देश के मध्यमवर्गीय और गरीब परिवारों के मासिक बजट का एक बहुत बड़ा हिस्सा दवाइयों के खर्च की भेंट चढ़ जाता है। इसी चौतरफा मार से आम आदमी को बचाने के लिए केंद्र सरकार ने एक बड़ा लोक-कल्याणकारी फैसला लेते हुए मधुमेह (शुगर), बीपी, दिल की बीमारी और गंभीर एलर्जी जैसी 30 सबसे जरूरी दवाओं के दाम हमेशा के लिए तय (MRP कैप) कर दिए हैं।
न्यूज स्कैन ब्यूरो, नई दिल्ली
सरकार का यह कदम सीधे तौर पर देश के करोड़ों आम नागरिकों, बुजुर्गों और उन मरीजों के हक में है जो हर महीने महंगी दवाएं खरीदने को मजबूर थे। अब दवा कंपनियां अपनी मनमर्जी से दाम बढ़ाकर आम आदमी की जेब नहीं कतर पाएंगी।
- हर महीने होने वाले खर्च में भारी कटौती
पुरानी बीमारियों (क्रोनिक डिसीज) से पीड़ित मरीजों को जीवनभर रोजाना दवाएं खानी पड़ती हैं। सरकार के इस फैसले से आम आदमी को मिलने वाली सीधी राहत को इस तालिका से समझा जा सकता है:
शुगर (डायबिटीज) के मरीजों को राहत: टाइप-2 डायबिटीज की सबसे आम और जरूरी दवा मेटफॉर्मिन अब मात्र ₹11.91 प्रति टैबलेट की अधिकतम दर पर मिलेगी। वहीं एडवांस शुगर कंट्रोल (एम्पाग्लिफ्लोजिन व सिटाग्लिप्टिन कॉम्बिनेशन) की टैबलेट अब ₹14.88 से अधिक में नहीं बेची जा सकती।
बीपी और दिल के मरीजों की बचत: ब्लड प्रेशर और हृदय रोग के लिए इस्तेमाल होने वाली बिसोप्रोलोल फ्यूमरेट और एमलोडीपाइन की गोली अब महज ₹9.40 प्रति टैबलेट की दर पर उपलब्ध होगी।
कोलेस्ट्रॉल और वसा नियंत्रण: नसें ब्लॉक होने से बचाने वाली एटोरवास्टेटिन और फेनोफाइब्रेट टैबलेट की कीमत ₹18.46 तय कर दी गई है।
हड्डियों की मजबूती: डॉक्टरों द्वारा लिखी जाने वाली विटामिन डी3 ओरल सॉल्यूशन (नैनो ड्रॉपलेट) का दाम भी घटाकर ₹14.91 प्रति मिलीलीटर कर दिया गया है।
- बुजुर्गों और पेंशनभोगियों के सम्मान की रक्षा
भारत के अधिकांश परिवारों में बुजुर्ग माता-पिता एक साथ शुगर, बीपी और जोड़ों के दर्द की दवाइयां खाते हैं। इस फैसले का सबसे बड़ा मानवीय पक्ष यह है कि अब बुजुर्गों को अपनी गाढ़ी कमाई या पेंशन का आधा हिस्सा सिर्फ केमिस्ट की दुकान पर नहीं छोड़ना पड़ेगा। दवाओं के दाम फिक्स होने से एक औसत परिवार का मासिक मेडिकल खर्च 25 से 35 प्रतिशत तक कम होने का अनुमान है, जिससे वह पैसा बच्चों की शिक्षा या अन्य जरूरी चीजों में इस्तेमाल हो सकेगा। - मेडिकल स्टोर पर धोखाधड़ी का खात्मा
अक्सर आम आदमी को मेडिकल स्टोर पर जाकर यह समझ नहीं आता था कि कौन सी कंपनी की दवा सस्ती है और कौन सी महंगी। डॉक्टर जो लिख देते थे, मरीज को मजबूरी में वही भारी-भरकम दाम चुकाने पड़ते थे।
नए नियम के तहत:
दुकान पर रेट लिस्ट देखना अनिवार्य: अब हर मेडिकल स्टोर को इन 30 दवाओं की सरकारी मूल्य सूची (प्राइस लिस्ट) दुकान के बाहर या काउंटर पर प्रमुखता से चिपकानी होगी।
जीएसटी (GST) का खेल खत्म: दवा कंपनियां अब खुदरा मूल्य (MRP) पर मनमाना टैक्स नहीं जोड़ पाएंगी। टैक्स केवल तभी जोड़ा जाएगा जब कंपनी ने वास्तव में सरकार को टैक्स चुकाया हो।
- लूट मचाने वाली कंपनियों पर सरकार का कड़ा हंटर
आम आदमी को सबसे बड़ी सुरक्षा यह दी गई है कि अगर कोई भी दवा विक्रेता या कंपनी तय सरकारी रेट से एक रुपया भी ज्यादा वसूलती है, तो सरकार उससे वह अतिरिक्त पैसा ब्याज समेत वापस छीनेगी। नियामक संस्था (NPPA) ने इसके लिए सख्त दंडात्मक चेतावनी जारी कर दी है।
सरकार का यह फैसला शुद्ध रूप से “आम आदमी की रसोई और दवा की अलमारी” को संतुलित करने वाला है। स्वास्थ्य सुविधाओं को अमीर-गरीब के भेद से ऊपर उठाकर सबके लिए सुलभ बनाना ही इस नीति का मूल विज़न है। अब देश के आम नागरिक को इलाज के लिए कर्ज लेने या अपनी बुनियादी जरूरतों से समझौता करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
































