न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
बिहार की प्रशासनिक मशीनरी में गहरे तक पैठ बना चुके भ्रष्टाचार पर लगाम कसने के लिए नीतीश सरकार ने एक बार फिर कड़े तेवर दिखाए हैं। राज्य के महानिदेशक सह मुख्य जांच आयुक्त दीपक कुमार सिंह ने सूबे के सभी आला अधिकारियों यानी डीजीपी से लेकर कमिश्नर और डीएम तक को पत्र लिखकर भ्रष्टाचार के लंबित मामलों में ‘फौरी एक्शन’ का अल्टीमेटम दिया है। सरकार का यह कदम आय से अधिक संपत्ति (DA) और रिश्वतखोरी के मामलों में आरोप पत्र (चार्जशीट) दाखिल करने की कछुआ चाल को बदलने की एक कोशिश है।
नई रणनीति: सिर्फ ‘रंगे हाथ’ पकड़ना काफी नहीं
अक्सर देखा गया है कि भ्रष्टाचार के मामलों में त्वरित गिरफ्तारी तो हो जाती है, लेकिन कानूनी दांव-पेंच और कागजी खानापूर्ति की कमी के कारण दोषी बच निकलते हैं। सरकार ने अब स्पष्ट निर्देश दिया है कि :
साक्ष्यों की सघनता : केवल एफआईआर या ट्रैप की घटना को आधार न मानकर आरोपी के पूरे कार्यकलापों और संपत्ति विवरण की सूक्ष्म जांच होगी।
समय सीमा का बंधन: अनुशासनिक कार्यवाही को तय समय के भीतर पूरा करना अनिवार्य होगा ताकि अपराधी को सजा मिलने में देरी न हो।
सालाना संपत्ति का मिलान: हर साल जमा किए जाने वाले संपत्ति विवरण को अब जांच का मुख्य हिस्सा बनाया जाएगा।
जमीन पर कितनी प्रभावी होगी यह ‘नकेल’?
सरकारी सक्रियता अपनी जगह सराहनीय है, लेकिन बिहार जैसे राज्य में जहां भ्रष्टाचार की जड़ें ब्लॉक स्तर से लेकर सचिवालय की फाइलों तक फैली हैं, वहां केवल पत्रों से बदलाव लाना एक बड़ी चुनौती है।
जड़ों की गहराई: बिहार में भ्रष्टाचार केवल ‘लेन-देन’ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक कार्यशैली का एक हिस्सा बन चुका है।
‘आय से अधिक संपत्ति’ के मामलों की भरमार यह बताती है कि निगरानी विभाग की लाख सख्ती के बावजूद रसूखदारों में डर की कमी है।
प्रशासनिक लापरवाही का कवच: जैसा कि रिपोर्ट में स्वीकार किया गया है, 99 प्रतिशत मामलों में चार्जशीट दाखिल करने में लापरवाही बरती जाती है।
जब तक जांच अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक ‘जीरो टॉलरेंस’ महज एक सरकारी नारा बना रहेगा।
जांच इकाइयों पर दबाव: क्या हमारी जांच इकाइयों के पास इतने संसाधन और मैनपावर है कि वे हर विभाग के हजारों लंबित मामलों की इतनी गहराई से जांच कर सकें? इसे भी देखना होगा।
सरकार का ताजा निर्देश एक सही दिशा में उठाया गया कदम तो है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि यह सचिवालय से निकलकर उन छोटे दफ्तरों तक कितनी सख्ती से पहुंचता है जहां आम आदमी रोज भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ता है।
फाइलों की तेजी अगर दोषियों को जेल की सलाखों तक पहुंचाने में तब्दील होती है, तभी बिहार में वास्तविक प्रशासनिक सुधार देखने को मिलेगा।
































