बिहार की राजनीति के दिग्गज और राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव के लिए सोमवार का दिन कानूनी गलियारों में मिली-जुली प्रतिक्रिया लेकर आया। ‘लैंड फॉर जॉब’ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने लालू यादव की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें उन्होंने सीबीआई द्वारा दर्ज प्राथमिकी (FIR) और चार्जशीट को रद्द करने की मांग की थी। हालांकि, अदालत ने उन्हें व्यक्तिगत पेशी से छूट देकर एक बड़ी राहत भी दी है। आखिर क्या हैं इसके मायने ये विस्तार से समझते हैं…..
न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
यह फैसला लालू यादव के लिए “कानूनी कवच” तो नहीं लाया, लेकिन “प्रशासनिक राहत” जरूर दे गया। अब सबकी नज़रें ट्रायल कोर्ट पर टिकी हैं, जहाँ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की विभिन्न धाराओं और सीबीआई के सबूतों के बीच जोरदार बहस देखने को मिलेगी।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला: तकनीकी पेंच और ‘झटका’
जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने स्पष्ट किया कि इस मामले में ट्रायल कोर्ट में मुकदमा जारी रहेगा। लालू यादव की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A का हवाला देते हुए दलील दी थी कि किसी भी जांच के लिए सरकार की पूर्व अनुमति अनिवार्य है, जो इस केस में नहीं ली गई।
अदालत का रुख: सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इस कानूनी मुद्दे (धारा 17A पुरानी तारीख से लागू होगी या नहीं) पर कोई अंतिम राय जाहिर नहीं की है। पीठ ने कहा कि ट्रायल कोर्ट साक्ष्यों के आधार पर केस के गुण-दोषों की जांच करने के लिए स्वतंत्र है।
हाईकोर्ट के फैसले पर मुहर: सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा जिसमें कहा गया था कि धारा 17A (जो 2018 में जोड़ी गई) का प्रभाव पूर्वव्यापी (Retroactive) नहीं होगा, क्योंकि यह कथित अपराध 2004 से 2009 के बीच का है।
राहत का पहलू: व्यक्तिगत पेशी से छूट
भले ही केस रद्द नहीं हुआ, लेकिन लालू यादव के स्वास्थ्य और उम्र को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें निचली अदालत में ट्रायल के दौरान व्यक्तिगत रूप से पेश होने से स्थायी छूट दे दी है। यह उनके लिए एक बड़ी राहत है क्योंकि उन्हें अब हर सुनवाई पर शारीरिक रूप से कोर्ट में मौजूद नहीं रहना होगा।
भविष्य की चुनौतियां: ट्रायल कोर्ट में कानूनी जंग
अदालत ने लालू यादव को यह स्वतंत्रता दी है कि वे सीबीआई द्वारा मुकदमे के लिए ली गई मंजूरी (Sanction) से जुड़े तकनीकी सवालों को ट्रायल कोर्ट के सामने उठा सकते हैं। इसका मतलब है कि अब असली कानूनी लड़ाई ट्रायल कोर्ट में गवाहों और सबूतों के आधार पर लड़ी जाएगी।
































