बिहार की सियासत में इन दिनों सिर्फ राजनीतिक जोड़-तोड़ ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक कड़ाई और वैचारिक बदलाव की एक नई इबारत लिखी जा रही है। वीर विनायक दामोदर सावरकर की 143वीं जयंती के अवसर पर आयोजित एक विशेष पुस्तक लोकार्पण समारोह में बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने राज्य की कानून-व्यवस्था से लेकर आर्थिक नीतियों तक पर बेहद आक्रामक रुख अपनाया। उनके इस संबोधन ने राज्य के प्रशासनिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है।
न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने मंच से साफ तौर पर कहा कि सत्ता में बैठे किसी भी व्यक्ति को जातिवाद से ऊपर उठना होगा, क्योंकि जाति से चिपककर बिहार का विकास संभव नहीं है। आइए समझते हैं सम्राट चौधरी के इस कड़े रुख के पीछे की राजनीतिक रणनीति और राज्य के सामने खड़ी वित्तीय चुनौतियां…
वैचारिक एजेंडा: ‘नेशन फर्स्ट’ और सावरकर पर रिसर्च का दांव
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, मुख्यमंत्री का यह संबोधन केवल प्रशासनिक चेतावनी नहीं था, बल्कि इसके गहरे राजनीतिक मायने हैं। सम्राट चौधरी ने आरोप लगाया कि अंग्रेजों और कुछ भारतीय इतिहासकारों ने जानबूझकर हमारे वास्तविक स्वतंत्रता सेनानियों को गुमनाम रखा। उन्होंने मंच से ऐलान किया कि बिहार सरकार वीर सावरकर के जीवन, उनके बलिदान और आदर्शों पर रिसर्च करने के लिए एक विस्तृत रूपरेखा तैयार करेगी। सावरकर के राष्ट्रवाद को ‘नेशन फर्स्ट’ के नारे से जोड़कर सरकार बिहार की राजनीति में एक नया नैरेटिव सेट कर रही है, जो विकास को राष्ट्रवाद से जोड़ता है।
शिक्षा, रोजगार और अफसरों पर लगाम
प्रशासनिक स्तर पर बदलाव दिखाने के लिए मुख्यमंत्री ने पांच बड़े संकल्प साझा किए हैं :-
अपराध पर कड़ा प्रहार: कानून-व्यवस्था और ईमानदारी को सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता बताया गया है। अपराधियों और दलालों के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति लागू की जा रही है।
प्रखंडों में मॉडल स्कूल: राज्य के सभी 534 प्रखंडों में ‘सरस्वती विद्या नेतन’ मॉडल स्कूल स्थापित किए जाएंगे, ताकि निजी कॉन्वेंट स्कूलों की निर्भरता कम हो सके।
स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता: बिहार से बाहर पलायन कर चुके युवाओं की ‘घर वापसी’ के लिए सरकार ने नियम बनाया है कि ₹50 करोड़ तक के सरकारी टेंडर और कॉन्ट्रैक्ट सिर्फ बिहार के स्थानीय निवासियों को ही दिए जाएंगे।
अफसरों के विदेश दौरों पर रोक: सरकारी खजाने पर बढ़ते बोझ को रोकने के लिए अधिकारियों के विदेश दौरों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी गई है। अब प्रशासनिक अधिकारियों के लिए ‘बिहार भ्रमण’ कार्यक्रम शुरू किया गया है ताकि वे जमीन से जुड़ सकें।
निवेशक – अनुकूल नीतियां: राज्य में उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए सरकार अपनी नीतियों में लचीलापन लाने के लिए पूरी तरह तैयार है।
सम्राट ने कहा, अपराधी और भ्रष्टाचारी की कोई जाति नहीं होती। जो लोग शॉर्टकट से आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें समझ लेना चाहिए कि सरकार 48 घंटे के भीतर माकूल जवाब दे रही है और उनका अगला ठिकाना बेउर जेल ही होगा।
विशाल बजट के सामने संसाधनों का बड़ा संकट
एक तरफ जहां सरकार का प्रशासनिक और सामाजिक रोडमैप काफी मजबूत नजर आ रहा है, वहीं दूसरी तरफ राज्य के वित्तीय आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि दावों को जमीन पर उतारना आसान नहीं होगा।
बिहार की वित्तीय स्थिति: एक नजर में
कुल राज्य बजट ₹3,47,000 करोड़। राज्य की विकास योजनाओं और प्रशासनिक खर्चों को पूरा करने के लिए तय भारी-भरकम राशि।
राज्य का अपना आंतरिक राजस्व ₹60,000 करोड़। यह बिहार की अपनी कमाई है, जो कुल बजट के सामने बेहद मामूली है।
केंद्रीय निर्भरता लगभग 82%। आंतरिक राजस्व की कमी के कारण राज्य आज भी केंद्र के अनुदान और ऋण पर पूरी तरह निर्भर है।
सरकार के सामने क्या हैं बड़ी चुनौतियां?
आंतरिक राजस्व की गंभीर कमी: ₹3.47 लाख करोड़ के बड़े बजट के मुकाबले राज्य का अपना राजस्व केवल ₹60 हजार करोड़ होना एक गंभीर वित्तीय असंतुलन को दर्शाता है।
बिना बड़े निजी पूंजी निवेश और औद्योगिक क्रांति के इस खाई को पाटना नामुमकिन है।
रोजगार सृजन की परीक्षा: 14 करोड़ की आबादी वाले राज्य में, बाहर काम कर रहे युवाओं को वापस बुलाकर यहीं काम देना एक बहुत बड़ी चुनौती है। हालांकि ₹50 करोड़ तक के टेंडर स्थानीय लोगों को देना एक अच्छी शुरुआत है, लेकिन बड़े पैमाने पर रोजगार के लिए यह नाकाफी साबित हो सकता है।
निष्कर्ष यह कि मंशा साफ, लेकिन परीक्षा कठिन
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का यह आक्रामक अंदाज कानून-व्यवस्था और सुशासन के मोर्चे पर जनता के बीच एक मजबूत भरोसा पैदा करने की दिशा में सही कदम है। अपराधियों में डर पैदा करना और स्थानीय युवाओं को तरजीह देना स्वागत योग्य है।
लेकिन इस प्रशासनिक इच्छाशक्ति की असली परीक्षा आर्थिक मोर्चे पर होगी। जब तक बिहार निजी निवेश को आकर्षित करके अपने आंतरिक राजस्व को नहीं बढ़ाता, तब तक केंद्र पर अत्यधिक निर्भरता बनी रहेगी और इन महत्वाकांक्षी योजनाओं को पूरी तरह धरातल पर उतारना सरकार के लिए एक टेढ़ी खीर साबित होगा।
































