रंग ए मिलाप’ में झलकी ग्रामीण किशोरियों की नई उड़ान – कला, साहस और अभिव्यक्ति का अनोखा संगम

न्यूज स्कैन रिपाेर्टर, भागलपुर

रविवार का दिन भागलपुर के सन्हौला और खरीक प्रखंडों की किशोरियों के लिए यादगार बन गया। समवेत द्वारा आयोजित बहुप्रतीक्षित बाल अभिव्यक्ति उत्सव ‘रंग ए मिलाप’ ने न सिर्फ मंच को रंगों से भर दिया, बल्कि उन आवाज़ों को भी सुनाई दी, जो अक्सर ग्रामीण परिवेश में दब कर रह जाती हैं। लगभग 150 किशोरियां, गोकुलपुर से लेकर मनसिंगार तक के सात गांवों से, अपने सपनों, संवेदनाओं और सृजनशीलता को लेकर इस मंच पर उतरीं और पूरे माहौल को रचनात्मक ऊर्जा से भर दिया।
नृत्य-गीत से शुरू हुआ रंगों का महोत्सव

कार्यक्रम का आरंभ जिस तरह हुआ, उसने दर्शकों को पहले ही क्षण में बांध लिया। किशोरियों ने नाटक, समूह गीत, आदिवासी नृत्य और लोकनृत्य की ऐसी विविध रंगत पेश की कि तालियों की आवाज़ बार-बार गूँजती रही। इनके प्रदर्शन न सिर्फ सांस्कृतिक संवेदनशीलता से भरपूर थे, बल्कि जीवन के संघर्षों, उम्मीदों और सामाजिक परिवर्तनों की कहानी भी कह रहे थे।

किशोरियों ने उठाए ज़मीन से जुड़े मुद्दे

कार्यक्रम के मध्य आयोजित परिचर्चा, ‘वर्तमान परिस्थितियों में किशोरियों के लिए चुनौतियां’ बेहद प्रभावी रही। ग्रामीण किशोरियों ने बेझिझक वे बातें कही, जो अक्सर परिवार और समाज में कही नहीं जातीं। शिक्षा में बाधाएं, सुरक्षा के प्रश्न, डिजिटल संसाधनों की कमी और अवसरों की असमानता। ये विचार इस बात का प्रमाण बने कि किशोरियां अब सिर्फ सुनने वाली नहीं, बल्कि बोलने वाली पीढ़ी बन रही हैं।

प्रदर्शनियों ने मन मोह लिया

उत्सव का कला – संसार भी किसी से कम नहीं था।प्रेरणा केंद्र की किशोरियों द्वारा बनाये गए क्राफ्ट और पेंटिंग्स ने उनकी सूक्ष्म कल्पना और हुनर को उजागर किया। सुहानी की एकल पोस्टर प्रदर्शनी, जिसमें बाल मजदूरी पर केंद्रित संवेदनशील चित्रण था, दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर गया।आदिवासी समुदाय की पारंपरिक हस्तशिल्प प्रदर्शनी ने अपनी मौलिकता से सबका ध्यान खींचा।समवेत के प्रशिक्षक संतोष कुमार की नेचर पेंटिंग प्रदर्शनी ने दर्शकों से खास तारीफ बटोरी। अतिथियों ने सराहा – ‘यह सिर्फ कार्यक्रम नहीं, परिवर्तन की प्रक्रिया है’।

कार्यक्रम का उद्घाटन वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. अर्चना झा, साहित्यकार-चित्रकार रंजन, निदेशक विक्रम, सचिव सुनील कुमार साह, अध्यक्ष छाया पांडे, रंग-आलोचक सुनील जैन, सामाजिक कार्यकर्ता अरुणिमा सिंह, और अन्य अतिथियों ने संयुक्त रूप से किया। उनका स्वागत समवेत के सचिव सुनील कुमार साह ने किया। समवेत के निदेशक विक्रम ने कहा – ‘रंग ए मिलाप वह स्थान है जहां लड़कियां अपनी आवाज़ खोजती ही नहीं, बल्कि उसे बुलंद करती हैं। हमारा प्रयास है कि दूरस्थ बस्तियों की किशोरियां समाज के केंद्र में आएं।’ सामाजिक कार्यकर्ता अरुणिमा सिंह ने इस रचनात्मक ऊर्जा को ‘ग्रामीण प्रतिभा का शानदार विस्फोट’ बताया।
डॉ. अर्चना झा ने किशोरियों की मनोवैज्ञानिक स्वतंत्रता और आत्मसम्मान के लिए ऐसे मंचों की अनिवार्यता पर जोर दिया। रंग-आलोचक सुनील जैन ने किशोरियों के नाटक व नृत्य को ‘सांस्कृतिक चेतना का जीवंत रूप’ बताया।

समवेत टीम की सक्रिय भागीदारी

इस आयोजन को सफल बनाने में समवेत के प्रशिक्षक आनंद कुमार, संतोष कुमार, नन्दलाल, और महिला कार्यकर्ता आशा कुमारी, नीतू मुर्मू, करिश्मा, पुष्पा, सीम्मी, शालिनी, स्वीटी, चन्दना, सपना, नूतन, मनीषा और अन्य सदस्यों की अहम भूमिका रही।

लंबे सामाजिक अभियान का हिस्सा है यह रंगोत्सव

समवेत वर्षों से सन्हौला और खरीक के अनुसूचित जाति एवं जनजाति समुदायों में लैंगिक न्याय, सुरक्षा, बाल अधिकार और सहभागिता पर काम करता रहा है। ‘रंग ए मिलाप’ उसी सतत सामाजिक प्रक्रिया की रचनात्मक अभिव्यक्ति है जहां कला सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि सशक्तिकरण का साधन बन जाती है।

जब अवसर मिलता है, तो हर लड़की चमकती है। उत्सव के समापन पर यही भावना उभरकर आई कि यदि किशोरियों को सुरक्षित माहौल और सही मंच मिले, तो वे सिर्फ नृत्य-गीत में ही नहीं, बल्कि सामाजिक संवाद और नेतृत्व में भी अपनी पहचान स्थापित कर सकती हैं। ‘रंग ए मिलाप’ ने एक बार फिर साबित कर दिया।प्रतिभा गांवों में छिपी होती है, जरूरत बस उसे देखने और उभारने की होती है।