बिहार में नई सरकार के गठन और सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद भी कैबिनेट विस्तार का मामला अधर में लटका हुआ है। चर्चा है कि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने भाजपा कोटे के मंत्रियों की एक संभावित सूची केंद्रीय नेतृत्व को भेजी थी, जिसे ‘क्षेत्रीय और जातीय संतुलन’ की कमी बताकर फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। यह देरी केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि बिहार भाजपा के भीतर मचे आंतरिक घमासान और ‘ईगो क्लैश’ का नतीजा मानी जा रही है।
न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
सम्राट की सूची पर दिल्ली दरबार ने वीटो लगा दिया है और तत्काल रोक दिया है। सूत्रों के अनुसार, सम्राट चौधरी ने पिछले कार्यकाल के मंत्रियों के प्रदर्शन (Performance) के आधार पर एक सूची तैयार की थी। लेकिन दिल्ली दरबार को इस लिस्ट में वह ‘सर्वसमावेशी’ चेहरा नजर नहीं आया जिसकी जरूरत भविष्य की राजनीति के हिसाब से है। हाईकमान चाहता है कि मंत्रिमंडल में जातिगत समीकरण (Social Engineering) और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व का सटीक संतुलन हो, ताकि किसी भी वर्ग में नाराजगी न उपजे।
‘चार गुट और चार दिशाएं’: भाजपा की आंतरिक चुनौती
बिहार भाजपा इस वक्त केवल विपक्षी दलों से ही नहीं, बल्कि अपने भीतर की गुटबाजी से भी जूझ रही है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि पार्टी मुख्य रूप से चार ध्रुवों में बंटी है। पहला गुट नित्यानंद राय गुट का है। यह गुट केंद्रीय नेतृत्व के करीबी है और नित्यानंद का अपना कद भी मजबूत है। दूसरा गुट सम्राट चौधरी का है। वे वर्तमान में मुख्यमंत्री हैं और भाजपा में उभरते चेहरा हैं। तीसरा गुट है विजय कुमार सिन्हा का। वे पार्टी के पुराने और अनुभवी चेहरा हैं। भूमिहार समाज के भी ये बड़े चेहते हैं। एक और गुट है नितिन नवीन का। राष्ट्रीय राजनीति में नितिन का बढ़ता कद उनकी सबसे बड़ी ताकत है। इन चारों गुटों के बीच अपने-अपने समर्थकों को कैबिनेट में ‘एडजस्ट’ कराने की होड़ ने आलाकमान की सिरदर्दी बढ़ा दी है।
विजय कुमार सिन्हा: नाराजगी या राजनीतिक दांव?
कैबिनेट विस्तार में सबसे बड़ी पेचीदगी विजय कुमार सिन्हा को लेकर है। उनके हालिया बयान कि उन्होंने ‘गठबंधन धर्म’ के कारण सम्राट चौधरी के नाम का प्रस्ताव दिया… ने उनके असंतोष को सार्वजनिक कर दिया है। भूमिहार समाज का एक बड़ा वर्ग इस फैसले से खुद को हाशिए पर महसूस कर रहा है। अब चुनौती यह है कि विजय सिन्हा को कौन सा विभाग दिया जाए? क्या उन्हें फिर से ‘राजस्व एवं भूमि सुधार’ जैसा महत्वपूर्ण मंत्रालय मिलेगा, जहाँ उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाई थी, या उन्हें कोई भारी-भरकम विभाग देकर उनकी नाराजगी को शांत किया जाएगा?
‘परफॉरमेंस’ बनाम ‘नए चेहरे’
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी अपनी टीम में ‘युवा जोश’ चाहते हैं। वे चाहते हैं कि जेडीयू की तरह भाजपा में भी युवा विधायकों को मौका मिले। ऐसे में पुराने दिग्गजों का पत्ता कटने का डर है। जिन मंत्रियों का प्रदर्शन पिछली सरकार में ढीला रहा, उनके सिर पर गाज गिरना तय माना जा रहा है।
आयातित विधायकों का ‘कोटा’
भाजपा के लिए एक और बड़ी चुनौती वे विधायक हैं जो दूसरी पार्टियों (आरजेडी या जेडीयू) को छोड़कर भाजपा में शामिल हुए हैं। अगर पार्टी केवल पुराने कैडर को तरजीह देती है, तो ‘आयातित’ विधायक खुद को ठगा हुआ महसूस करेंगे। संतुलन बनाने के चक्कर में भाजपा ऐसी खिचड़ी पकाने से बचना चाहती है जिससे संगठन के भीतर का मूल कार्यकर्ता ही नाराज हो जाए।
फिलहाल बिहार भाजपा में ‘वेट एंड वॉच’ की स्थिति है। सम्राट चौधरी के लिए चुनौती सिर्फ विपक्ष नहीं, बल्कि अपनी ही पार्टी के दिग्गज नेताओं और दिल्ली के मानकों के बीच सामंजस्य बिठाना है। विजय सिन्हा का ‘सस्पेंस’ और गुटबाजी का ‘पेच’ जब तक सुलझता नहीं, तब तक बिहार कैबिनेट का विस्तार टलना लगभग तय है।
































