“पहले तुम इस्तीफा दो…” आरक्षण पर आपस में ही भिड़े मोदी के दो ‘हनुमान’!

क्रीमी लेयर और कोटे में कोटे को लेकर चिराग पासवान और जीतन राम मांझी में खुली जंग शुरु हो गई है। इस बीच एनडीए की धड़कनें भी तेज हो गई हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा एससी-एसटी आरक्षण में ‘क्रीमी लेयर’ और ‘उप-वर्गीकरण’ (कोटे में कोटा) का दरवाजा खोले जाने के बाद बिहार की राजनीति पूरी तरह से गरमा गई है। दलितों के हक की लड़ाई अब एनडीए के भीतर ही दो बड़े दलित नेताओं के बीच वर्चस्व की जंग में बदल गई है। केंद्र सरकार में मंत्री चिराग पासवान और जीतन राम मांझी अब आमने-सामने हैं। हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि दोनों ओर से एक-दूसरे को मंत्री पद से इस्तीफा देने की खुली चुनौतियां दी जा रही हैं।

न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
इस सियासी तूफान की शुरुआत तब हुई जब हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार सरकार में मंत्री संतोष कुमार सुमन ने आरक्षण की समीक्षा और एससी-एसटी कोटे के अंदर अलग से कोटा (उप-वर्गीकरण) देने की वकालत कर दी। बेटे के सुर में सुर मिलाते हुए केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने भी कहा कि आरक्षण मिलने के 80 साल बाद भी कई पिछड़ी जातियां उसी हाशिए पर खड़ी हैं, इसलिए उन्हें आरक्षण के अंदर अलग से आरक्षण मिलना ही चाहिए।
इस मांग ने लोजपा (रामविलास) के खेमे में खलबली मचा दी। केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने तत्काल प्रभाव से इसका कड़ा विरोध जताया। चिराग का साफ तर्क है कि भारत में आरक्षण गरीबी दूर करने का नहीं, बल्कि छुआछूत और सामाजिक भेदभाव मिटाने का हथियार है। चिराग पासवान ने बेहद आक्रामक रुख अपनाते हुए मांझी परिवार पर सीधा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि अगर सुप्रीम कोर्ट या जीतन राम मांझी को लगता है कि आरक्षण में ‘क्रीमी लेयर’ (मलाईदार तबका जिसे आरक्षण की जरूरत नहीं) लागू होना चाहिए, तो सबसे पहले इसकी शुरुआत मांझी परिवार को अपने घर से करनी चाहिए।


चिराग ने तर्क दिया कि जीतन राम मांझी खुद केंद्रीय कैबिनेट में मंत्री हैं और उनके बेटे संतोष सुमन बिहार सरकार में मंत्री हैं, तो वे तो स्वतः ही क्रीमी लेयर में आ गए। चिराग ने संविधान का हवाला देते हुए कहा कि आरक्षण का आधार आर्थिक है ही नहीं। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का बड़ा उदाहरण पेश किया कि देश के सबसे बड़े पद पर रहने के बावजूद पुष्कर में कोविंद जी को सामाजिक भेदभाव सहना पड़ा था, जिससे यह साबित होता है कि पैसा आ जाने से समाज में सम्मान नहीं मिल जाता। आगे चिराग ने कहा, “आजादी के बाद भी समाज में भेदभाव मिटा नहीं है। आरक्षण में ‘क्रीमी लेयर’ का कॉन्सेप्ट लाने से पहले जीतन राम मांझी जी को इस्तीफा देना चाहिए। उनके सुपुत्र भी राज्य सरकार में मंत्री हैं, वे भी पद छोड़ें। अगर संविधान ही बदलना है, तो सब लोग लोकसभा के पटल पर आएं। यह सब कहकर समाज में बंटवारा किया जा रहा है।”

मांझी का पलटवार: “हम तो दीया हैं, चिराग तो सूर्य हैं… वो इस्तीफा दें, हम पीछे-पीछे आएंगे”
इस्तीफे की चुनौती मिलने के बाद मांझी गुट भी शांत नहीं बैठा। ‘हम’ के अध्यक्ष संतोष सुमन ने चिराग पर तंज कसते हुए उन्हें बड़ा भाई बताया और कहा कि पहले बड़े भाई को पहल करनी चाहिए। सुमन ने कहा कि चिराग की पार्टी बड़ी है, अगर वे दलितों-गरीबों के हित के लिए इस्तीफा देते हैं, तो हम उनके पीछे-पीछे अपना पद छोड़ देंगे। वहीं, जीतन राम मांझी ने भी मोर्चा संभालते हुए कहा कि चिराग शायद उनके बेटे की बात समझ ही नहीं पाए हैं। मांझी ने स्पष्ट किया कि वे किसी का आरक्षण छीनने या खत्म करने की बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि उसी आरक्षण में गरीब जातियों को उनकी जनसंख्या के हिसाब से कोटा देने की मांग कर रहे हैं। उन्होंने कहा, “हम आरक्षण हटाने की बात थोड़े ही कह रहे हैं। मगर हमको आरक्षण में अलग से आरक्षण दीजिए। जनसंख्या के आधार पर कोटा दीजिए। बिहार में 22 दलित जातियां हैं, मगर चार जातियों को छोड़कर बाकी सब हाशिए पर हैं। चिराग नहीं समझ रहे हैं, इसलिए वह विरोध कर रहे हैं। पहले उनको देना चाहिए इस्तीफा।”

क्यों हो रही है यह लड़ाई?
राजनीतिक जानकारों के अनुसार, यह लड़ाई सिद्धांतों से ज्यादा वोट बैंक की है। इसके मूल में मुसहर बनाम पासवान की राजनीति है। बिहार की दलित आबादी में रविदास (5.3%) और पासवान (5.2%) जातियों का दबदबा है। राजनीतिक और सामाजिक रूप से यही दोनों जातियां सबसे मुखर हैं। मांझी (मुसहर जाति से) उन बाकी 20 दलित जातियों को एकजुट कर रहे हैं, जो नौकरियों और राजनीति में पीछे रह गई हैं। उप-वर्गीकरण से इन्हें सीधा फायदा होगा। चिराग को लगता है कि अगर कोटे में कोटा लागू हुआ, तो उनके कोर वोटर (पासवान) का आरक्षण का हिस्सा कम हो जाएगा, जिससे उनकी राजनीतिक जमीन खिसक सकती है।