पंचायती राज व्यवस्था में एक बहुत बड़ा और क्रांतिकारी नीतिगत बदलाव होने जा रहा है। 16वें वित्त आयोग ने वित्तीय वर्ष 2026-27 से 2030-31 के लिए धन आवंटन का पूरा फॉर्मूला ही बदल दिया है। इसके तहत अब ग्राम पंचायतों को मिलने वाला फंड उनके ‘काम और प्रदर्शन’ (Performance) से तय होगा। बिहार की पंचायतों के लिए कुल 51 हजार 923 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि की अनुशंसा की गई है, जिसमें से ग्राम पंचायतों की हिस्सेदारी को 70% से बढ़ाकर 80% कर दिया गया है।
न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
जानिए कि इस फैसले से ग्रामीण सत्ता का संतुलन कैसे बदलेगा और गाँव के आखिरी छोर पर बैठे आम आदमी की जिंदगी में क्या तब्दीली आएगी।
- वित्तीय ताकत का ‘डिसेंट्रलाइजेशन’
अब तक के फॉर्मूले में पंचायत समिति और जिला परिषद को अधिक फंड मिलता था। लेकिन नए फॉर्मूले के तहत अब कुल राशि का 80 फीसदी सीधे ग्राम पंचायतों (मुखिया स्तर पर) को जाएगा, जबकि पंचायत समिति और जिला परिषद के खाते में केवल 10-10 फीसदी राशि ही आएगी। इससे ब्लॉक और जिला स्तर की नौकरशाही पर ग्राम पंचायतों की निर्भरता कम होगी और स्थानीय स्तर पर फैसले तेजी से लिए जा सकेंगे। - ‘काम करो, पैसा पाओ’ का नया प्रशासनिक नियम
मूल अधिकार या ‘बेसिक ग्रांट’ तो सभी पंचायतों को समान रूप से मिलेगी, लेकिन कुल फंड का 20 प्रतिशत हिस्सा ‘कार्य क्षमता’ (Performance) से जोड़ दिया गया है। जो पंचायतें टैक्स कलेक्शन, स्वच्छता प्रबंधन और नागरिक सुविधाओं में बेहतर रिकॉर्ड दिखाएंगी, उन्हें 20% तक अतिरिक्त राशि मिलेगी। इससे पंचायतों के बीच विकास कार्यों को लेकर एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा (Healthy Competition) पैदा होगी।
आम आदमी पर ऐसे फैसलों का क्या असर होता है?
किसी भी नीति की असली सफलता इस बात से तय होती है कि उससे आम नागरिक को क्या मिला।
इस फैसले का गाँव के आम आदमी पर सीधा और गहरा असर होने जा रहा है :-
- रोजमर्रा की बुनियादी समस्याओं का त्वरित समाधान:
फंड का 80% हिस्सा सीधे ग्राम पंचायत के पास होने से नाली, गली, खड़ंजा, और सोलर स्ट्रीट लाइट जैसे छोटे लेकिन अति-आवश्यक कार्यों के लिए अब आम आदमी को महीनों इंतजार नहीं करना पड़ेगा। गाँव की संसद (ग्राम सभा) में पास प्रस्ताव के आधार पर तुरंत काम शुरू हो सकेगा। - ‘स्वच्छता और जल प्रबंधन’ से सुधरेगा स्वास्थ्य का स्तर:
अधिसूचना के अनुसार, कुल राशि का 50 फीसदी हिस्सा स्वच्छता, ठोस अपशिष्ट (कूड़ा) प्रबंधन और जल प्रबंधन (टायड घटक) पर ही खर्च करना अनिवार्य है। इसका सीधा असर आम आदमी के स्वास्थ्य और पर्यावरण पर पड़ेगा। गाँवों में जलभराव की समस्या खत्म होगी, शुद्ध पेयजल (नल-जल योजना) का सुचारू संचालन होगा और बीमारियों में कमी आएगी। - गाँव में ही मिलेंगी ‘शहरी सुविधाएं’:
इस बजट का एक बड़ा हिस्सा खुले जिम (ओपन जिम), पार्कों/उद्यानों का निर्माण, खेल के मैदान, आंगनबाड़ी केंद्रों का आधुनिकीकरण, सामुदायिक भवनों और स्कूलों की चहारदीवारी के साथ-साथ वाई-फाई सुविधा से लैस पुस्तकालयों (लाइब्रेरी) पर खर्च किया जाएगा। इससे गाँव के युवाओं और बच्चों को पढ़ाई और सेहत के लिए वैसी ही सुविधाएं मिलेंगी जैसी शहरों में मिलती हैं। - भ्रष्टाचार पर लगाम और पारदर्शिता:
चूंकि परफॉर्मेंस ग्रांट पाने के लिए पंचायतों को अपनी आय बढ़ाने और पारदर्शी तरीके से काम करने का डेटा ‘एकीकृत डेटाबेस’ पर देना होगा, इसलिए मुखिया या स्थानीय जनप्रतिनिधियों की मनमानी कम होगी। आम आदमी अब सीधे अपने वार्ड के विकास का हिसाब मांग सकेगा।
16वें वित्त आयोग का यह नया फॉर्मूला कागजी विकास को जमीनी हकीकत में बदलने की एक गंभीर कोशिश है। आम आदमी के नजरिए से देखें तो यह फैसला गाँव के पैसे को सीधे गाँव के विकास में लगाने की गारंटी देता है। बशर्ते, ग्राम सभाएं सजग रहें और यह सुनिश्चित करें कि विकास योजनाओं का चयन राजनीति से ऊपर उठकर जनहित में हो। यह नीति बिहार के ग्रामीण इलाकों के सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य को बदलने की पूरी क्षमता रखती है।
































