बांकीपुर का यू-टर्न : प्रशांत किशोर की ‘बिना लड़े पहली जीत’ और नीतिन नवीन की सांगठनिक विफलता ही मानी जाएगी!

पटना की हाई-प्रोफाइल बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के नामांकन से ठीक पहले भारतीय जनता पार्टी द्वारा महज 72 घंटों के भीतर अपने घोषित प्रत्याशी अभिषेक कुमार उर्फ बंटी को बदलना सिर्फ एक चेहरे का बदलना नहीं है। राजनीतिक बिसात और रणनीतिक विमर्श की दृष्टि से देखें तो यह प्रशांत किशोर की ‘जन सुराज’ की आक्रामक पॉलिटिक्स के पहले राउंड की बड़ी जीत है। इसके उलट, सूबे में भाजपा के कद्दावर नेता व राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतिन नवीन और प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी के नेतृत्व वाले सांगठनिक फीडबैक तंत्र की यह पहली बड़ी रणनीतिक व प्रशासनिक हार है।

न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
बाकीपुर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ गया है। चुनावी अखाड़े में उतरे बिना ही प्रशांत किशोर द्वारा विपक्षी खेमे को इस कदर बैकफुट पर धकेल देना बिहार की भविष्य की राजनीति का बड़ा संकेत है। बांकीपुर का यह यू-टर्न बिहार की भावी राजनीति का एक मुकम्मल ट्रेलर है। राजनीतिक विश्लेषकों के लिए यह स्पष्ट है कि प्रशांत किशोर चुनावी जंग को केवल रैलियों और नारों तक सीमित नहीं रख रहे हैं, बल्कि वे डेटा, लीगल इनपुट्स और फैक्ट्स के सहारे पारंपरिक दलों के किलों को ध्वस्त करने की क्षमता रखते हैं। दूसरी तरफ, नीतिन नवीन के लिए यह एक बड़ा सांगठनिक झटका और सबक है कि बिहार की बदली हुई राजनीतिक बिसात पर अब केवल पुराने रसूख या अपारदर्शी चयन के सहारे सीटें नहीं जीती जा सकतीं। भाजपा ने भले ही नीरज कुमार सिन्हा को लाकर अपनी तात्कालिक फजीहत बचा ली हो, लेकिन मनोवैज्ञानिक और रणनीतिक तौर पर इस पहले राउंड की बाजी प्रशांत किशोर ने मार ली है।

प्रशांत किशोर के पहले राउंड की जीत
जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर ने राजनीतिक सफर की शुरुआत में ही साफ कर दिया था कि वे पारंपरिक दलों के लूपहोल्स और जमीनी कमजोरियों पर तीखा प्रहार करेंगे। बांकीपुर में ठीक ऐसा ही हुआ। भाजपा ने 7 जुलाई को जैसे ही अभिषेक कुमार के नाम की घोषणा की, जन सुराज की कोर कमेटी और पूर्व विधायक किशोर कुमार मुन्ना के हाथों में उम्मीदवार के पारिवारिक इतिहास से जुड़े पुख्ता दस्तावेज आ गए। अभिषेक के पिता रवींद्र प्रसाद कुख्यात चारा घोटाले में न केवल चार्जशीटेड थे, बल्कि रांची की विशेष सीबीआई अदालत द्वारा उन्हें 3 साल के सश्रम कारावास और 10,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई जा चुकी थी। सीबीआई के अनुसार, उन्होंने बिना किसी वास्तविक आपूर्ति के फर्जी बिलों के जरिए घोटाले की कुल राशि का लगभग 30% हिस्सा मैसर्स मगध केमिकल कॉरपोरेशन, पटना के नाम प्राप्त किया था।

स्क्रूटनी से पहले मनोवैज्ञानिक दबाव
जन सुराज इस पूरे मामले को नामांकन पत्रों की जांच के दौरान निर्वाचन अधिकारी के समक्ष कानूनी रूप से उठाने और साथ ही इसे बांकीपुर के प्रबुद्ध मतदाताओं के बीच सबसे बड़ा मुद्दा बनाने की मुकम्मल तैयारी कर चुका था। इसके अतिरिक्त, उम्मीदवार पर शराबबंदी कानून के उल्लंघन और महिला उत्पीड़न से जुड़े कुछ स्थानीय पुलिस इनपुट्स भी सामने आने वाले थे। इस रणनीतिक और दस्तावेजी घेराबंदी ने भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के भीतर एक बड़ा सियासी डर पैदा कर दिया कि शुचिता का दावा करने वाली पार्टी ‘चारा घोटाले के दाग’ के सामने कैसे टिक पाएगी।

