पर्यटन स्थलों पर सजेगा ‘जीविका’ का बाजार : बिहार की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बड़े बदलाव की दस्तक

बिहार की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भरता के एक नए दौर में ले जाने की तैयारी पूरी हो चुकी है। राज्य सरकार अब ग्रामीण शिल्प, कृषि उत्पादों और पारंपरिक व्यंजनों को सीधे वैश्विक बाजार से जोड़ने जा रही है। ग्रामीण विकास मंत्री श्रवण कुमार और नाबार्ड (NABARD) के उच्च अधिकारियों की बैठक में एक ऐतिहासिक ब्लूप्रिंट तैयार किया गया है, जिसके तहत राज्य के तमाम बड़े पर्यटन स्थलों पर ‘जीविका’ दीदियों और स्थानीय किसानों के उत्पादों की बिक्री के लिए अत्याधुनिक हाट और बाजार बनाए जाएंगे।

न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
निश्चित तौर पर यह पहल केवल विभागीय बुनियादी ढांचे का विस्तार नहीं है, बल्कि ग्रामीण इलाकों में गरीबी उन्मूलन और रोजगार सृजन की दिशा में एक बड़ा ‘गेम चेंजर’ साबित होने वाली है।

जनता को सीधा फायदा क्या होगा ?
इस योजना का सबसे खूबसूरत पहलू यह है कि इसका केंद्र बिंदु समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़ा ‘गरीब-गुरबा’ है। इससे जनता को बहुआयामी स्तर पर सीधा लाभ मिलने जा रहा है। सबसे पहला और बड़ा बदलाव महिला सशक्तिकरण के रूप में दिखेगा। योजना के तहत हर प्रखंड से कम से कम 10 महिलाओं और युवतियों का चयन कर उन्हें प्लंबर, तकनीकी कार्यों और उन्नत उत्पाद निर्माण का विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा। इस कदम से ग्रामीण महिलाएं अब सिर्फ गृहस्थी तक सीमित न रहकर सीधे तौर पर परिवार की मुख्य कमाऊ सदस्य बनेंगी।

दूसरा बड़ा फायदा बिचौलियों के खात्मे के रूप में सामने आएगा। अब तक ग्रामीण कारीगरों और किसानों की सबसे बड़ी समस्या यह थी कि हाड़-तोड़ मेहनत उनकी होती थी और मलाई बिचौलिए खा जाते थे। पर्यटन स्थलों पर सीधे स्टॉल मिलने से उत्पादक और उपभोक्ता यानी पर्यटक का सीधा संपर्क होगा, जिससे ग्रामीणों की शुद्ध आय में भारी बढ़ोतरी होगी। इसके अलावा, गांवों और पंचायतों के स्तर पर ही रोजगार के नए अवसर सृजित होने से युवाओं को काम की तलाश में दूसरे राज्यों का रुख नहीं करना पड़ेगा, जिससे पलायन पर भी प्रभावी रोक लगेगी।

कैसे मुमकिन होगा यह बदलाव?
अक्सर योजनाएं फाइलों में दम तोड़ देती हैं, लेकिन इस बार सरकार और नाबार्ड ने इसे अमलीजामा पहनाकर धरातल पर उतारने के लिए एक बेहद व्यावहारिक ढांचा तैयार किया है। इसके तहत पर्यटन स्थलों पर बनने वाले इन अत्याधुनिक हाटों को सिर्फ भौतिक बाजारों तक सीमित नहीं रखा जाएगा, बल्कि इन्हें ‘डिजिटल मार्केटप्लेस’ से भी जोड़ा जाएगा। इसका मतलब है कि बिहार के किसी सुदूर गांव में जीविका दीदी द्वारा बनाया गया उत्पाद देश-विदेश का कोई भी सैलानी ऑनलाइन ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के जरिए भी खरीद सकेगा, जिससे स्थानीय उत्पादों को वैश्विक पहचान मिलेगी।

इस योजना को गति देने के लिए सरकार ने एक और मास्टर स्ट्रोक खेला है। ग्रामीण क्षेत्रों में सालों से बंद, पुराने या जर्जर पड़े सरकारी भवनों को चिह्नित किया जा रहा है। सरकार इन खाली परिसरों को आधुनिक हाट और बाजारों में तब्दील करेगी, जिससे सरकारी संपत्ति का सदुपयोग भी होगा और गांवों में व्यापार के नए केंद्र भी खुलेंगे। सरकार का लक्ष्य इतना व्यापक है कि अगले 5 वर्षों के भीतर राज्य की हर ग्राम पंचायत में कम से कम एक हाट बनकर तैयार हो जाएगा, ताकि ग्रामीण अर्थव्यवस्था का पहिया लगातार घूमता रहे।

भौगोलिक हकीकत के आधार पर अनूठी रणनीति
इस योजना की सबसे बड़ी ताकत इसकी विविधता है। सरकार ने पूरे बिहार को एक ही चश्मे से देखने के बजाय, भौगोलिक और सांस्कृतिक विशेषताओं के आधार पर अलग-अलग क्षेत्रों के लिए विशेष रणनीतियां तैयार की हैं। इसके तहत पश्चिम चंपारण, मुंगेर और नवादा जैसे पहाड़ी व दुर्गम इलाकों में विशेषज्ञों की देखरेख में पशुपालन को विशेष तौर पर बढ़ावा दिया जाएगा, ताकि वहां के गरीबों के लिए आजीविका का एक मजबूत और स्थायी मंच तैयार हो सके। वहीं राज्य के मैदानी व अन्य चयनित जिलों में बकरी पालन और उन्नत डेयरी उद्योग को प्रोत्साहित किया जाएगा, जिससे महिलाओं को कम समय और न्यूनतम लागत में सीधे दैनिक व साप्ताहिक आय से जोड़ा जा सके। इसके साथ ही, राज्य के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में पशुपालन के साथ-साथ पारंपरिक हस्तशिल्प के आधुनिकीकरण पर जोर दिया जाएगा, ताकि आदिवासी महिलाओं को समाज की मुख्यधारा में लाकर उनकी अद्भुत कला को उचित अंतरराष्ट्रीय मूल्य दिलाया जा सके।

‘टूरिज्म’ और ‘लाइवलीहुड’ का बेजोड़ समागम
जब किसी राज्य का पर्यटन केंद्र वहां की स्थानीय संस्कृति, कला और कृषि उत्पादों का शोरूम बन जाता है, तो विकास की रफ्तार स्वतः दोगुनी हो जाती है। बिहार आने वाले देश-विदेश के पर्यटकों को अब प्रामाणिक, शुद्ध और अद्वितीय स्थानीय उत्पाद सीधे उनके निर्माताओं से मिलेंगे, जिससे बिहार की एक सकारात्मक छवि दुनिया में जाएगी।

यदि इस योजना को तय समय सीमा के भीतर और बिना किसी प्रशासनिक ढिलाई के पूरी पारदर्शिता के साथ लागू किया गया, तो यह न केवल जीविका दीदियों के जीवन स्तर को सुधारेगी, बल्कि बिहार के ग्रामीण परिदृश्य को आर्थिक रूप से बेहद समृद्ध और पूरी तरह आत्मनिर्भर बना देगी। यह सही मायने में जमीनी स्तर पर बदलते बिहार की एक मुकम्मल और उम्मीदों से भरी तस्वीर है।