सम्राट सरकार का बड़ा विधिक सुधार; लालफीताशाही और ‘टेबल मनी’ की संस्कृति पर लगेगी लगाम, युवाओं को घर में ही मिलेगा रोजगार
बिहार में उद्योग लगाने का सपना देखने वाले उद्यमियों और रोजगार की तलाश में भटक रहे लाखों युवाओं के लिए एक बेहद बड़ी और राहत भरी खबर है। राज्य सरकार ने सरकारी दफ्तरों की लालफीताशाही और फाइलों को लटकाने वाली सुस्त प्रशासनिक व्यवस्था की रीढ़ पर सीधा प्रहार किया है।
न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने साफ कर दिया है कि अब बिहार में उद्योग लगाने की मंजूरी किसी अधिकारी की मर्जी या टेबल के नीचे से होने वाले ‘लेन-देन’ पर निर्भर नहीं करेगी। अब आवेदन के बाद महज 30 दिनों के भीतर हर हाल में मंजूरी देनी होगी। अगर कोई विभाग तय समय में फैसला नहीं लेता, तो ‘डीम्ड क्लीयरेंस’ व्यवस्था के तहत उद्योग को स्वतः स्वीकृत मान लिया जाएगा।
यह प्रशासनिक आदेश नहीं, कानूनी फंदा है!
आमतौर पर सरकारें घोषणाएं करती हैं और वे फाइलों में दफन हो जाती हैं। लेकिन इस बार का यह फैसला अलग है। ‘बिहार औद्योगिक निवेश प्रोत्साहन अधिनियम-2016’ के तहत इस व्यवस्था को विधिक रूप से बाध्यकारी बनाया गया है। यानी, अगर कोई अफसर फाइल दबाकर बैठता है, तो कानूनन उसकी शक्तियां छीनकर सीधे ‘राज्य निवेश प्रोत्साहन परिषद’ (SIPB) सचिवालय को दे दी जाएंगी। अब विभागों के पास ‘पुनर्विचार’ का कोई बहाना नहीं बचेगा।
सरकार ने इसके लिए सभी तकनीकी और विनियामक विभागों के सक्षम अधिकारियों को एक ही छत के नीचे, यानी SIPB सचिवालय में प्रतिनियुक्त करने का फैसला लिया है, जो सीधे औद्योगिक विकास आयुक्त के प्रशासनिक नियंत्रण में काम करेंगे।
सरकार की तैयारी: 5 लाख करोड़ का टारगेट
सरकार ने इस नीति के साथ धरातल पर भी बड़ा खाका खींचा है:
20 नवंबर 2026 तक राज्य में 5 लाख करोड़ रुपये का वास्तविक निवेश धरातल पर उतारने का लक्ष्य है।
उद्योगों के लिए अब तक 8,000 एकड़ भूमि अधिग्रहित की जा चुकी है, और अगले चरण में 10,000 एकड़ और तैयार की जा रही है।
ग्रामीण और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए 25 नई चीनी मिलों की स्थापना और बंद पड़ी मिलों के पुनरुद्धार की योजना है।
उद्योग निदेशक की अध्यक्षता में ‘इन्वेस्ट बिहार निवेश संवर्धन कोष’ बनाया गया है, जो निवेशकों का रियल-टाइम डेटाबेस रख रहा है।
आम आदमी और स्थानीय युवाओं को क्या मिलेगा?
- ‘पलायन के दंश’ से मिलेगी मुक्ति:
बिहार की सबसे बड़ी त्रासदी रही है यहाँ के युवाओं का दूसरे राज्यों में जाकर मामूली वेतन पर मजदूरी करना। जब 30 दिन में फैक्ट्रियों को क्लीयरेंस मिलेगी, तो Manufacturing और फूड प्रोसेसिंग यूनिट्स तेजी से खुलेंगी। पूर्णिया, कटिहार और अररिया जैसे सीमांचल के इलाकों में जहाँ मक्का और मखाना की भारी पैदावार है, वहाँ नए प्लांट लगने से स्थानीय युवाओं को अपने ही घर में सम्मानजनक रोजगार मिलेगा। - छोटे उद्यमियों (MSMEs) को ‘टेबल मनी’ से आजादी:
बड़े उद्योगपति तो अपनी पैरवी से दिल्ली-पटना में अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) ले आते थे, लेकिन एक आम बिहारी युवा जब अपनी जमा-पूंजी लगाकर कोई छोटा उद्यम या स्टार्टअप शुरू करना चाहता था, तो दफ्तरों के चक्कर काटते-काटते उसकी चप्पलें घिस जाती थीं। 30 दिन की ऑनलाइन समय-सीमा लागू होने से निचले स्तर पर होने वाला भ्रष्टाचार और मानसिक प्रताड़ना पूरी तरह खत्म होगी। - ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों को सीधा कैश फ्लो:
चीनी मिलों के पुनरुद्धार और कृषि आधारित सहायक उद्योगों (जैसे इथेनॉल प्लांट) के आने से गन्ना और अन्य फसल उत्पादक किसानों को उनकी उपज का सही दाम समय पर मिलेगा। जब गांवों में पैसा आएगा, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। - ‘मल्टीप्लायर इफेक्ट’ से चमकेगा स्थानीय बाजार:
जब किसी इलाके में एक छोटी सी फैक्ट्री भी खुलती है, तो उसके आसपास एक पूरी नई सहायक अर्थव्यवस्था खड़ी हो जाती है। स्थानीय किराना दुकानें, चाय-नाश्ते के ढाबे, मकान-जमीन का किराया और परिवहन ऑपरेटरों (ट्रक, ट्रैक्टर, ऑटो) की कमाई में कई गुना इजाफा होता है।
राह इतनी भी आसान भी नहीं
कागजों पर और विधिक रूप से यह नीति जितनी क्रांतिकारी दिखती है, धरातल पर उसकी सफलता दो बड़ी चुनौतियों पर टिकी है, पहला, बिहार में जमीन अधिग्रहण (Land Acquisition) के विवादों का निपटारा और दूसरा, उद्योगों के लिए निर्बाध और गुणवत्तापूर्ण बिजली की आपूर्ति। अगर सरकार इन बुनियादी ढांचागत कमियों को समय रहते दुरुस्त कर लेती है, तो यह ’30-दिवसीय डीम्ड क्लीयरेंस’ नीति बिहार के औद्योगिक इतिहास का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हो सकती है।
