नीतिन नवीन की पहली सांगठनिक हार
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा प्रशासनिक पहलू भाजपा की चयन प्रक्रिया और आंतरिक सर्वे का फेल होना है। आंतरिक सूत्रों के मुताबिक, अभिषेक कुमार का नाम स्थानीय रसूख और नीतिन नवीन के वीटो के कारण बिना किसी गहन जमीनी जांच के सीधे फाइनल करा दिया गया था। पार्टी ने उम्मीदवार के पिता के इतने संवेदनशील अदालती मामलों और उनके आपराधिक बैकग्राउंड को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया।

कार्यकर्ताओं का खुला विद्रोह
टिकट की घोषणा के बाद बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र के लगभग 100 से अधिक स्थानीय नेताओं, मंडल अध्यक्षों और भाजयुमो कार्यकर्ताओं ने नीतिन नवीन और संजय सरावगी के समक्ष सीधे अपनी नाराजगी जताई। कार्यकर्ताओं ने न केवल सांगठनिक उपेक्षा बल्कि दबंगई और टिकट वितरण में अनुचित लेन-देन तक के गंभीर आरोप मढ़े। यह आंतरिक विद्रोह और जन सुराज का आसन्न हमला नीतिन नवीन के उस अभेद्य सांगठनिक गढ़ में पहली बड़ी दरार को दर्शाता है, जिसे वे पटना में लीड करते आए हैं।

राजनीतिक फजीहत बनाम मजबूरी
जब चौतरफा दबाव बढ़ा और यह साफ हो गया कि प्रशांत किशोर इस मुद्दे पर भाजपा को बांकीपुर की सड़कों से लेकर कोर्ट रूम तक घेर लेंगे, तब जाकर भाजपा ने आनन-फानन में अपना फॉर्म-बी रद्द करने और उम्मीदवार बदलने का फैसला किया। पार्टी ने अपनी घोर फजीहत से बचने के लिए आखिरी क्षणों में अपने बायोडाटा की सूची में 8वें नंबर पर मौजूद 32 वर्षीय जमीनी कार्यकर्ता नीरज कुमार सिन्हा को टिकट थमा दिया। कायस्थ जाति से आने वाले नीरज की छवि पूरी तरह साफ-सुथरी है, उनका परिवार जनसंघ के समय से जुड़ा रहा है और वे बूथ अध्यक्ष से लेकर मराठी मंडल के अध्यक्ष रहे हैं। नीरज को आगे लाना यह साबित करता है कि भाजपा प्रशांत किशोर के ‘क्लीन इमेज’ वाले नैरेटिव से इस कदर डर गई कि उसे अपने स्थापित समीकरणों को छोड़कर कैडर के सबसे आखिरी कतार के कार्यकर्ता को ढाल बनाना पड़ा।

क्यों भारी दिख रहे प्रशांत : विरोधी उम्मीदवार के घोषित होने के 48 घंटे के भीतर उसके पूरे इतिहास और अदालती दस्तावेजों को निकालकर घेराबंदी करना। भाजपा या कह लें कि नीतिन नवीन की कमी यह रही कि स्थानीय कार्यकर्ताओं और जमीनी हकीकत को दरकिनार कर केवल व्यक्तिगत पसंद के आधार पर नाम तय किया गया।
नैरेटिव बिल्डिंग: प्रशांत ने भाजपा को उसी के ‘भ्रष्टाचार विरोधी’ और ‘शुचिता’ के एजेंडे पर बैकफुट पर धकेल दिया।
दबाव में सरेंडर: टिकट चयन में इतनी बड़ी खामी छोड़ देना कि नामांकन के 72 घंटे के भीतर आधिकारिक उम्मीदवार का पर्चा वापस कराना पड़ा यह सरेंडर माना जाएगा।
बिना लड़े मनोवैज्ञानिक बढ़त : बांकीपुर जैसी भाजपा की परंपरागत सीट पर पार्टी को डिफेंसिव मोड में लाकर अपनी पहली कूटनीतिक जीत तो प्रशांत किशोर ने दर्ज कर लिया है।
आंतरिक असंतोष: 100 से अधिक पदाधिकारियों का विद्रोह भी पार्टी के भीतर स्थानीय स्तर के असंतोष को दिखाता है। इससे पार्टी की सांगठनिक एकता पर भी सवाल उठ रहे हैं।