कुंजी साबित होंगे।
सीबीआई की यह शुरुआती सक्रियता पीड़ित परिवार के लिए न्याय की एक नई किरण लेकर आई है। पांच बोरों में बंद साक्ष्य केवल भौतिक वस्तुएं नहीं हैं, बल्कि वे उस सच के अवशेष हैं जिसे दबाने की कोशिशों के आरोप लगते रहे हैं। अब सबकी निगाहें फॉरेंसिक रिपोर्ट पर टिकी हैं, जो यह स्पष्ट करेगी कि उस रात हॉस्टल के बंद कमरे में वास्तव में क्या घटित हुआ था।

































