बिहार में भूमि विवाद, राजस्व सुधार और मालिकाना हक का मुद्दा हमेशा से बेहद संवेदनशील और व्यापक असर वाला रहा है। सूबे में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली सरकार के आने के बाद प्रशासनिक कसावट और नीतिगत फैसलों में तेजी लाने के दावे किए जा रहे हैं। इसी कड़ी में राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री डॉ. दिलीप कुमार जायसवाल द्वारा की गई हालिया घोषणा ने सासाराम, पूर्णिया, कटिहार और राजधानी पटना सहित राज्य के विभिन्न जिलों में रहने वाले लाखों परिवारों के भीतर एक नई उम्मीद जगाई है, तो दूसरी तरफ कई नीतिगत सवाल भी खड़े कर दिए हैं।
न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
दशकों से जो लोग ‘खासमहाल’ (सरकारी पट्टे की जमीन) पर अपना आशियाना बनाकर रह रहे हैं, उन्हें अब ‘फ्री-होल्ड’ यानी पूर्ण मालिकाना हक देने की तैयारी की जा रही है। लेकिन क्या सम्राट सरकार की यह नई प्रशासनिक मशीनरी दशकों पुरानी इस पेचीदगी को आम आदमी के लिए सुगम बना पाएगी? आइए इस घोषणा की गहराई से पड़ताल करते हैं।
दशकों पुराना इंतजार और ‘बाजार मूल्य’ का पेंच
प्रदेश के विभिन्न जिलों में ऐसे हजारों परिवार हैं जो पिछले 60 से 70 वर्षों से खासमहाल की जमीन पर बसे हुए हैं। पीढ़ियां गुजर गईं, लेकिन उनके पास अपनी ही जमीन का स्थायी मालिकाना हक नहीं है। सरकार अब अगस्त के बाद इस पर एक ठोस नीति बनाने का दावा कर रही है।
आम आदमी के लिए सबसे बड़ा सवाल
मंत्री ने कहा कि “भूमि देने के लिए बाजार मूल्य का कितना फीसदी राशि ली जाए, यह तय होना बाकी है।” यही वह बिंदु है जहां आम आदमी की चिंताएं शुरू होती हैं। यदि सरकार ने बाजार मूल्य (MVR) का कोई बड़ा हिस्सा शुल्क के रूप में तय कर दिया, तो दशकों से रह रहे मध्यम और निम्न-मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए अपनी ही जमीन को ‘फ्री-होल्ड’ कराना आर्थिक रूप से असंभव हो जाएगा। क्या सम्राट सरकार लीज की अवधि और निवासियों की आर्थिक स्थिति को देखते हुए कोई जन-हितैषी या रियायती फॉर्मूला लाएगी? यह देखना अभी बाकी है।
जमीन सर्वेक्षण का महत्वाकांक्षी लक्ष्य और जमीनी हकीकत
राजस्व विभाग ने दावा किया है कि अगले दो-तीन वर्षों में पूरे राज्य में भूमि सर्वे का काम पूरा कर लिया जाएगा। इतना ही नहीं, पांच जिलों, अरवल, जहानाबाद, लखीसराय, शिवहर और शेखपुरा में आगामी 15 अगस्त तक सर्वे कार्य समाप्त करने का समय तय किया गया है।
डिजिटलीकरण और दाखिल-खारिज में सुधार के दावों के बीच ‘परिमार्जन प्लस’ पोर्टल के जरिए कार्य में तेजी लाने की बात कही गई है। परंतु, बिहार में अंचल कार्यालयों की कार्यप्रणाली और पारंपरिक लेटलतीफी से आम जनता भली-भांति परिचित है। जब तक निचले स्तर पर जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक समय सीमा के भीतर पारदर्शी सर्वे कर पाना एक बड़ी चुनौती होगी।
आम आदमी के काम की तीन बड़ी बातें :-
अभियान बसेरा-3 का आगाज: राज्य के 30 हजार भूमिहीन परिवारों को 3-3 डिसमिल जमीन आवंटित की जाएगी।
कब्जा दिलाने की विशेष मुहिम: जिन लोगों को पूर्व में जमीन मिल चुकी है परंतु दबंगों या अन्य कारणों से कब्जा नहीं मिल पाया है, उनके लिए विशेष अभियान चलाकर उन्हें जमीन पर स्थापित किया जाएगा।
अतिक्रमण मुक्ति: सरकारी जमीनों को बड़े अतिक्रमणकारियों से मुक्त कराकर वहां जनहित की योजनाएं और बहुमंजिली इमारतें बनाने का प्रस्ताव है।
क्या 8819 पदों पर बहाली से सुधरेगी व्यवस्था?
