बिहार में बुनियादी ढांचे (Infrastructure) की मजबूती और हादसों को रोकने के लिए सरकार अब अंतरिक्ष विज्ञान और अत्याधुनिक सेटेलाइट तकनीक का सहारा लेने जा रही है। राज्य में लगातार सामने आई पुलों की ढांचागत समस्याओं को देखते हुए पथ निर्माण विभाग ने इंफ्रास्ट्रक्चर की सेहत जांचने के लिए एक बेहद आधुनिक और आक्रामक नीति तैयार की है। इसके तहत अब जमीन पर तैनात इंजीनियरों के साथ-साथ आसमान से सेटेलाइट भी राज्य के बड़े पुलों की चौबीसों घंटे निगरानी करेंगे।
न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
इस अत्याधुनिक प्रोजेक्ट को धरातल पर उतारने के लिए विभाग ने इजराइल के तकनीकी विशेषज्ञों से सीधा संपर्क साधा है, जो इस क्षेत्र की वैश्विक तकनीकों के मास्टर माने जाते हैं। विभाग के स्तर पर सेटेलाइट के जरिए होने वाली इस हाई-टेक जांच की उपयोगिता और कार्यकुशलता को लेकर विस्तृत अध्ययन शुरू कर दिया गया है। जल्द ही इस पूरे मैकेनिज्म को लागू करने के लिए एक फाइनल एक्शन प्लान सार्वजनिक किया जाएगा।
क्यों पड़ी सेटेलाइट तकनीक की जरूरत?
हाल के महीनों में राज्य के विभिन्न हिस्सों में पुलों के क्षतिग्रस्त होने और उनमें दरारें आने की गंभीर घटनाएं सामने आई हैं, जिसके बाद मैन्युअल चेकिंग के पारंपरिक तरीकों पर सवाल उठ रहे थे। विभाग अब किसी भी नए हादसे को रोकने के लिए ‘अर्ली वॉर्निंग सिस्टम’ विकसित करना चाहता है।
हालिया घटनाओं पर एक नजर:
भागलपुर (03 मई, 2026): भागलपुर जिले में स्थित महत्वपूर्ण विक्रमशिला सेतु का एक स्पैन गंगा नदी में धंस गया, जिसने सुरक्षा मानकों को लेकर बड़ी चिंता पैदा कर दी।
गोपालगंज (23 मई, 2026): गंडक नदी पर बने एक मुख्य पुल के स्पैन में खतरनाक दरारें देखी गईं, जिसके बाद एहतियातन वहां से वाहनों का आवागमन रोकना पड़ा।
जमुई (फरवरी 2026): खैरा-सोनो मार्ग पर नरियाना-मांगोबंदर पुल का हिस्सा क्षतिग्रस्त होने से यातायात पूरी तरह बाधित हुआ था।
IIT पटना का अलर्ट
पुलों की सेहत पर आईआईटी पटना की ओर से आई एक तकनीकी रिपोर्ट में राज्य के करीब आधा दर्जन प्रमुख पुलों की स्थिति को संवेदनशील बताते हुए तत्काल प्रभाव से उनकी मरम्मत करने की सिफारिश की गई है।
कैसे काम करेगी अंतरिक्ष वाली यह तकनीक?
वैज्ञानिकों और इंफ्रास्ट्रक्चर विशेषज्ञों के अनुसार, सेटेलाइट के जरिए पुलों की निगरानी का तरीका बेहद सटीक और शक्तिशाली होता है:
रडार अमेजिंग टेक्नोलॉजी (Radar Imaging): इस तकनीक के जरिए सेटेलाइट से पुल के ढांचे पर विशेष रडार तरंगें छोड़ी जाती हैं।
सूक्ष्म हलचल की पहचान: यह तकनीक शोधकर्ताओं और विश्लेषकों को मिलीमीटर स्तर (Millimeter-level) के बदलावों, छोटे ढांचागत झुकावों या आंतरिक दरारों को पकड़ने में मदद करती है।
मानवीय आंखों से परे जांच: ऐसी सूक्ष्म कमियां या झुकाव जो आम तौर पर इंजीनियरों को नंगी आंखों से दिखाई नहीं देते, उन्हें यह तकनीक बहुत पहले ही पकड़कर ‘अलर्ट’ जेनरेट कर देती है। इससे बड़े हादसों को समय रहते टाला जा सकता है।
सालाना दो बार होगी सघन जांच
इस नए प्रोजेक्ट को लेकर पथ निर्माण विभाग के शीर्ष अधिकारियों और इजराइल के विशेषज्ञों के बीच वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पहले दौर की एक विस्तृत तकनीकी बैठक संपन्न हो चुकी है। इस बैठक में सेटेलाइट से डेटा हासिल करने और उसके विश्लेषण की व्यावहारिक बारीकियों को समझा गया है। इसके समानांतर, बिहार राज्य पुल निर्माण निगम ने भी एक बड़ा नीतिगत फैसला लेते हुए तय किया है कि राज्य भर के सभी पुलों का साल में अनिवार्य रूप से दो बार फिजिकल और टेक्निकल ऑडिटकिया जाएगा। इसी कड़ी में अब तक राज्य भर के करीब 4,000 से अधिक छोटे-बड़े पुलों की स्क्रूटनी की जा चुकी है, हालांकि राहत की बात यह है कि प्राथमिक जांच में फिलहाल किसी बड़े पुल में कोई तत्काल खतरा नजर नहीं आया है।
अधिकारियों के लिए बनेगी नई एसओपी (SOP)
पथ निर्माण मंत्री ई. कुमार शैलेंद्र के निर्देशों के अनुसार, विभाग के स्तर पर पुलों की नियमित देखभाल और सुरक्षा को लेकर एक नया मानक संचालन तंत्र (Standard Operating Procedure – SOP) विकसित किया जा रहा है। पुलों की सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी अब संबंधित क्षेत्र के इंजीनियरों और तकनीकी टीम की होगी। नए एसओपी के तहत फील्ड इंजीनियरों को सेटेलाइट से मिलने वाले डेटा के आधार पर तुरंत ग्राउंड एक्शन लेना होगा, ताकि मरम्मत के कार्य में प्रशासनिक देरी को पूरी तरह खत्म किया जा सके।
































