घुटने बदलने के नाम से डर लगता है? जान लीजिए कि यह ऑपरेशन आपके जीवन को दोबारा दे सकता है रफ्तार


डॉ. कुमार शांतनु आनंद बिहार के पूर्णिया जिले में आनंद हॉस्पिटल में कंसलटेंट ऑर्थोपेडिक एवं फुट एंकल सर्जन हैं। वे बता रहे हैं कि घुटने बदलने से जुड़ी हिचक और भ्रांतियां क्या-क्या हैं। दर्द को ही जिंदगी समझ चुके मरीजों और उनके परिजनों के लिए यह जानकारी बेहद जरूरी है।

​आधुनिक चिकित्सा विज्ञान (Orthopaedic Surgery) के क्षेत्र में ‘टोटल नी रिप्लेसमेंट’ (TKR) को सबसे सफल और जीवन बदलने वाली प्रक्रियाओं में से एक माना जाता है। इसके बावजूद, आज भी हमारे छोटे शहरों और अर्ध-शहरी इलाकों में मरीजों के बीच इस सर्जरी को लेकर एक अनजाना डर, हिचक और कई तरह की भ्रांतियां देखने को मिलती हैं। अक्सर लोग दशकों पुराने किसी असफल अनुभव या अधूरी जानकारी के आधार पर इस सर्जरी से कतराते हैं और सालों-साल असहनीय दर्द झेलते रहते हैं।
​एक सर्जन के तौर पर हमारा यह प्राथमिक कर्तव्य है कि हम समाज को सही जानकारी दें, भ्रम को दूर करें और सही मरीज को सही समय पर इस तकनीक का लाभ उठाने का रास्ता दिखाएं।
जानिये कि ​कब जरूरी हो जाता है ‘टोटल नी रिप्लेसमेंट’? ​घुटने बदलना हर उस व्यक्ति के लिए नहीं है जिसे मामूली घुटने का दर्द हो। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, इसका एक तय दायरा है। यह सर्जरी उन मरीजों के लिए एक अचूक समाधान है जो ​एडवांस्ड ऑस्टियोआर्थराइटिस (ग्रेड III या IV) की समस्या को झेल रहे हैं। इस समस्या की वजह से अगर घुटने के कार्टिलेज पूरी तरह घिस चुके हों तो यह सर्जरी ही एकमात्र रास्ता है।
​असहनीय और निरंतर दर्द से जब परेशानी बढ़ जाए। जो रोजमर्रा के सामान्य कामों, जैसे चलने-फिरने या उठने-बैठने में भी दर्द की वजह से जब बाधा होने लगे तो आपको निश्चित तौर पर डॉक्टर से मिलकर रिव्यू करवाना चाहिए। कभी-कभी स्थिति इस तरह की हो जाती है जब घुटने के दर्द की वजह से रात की नींद भी प्रभावित होने लगती है।
कई बार इस तरह के हालात बनते हैं जब दवाईयां बेअसर होने लगती हैं। जब फिजियोथेरेपी, दर्द निवारक दवाइयां, घुटने के इंजेक्शन या अन्य पारंपरिक उपचार पूरी तरह से राहत देने में नाकाम साबित हो जाते हैं ​सही अर्थों में आधुनिक नी रिप्लेसमेंट सिर्फ घिस चुके कार्टिलेज को बदलने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह दर्द के कारण सिमट चुकी जिंदगी में मरीज की आत्मनिर्भरता और सम्मान को बहाल करने का एक जरिया है।

एक ​केस स्टडी से समझिए कि कैसे 85 वर्ष की उम्र में मिला नया जीवन
​कई बार लोग सोचते हैं कि अधिक उम्र होने पर यह सर्जरी खतरनाक हो सकती है, लेकिन यह पूरी तरह सच नहीं है। हाल ही में मेरे पास 85 वर्ष के एक बुजुर्ग मरीज आए, जो गंभीर रूप से ‘डीजेनरेटिव आर्थराइटिस’ से पीड़ित थे। उनका चलना-फिरना लगभग बंद हो चुका था। ​हमने उनकी स्थिति का सूक्ष्म आकलन किया और ‘टोटल नी रिप्लेसमेंट’ का फैसला लिया। इस सर्जरी के माध्यम से न केवल उनके पैर का टेढ़ापन (Deformity) ठीक हुआ, बल्कि घुटने का एलाइनमेंट (Alignment) भी पूरी तरह वापस आ गया। आज उनका घुटना पूरी तरह स्थिर और संतुलित है। यह उदाहरण साबित करता है कि अगर मरीज का चयन सही हो, सर्जिकल प्लानिंग सटीक हो, और पोस्ट-ऑपरेटिव रिहैबिलिटेशन (सर्जरी के बाद की कसरत) पर पूरा ध्यान दिया जाए, तो उम्र कभी बाधा नहीं बनती।

तकनीक, सुरक्षा और सीमाएं
​हर सर्जिकल प्रक्रिया की तरह टोटल नी रिप्लेसमेंट की भी अपनी सीमाएं और संभावित जोखिम होते हैं, जिन्हें छुपाया नहीं जा सकता। लेकिन जब यह ऑपरेशन एक अनुभवी सर्जन के हाथों में, आधुनिक इंप्लांट्स और सटीक सॉफ्ट-टिश्यू बैलेंसिंग के साथ किया जाता है, तो इसके परिणाम चमत्कारी होते हैं। ​संदेश साफ है कि जिंदगी को दर्द में गुजारने की जरूरत नहीं है। यदि आपको या आपके किसी परिजन को वास्तव में इस सर्जरी की आवश्यकता है, तो पुराने मिथकों या डर के कारण इसे टालें नहीं। सही मरीज में, सही समय पर और कुशलता से किया गया यह ऑपरेशन आपकी व्हीलचेयर या बैसाखी पर निर्भर जिंदगी को एक बार फिर से गतिशील और स्वतंत्र बना सकता है। घुटने के दर्द को अपनी पहचान न बनने दें; आधुनिक चिकित्सा का लाभ उठाएं और सम्मान के साथ जिएं।