बिहार की सत्ता में ‘शीतयुद्ध’? सम्राट के ‘यू-टर्न’ से विजय सिन्हा के फैसलों पर चली कैंची; क्या यह वर्चस्व की नई जंग है?

ये सम्राट का ‘पावर प्ले’ है या विजय सिन्हा की घेराबंदी? बिहार की सत्ता में समीकरण बदल रहे हैं। बिहार की राजनीति में इन दिनों अंदरूनी हलचल तेज है। मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालते ही सम्राट चौधरी ने जिस तरह से पूर्व डिप्टी सीएम और वर्तमान कैबिनेट सहयोगी विजय कुमार सिन्हा के फैसलों को पलटना शुरू किया है, उसने राजनीतिक गलियारों में ‘कानाफूसी’ को ‘शोर’ में बदल दिया है। यह केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि बिहार भाजपा के दो सबसे बड़े चेहरों के बीच वर्चस्व की लड़ाई के रूप में देखा जा रहा है।

न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
विजय सिन्हा जब राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के प्रभारी थे, तब उन्होंने व्यवस्था सुधार के नाम पर कड़ा रुख अख्तियार किया था। हड़ताली राजस्व कर्मियों के खिलाफ 224 निलंबन की कार्रवाई उनके ‘जीरो टॉलरेंस’ मॉडल का हिस्सा थी। लेकिन सम्राट चौधरी ने मुख्यमंत्री बनते ही इन निलंबनों को रद्द करने का आदेश देकर यह संदेश दिया है कि सरकार अब ‘टकराव’ नहीं, बल्कि ‘समन्वय’ के रास्ते पर चलेगी। सम्राट का यह फैसला कर्मचारियों के बीच उनकी लोकप्रियता बढ़ाएगा, लेकिन यह सीधे तौर पर विजय सिन्हा की कार्यशैली पर एक सवालिया निशान भी खड़ा करता है।

नगर विकास विभाग: चुनाव प्रक्रिया पर ‘ब्रेक’
सिर्फ राजस्व ही नहीं, विजय सिन्हा के पास रहे नगर विकास एवं आवास विभाग में भी सम्राट चौधरी का ‘यू-टर्न’ देखने को मिला। सशक्त स्थायी समिति के चुनाव की प्रक्रिया, जो विजय सिन्हा के कार्यकाल में तेजी से आगे बढ़ रही थी, उसे मुख्यमंत्री ने शपथ लेने के अगले ही दिन रोक दिया। एक ही खेमे के दो बड़े नेताओं के बीच इस तरह का विरोधाभास प्रशासनिक गलियारों में भ्रम पैदा कर रहा है।

“कमांडर के निर्देश पर नाम प्रस्तावित किया” – बयान के मायने
राजनीतिक विश्लेषक विजय सिन्हा के उस पुराने बयान को भी याद कर रहे हैं जिसमें उन्होंने कहा था कि, “मैंने अपने कमांडर (केंद्रीय नेतृत्व) के निर्देश पर सम्राट चौधरी का नाम प्रस्तावित किया है।” इस बयान में छिपी हुई टीस अब साफ नजर आने लगी है। जानकारों का मानना है कि विजय सिन्हा खुद को रेस में आगे मान रहे थे, लेकिन संगठन के आदेश पर उन्हें पीछे हटना पड़ा। अब जब सम्राट चौधरी उनके ही पुराने फैसलों को पलट रहे हैं, तो यह विजय सिन्हा के राजनीतिक रसूख को चुनौती देने जैसा प्रतीत होता है।

क्या यह वर्चस्व की लड़ाई है?
भाजपा के भीतर ‘सप्तऋषि’ और पिछड़ा-अति पिछड़ा समीकरणों के बीच सम्राट चौधरी एक मजबूत मौर्य स्तंभ बनकर उभरे हैं। दूसरी ओर, विजय सिन्हा सवर्ण राजनीति और पार्टी के कैडर बेस का चेहरा रहे हैं। सम्राट का पक्ष है कि वे मुख्यमंत्री के नाते अपनी एक स्वतंत्र और ‘उदार’ छवि गढ़ना चाहते हैं, जो विजय सिन्हा की ‘कड़क’ छवि से अलग हो। विजय सिन्हा की चुनौती यह है कि उनके लिए अपने ही फैसलों का पलटा जाना एक असहज स्थिति पैदा करता है, जिससे उनके समर्थकों में यह संदेश जा रहा है कि नई व्यवस्था में उनकी पकड़ ढीली हो रही है।

प्रशासनिक असर और भविष्य की राह
राजस्व कर्मियों की वापसी से अंचलों में काम तो शुरू होगा और जनगणना की प्रक्रिया में भी तेजी आएगी, लेकिन सरकार के भीतर ‘दो केंद्रों’ का होना भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है। बिहार में ‘सम्राट युग’ की शुरुआत के साथ ही विजय सिन्हा के फैसलों पर चल रही कैंची यह बताती है कि आने वाले दिनों में बिहार भाजपा के भीतर शक्ति संतुलन के लिए एक मूक युद्ध छिड़ सकता है। क्या यह सम्राट चौधरी की अपनी लाइन बड़ी करने की कोशिश है, या विजय सिन्हा को हाशिए पर धकेलने की रणनीति?