बिहार के राजस्व विभाग की सबसे बड़ी कमजोरी हमेशा से कर्मचारियों की भारी कमी रही है। वर्तमान में स्वीकृत पदों के मुकाबले बेहद कम राजस्व कर्मचारी और अमीन कार्यरत हैं। इसी कमी को दूर करने के लिए विभाग ने कुल 8,819 पदों पर एक बड़े रिक्रूटमेंट ड्राइव का खाका तैयार किया है, जिसके तहत कई स्तरों पर नियुक्तियां होनी हैं।
इस योजना के तहत विभाग में वर्तमान में कार्यरत केवल 3,709 कर्मियों की कमी को पूरा करने के लिए 8,054 नए राजस्व कर्मचारियों की बहाली का प्रस्ताव कर्मचारी चयन आयोग (BSSC) को भेजा जा चुका है। इसी तरह, जमीनी नापी के संकट को दूर करने के लिए, जहां अभी महज 1,197 अमीन कार्यरत हैं, 765 नए अमीन के पदों पर बहाली का प्रस्ताव सामान्य प्रशासन विभाग को अग्रसारित किया गया है। इसके अतिरिक्त, जमीनी स्तर पर कार्यों को गति देने के लिए ग्राम कचहरी और हल्का स्तर पर कार्यकारी सहायक की तरह डाटा एंट्री ऑपरेटरों की बहाली की भी तैयारी चल रही है।
नौकरियों का यह आंकड़ा युवाओं के लिए आकर्षक जरूर है, लेकिन बिहार में परीक्षाओं के आयोजन से लेकर नियुक्ति पत्र बांटने तक लगने वाला लंबा समय किसी से छिपा नहीं है। कर्मचारी चयन आयोग को प्रस्ताव भेजे जाने के बाद वास्तविक बहाली होने में कितना समय लगेगा, यह बड़ा यक्ष प्रश्न है। यदि नई सरकार इन बहालियों को अगले छह महीनों में मिशन मोड पर पूरा नहीं करती है, तो 2-3 साल में राज्यव्यापी भूमि सर्वे का लक्ष्य केवल कागजी बनकर रह जाएगा।
जनहित बनाम विकास के लिए भूमि अधिग्रहण
वर्तमान वित्तीय वर्ष में राज्य की 28 केंद्रीय एवं राज्य स्तरीय विकास योजनाओं के लिए 1380.59 एकड़ सरकारी भूमि उपलब्ध कराई गई है, जबकि कुल 45,748 एकड़ भूमि का अधिग्रहण तेजी से चल रहा है। मंत्री ने आश्वासन दिया है कि किसानों को उनके नुकसान का मुआवजा तेजी से दिया जाएगा। विकासात्मक परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण आवश्यक है, परंतु समय पर और उचित मुआवजा न मिलना ही बिहार में सबसे बड़े भूमि विवादों की जड़ बनता आया है।
राहत या सिर्फ प्रशासनिक एजेंडा?
नीतिगत स्तर पर खासमहाल की जमीन को फ्री-होल्ड करने और भूमिहीनों को ‘अभियान बसेरा-3’ के तहत जमीन देने का निर्णय सराहनीय है। यह सीधे तौर पर सासाराम, पूर्णिया और कटिहार जैसे शहरों के शहरीकरण और वहां की बड़ी आबादी के जीवन को स्थायित्व देगा।
परंतु, इस नई सरकार के तहत इसकी सफलता दो मुख्य बातों पर टिकी है, पहली, ‘बाजार मूल्य’ का निर्धारण व्यावहारिक हो ताकि गरीब और मध्यम वर्ग इसे वहन कर सके; और दूसरी, 8,819 पदों पर होने वाली बहाली बिना किसी विलंभ और पारदर्शिता के साथ पूरी की जाए। यदि सम्राट सरकार इन दोनों मोर्चों पर खुद को साबित नहीं कर पाती है, तो यह बड़ी घोषणा भी केवल एक प्रशासनिक शिगूफा बनकर रह जाएगी। आम जनता की नजरें अब 15 अगस्त के बाद होने वाले नीतिगत फैसले पर टिकी हैं।
































