न्यूज स्कैन ब्यूरो, नई दिल्ली/पटना
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजे केवल एक जीत नहीं, बल्कि भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के चुनाव प्रबंधन की एक नई केस स्टडी है। बीजेपी अब बिहार में ‘छोटे भाई’ की भूमिका से निकलकर आधिकारिक तौर पर ‘बिग ब्रदर’ बन चुकी है। इस कायापलट के पीछे कोई जादुई छड़ी नहीं, बल्कि पार्टी का वह ‘स्पेशल 45’ का फॉर्मूला था, जिसने जमीन पर रहकर हवा का रुख मोड़ दिया।
आज दिल्ली में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने इन्हीं 45 रणनीतिकारों को डिनर पर बुलाया है। लेकिन सियासी गलियारों में चर्चा है कि यह डिनर सिर्फ जीत के जश्न के लिए नहीं, बल्कि इस ‘बिहार मॉडल’ को अन्य राज्यों में लागू करने की डीब्रीफिंग (Debriefing) है। बिहार के नतीजों ने साबित कर दिया है कि चुनाव अब सिर्फ भाषणों से नहीं, बल्कि डेटा, माइक्रो-मैनेजमेंट और बूथ स्तर की सटीक इंजीनियरिंग से जीते जाते हैं। बीजेपी की यह ‘स्पेशल 45’ टीम उसी इंजीनियरिंग का हिस्सा थी, जिसने बिहार में फिर से ‘नीतीशे सरकार’ तो बनाई, लेकिन लगाम इस बार मजबूती से बीजेपी के हाथ में थमा दी।
क्या था ‘स्पेशल 45’ का अभेद्य चक्रव्यूह?
बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व ने इस बार बिहार चुनाव को पारंपरिक प्रचार तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने ‘माइक्रो-मैनेजमेंट’ की जिम्मेदारी बिहार के स्थानीय नेताओं के बजाय दूसरे राज्यों के अनुभवी नेताओं को सौंपी। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान और दिल्ली जैसे राज्यों से 45 चुनिंदा नेताओं की एक फौज तैयार की गई। रणनीति स्पष्ट थी, वन लीडर-वन जोन : हर बाहरी नेता को एक लोकसभा क्षेत्र और उसके अंतर्गत आने वाली विधानसभा सीटों का जिम्मा सौंपा गया।
लोकल नहीं, न्यूट्रल फीडबैक
चूंकि ये नेता बिहार की गुटबाजी से दूर थे, इसलिए इनका फीडबैक स्थानीय नेताओं की तुलना में ज्यादा निष्पक्ष और सटीक था। पड़ोसी राज्यों के मंत्री और सांसद होने के बावजूद, इन नेताओं ने आम कार्यकर्ता की तरह गलियों की खाक छानी। स्थानीय मुद्दों को समझा और बिना किसी वीआईपी प्रोटोकॉल के एनडीए के लिए माहौल बनाया।
इस पूरे ऑपरेशन का खाका केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान (चुनाव प्रभारी) ने खींचा था, जबकि ‘पेज कमिटी’ और जमीनी प्रबंधन का जिम्मा केंद्रीय मंत्री सीआर पाटिल और यूपी के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य (सह-प्रभारी) के पास था। इन नेताओं ने सुनिश्चित किया कि संगठन और सरकार के बीच कोई गैप न रहे।
बिहार मॉडल की सफलता के बाद आगे क्या
अब बंगाल और तमिलनाडु की बारी? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नड्डा का आज का डिनर दरअसल एक ‘फीडबैक सेशन’ है। बिहार में मिली इस बंपर जीत ने बीजेपी को एक नया फॉर्मूला दे दिया है, “बाहरी नेतृत्व, स्थानीय कार्यान्वयन”। सूत्रों के मुताबिक, जिन नेताओं ने बिहार की जटिल जातिगत समीकरणों के बीच कमल खिलाया है, उनके अनुभवों का इस्तेमाल अब पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और असम के आगामी विधानसभा चुनावों में किया जाएगा। बिहार का यह ‘हाइब्रिड प्रचार मॉडल’ बीजेपी के लिए भविष्य का चुनावी ब्लूप्रिंट बन सकता है।
कौन थे इस जीत के साइलेंट आर्किटेक्ट? इस ‘स्पेशल 45’ टीम में कई बड़े नाम शामिल थे जिन्होंने अपनी स्टेट की राजनीति छोड़कर बिहार में डेरा डाला:
मध्य प्रदेश से : वीडी शर्मा (पूर्व प्रदेश अध्यक्ष), केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद पटेल।
उत्तर प्रदेश से : मंत्री स्वतंत्र देव सिंह, सांसद सतीश गौतम।
गुजरात से : सांसद देवुसिंह चौहान।
दिल्ली व अन्य : रमेश बिधूड़ी, राजेंद्र राठौड़ (राजस्थान), और संतोष पांडे (छत्तीसगढ़)।
































