टाल क्षेत्र के ‘रॉबिनहुड’ से बाहुबली तक: दुलारचंद यादव की कहानी

  • लालू के भरोसेमंद से नीतीश के करीब और जनसुराज तक का सफर, मोकामा की राजनीति में फिर लौटा ‘बाहुबल’ का दौर!

मदन, भागलपुर

बिहार की राजनीति एक बार फिर उस दौर की यादें ताजा कर रही है, जब ‘बाहुबल’ और ‘बैलट’ साथ-साथ चलते थे। मोकामा विधानसभा क्षेत्र के तारतर गांव में जन्मे दुलारचंद यादव की हत्या ने सत्ता, जाति और ताकत के इस पुराने समीकरण को फिर सुर्खियों में ला दिया है।

दुलारचंद यादव 80 और 90 के दशक में टाल क्षेत्र के सबसे प्रभावशाली व्यक्तित्व में गिने जाते थे। पहलवानी के शौकीन और दबंग छवि के साथ उन्होंने अपने प्रभाव को राजनीति में बखूबी ढाला। उनका नाम हत्या, रंगदारी, अपहरण और आर्म्स एक्ट जैसे कई गंभीर मामलों में जुड़ा रहा। 1991 में कांग्रेस नेता सीताराम सिंह हत्याकांड में भी उनका नाम सामने आया था।

लोग एक ओर ‘बाहुबली’ के उनके रूप से डरते थे, तो दूसरी ओर ‘रॉबिनहुड’ की तरह सम्मान देते थे। उनके समर्थकों का मानना था कि दुलारचंद कमजोर और गरीब तबके की आवाज़ उठाते थे, खासकर यादव समुदाय में उनकी गहरी पकड़ थी।

लालू के भरोसेमंद, नीतीश के करीब और फिर जनसुराज के साथ

दुलारचंद यादव की राजनीतिक यात्रा बिहार की बदलती सत्ता के साथ उतार-चढ़ाव भरी रही। उन्होंने 90 के दशक में लालू प्रसाद यादव के साथ राजनीति की शुरुआत की और आरजेडी के भरोसेमंद नेताओं में शामिल रहे। मोकामा से उन्होंने लोकदल (बी) और फिर आरजेडी के टिकट पर चुनाव भी लड़ा, पर जीत नहीं पाए। बाद में उन्होंने नीतीश कुमार से नज़दीकियां बढ़ाईं और 2019 में जेडीयू की रैलियों में देखे गए।2022 के मोकामा उपचुनाव में उन्होंने नीलम देवी (आरजेडी) का समर्थन किया, जो अनंत सिंह की पत्नी हैं। लेकिन 2025 में उन्होंने जनसुराज पार्टी के प्रत्याशी पीयूष प्रियदर्शी का समर्थन कर लिया।राजनीतिक समीकरणों में यही बदलाव उनके लिए घातक साबित हुआ।

अनंत सिंह से दोस्ती टूटी, दुश्मनी बनी जानलेवा

एक समय अनंत सिंह और दुलारचंद यादव के बीच गहरी दोस्ती थी। दोनों टाल क्षेत्र के दो ताकतवर चेहरे माने जाते थे।

लेकिन जनसुराज से नजदीकी और अनंत सिंह के खिलाफ दिए गए बयानों से रिश्तों में दरार पड़ गई। हत्या से कुछ दिन पहले ही दुलारचंद ने सोशल मीडिया पर अनंत सिंह की तीखी आलोचना की थी। इसके बाद दोनों के बीच का टकराव खुलकर सामने आ गया था।

हत्या के आरोप और दोनों पक्षों की एफआईआर

30 अक्टूबर 2025 की रात मोकामा में जनसुराज प्रत्याशी के समर्थन में प्रचार के दौरान दुलारचंद यादव की गोलियों और वाहन कुचलने से मौत हो गई। ऐसा उनके समर्थक आरोप लगा रहे हैं। उनके पोते राजेश कुमार के बयान पर जेडीयू प्रत्याशी अनंत सिंह, उनके दो भतीजे रणवीर और कर्मवीर, सहित पांच लोगों के खिलाफ केस दर्ज हुआ है। परिजनों का आरोप है कि अनंत सिंह के काफिले ने पहले गोली चलाई और फिर थार गाड़ी से कुचल दिया।

दूसरी ओर, अनंत सिंह ने इन आरोपों को सिरे से नकारते हुए कहा कि “हमारे काफिले पर जनसुराज समर्थकों ने हमला किया था, यह राजद नेता सूरजभान सिंह की साजिश है।”

राजनीतिक बयानबाज़ी तेज

घटना के बाद बिहार की सियासत गरमा गई। तेजस्वी यादव ने कहा — “सत्ता के संरक्षण में पलने वाले गुंडों ने एक सामाजिक कार्यकर्ता की हत्या कर दी। प्रधानमंत्री को बिहार का गुंडाराज नहीं दिखता।” वहीं, जनसुराज प्रमुख प्रशांत किशोर ने कहा कि “पार्टी की टीम मौके पर पहुंच चुकी है, सच्चाई जल्द सामने लाई जाएगी।”

प्रशासन का रुख

पटना डीएम त्यागराजन एसएम ने बताया कि “दो प्रत्याशियों के समर्थकों के बीच झड़प में यह घटना हुई। पोस्टमार्टम वीडियोग्राफी के साथ मेडिकल बोर्ड द्वारा कराया जा रहा है।” एसपी सिहाग ने बताया कि “मृतक को पैर में गोली लगी थी, जिससे मौत संभव नहीं लगती। अंतिम रिपोर्ट से ही असली कारण स्पष्ट होगा।”

वहीं, दुलारचंद यादव हत्याकांड में पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने खोले चौंकाने वाले राज़ खोले हैं। डॉक्टरों की टीम में शामिल डॉ. अजय कुमार ने बताया कि दुलारचंद यादव को एंकल जॉइंट के पास गोली लगी थी, जो पैर को आर-पार कर गई। लेकिन मौत का कारण गोली लगने से नहीं हुई है।
अब सवाल उठता है —
क्या असली वजह छिपाई जा रही है? या फिर इस केस में कुछ और है जो सामने नहीं आया है।

राजनीति, विवाद और ताकत की विरासत

दुलारचंद यादव का जीवन बिहार की राजनीति की उस परत को उजागर करता है, जहां बाहुबल, जातीय समीकरण और जनाधार मिलकर सत्ता की कुंजी तय करते हैं। कभी लालू के विश्वस्त, फिर नीतीश के करीबी और आखिर में प्रशांत किशोर के साथ खड़े दुलारचंद यादव की कहानी सत्ता और संघर्ष के संगम की मिसाल बन गई। उनकी हत्या ने उस दौर की याद दिला दी है, जब बिहार में वोट से पहले गोलियां चला करती थीं।

कितनी संपत्ति छोड़ गए पीछे

2010 के विधानसभा चुनाव में दाखिल हलफनामे के अनुसार, दुलारचंद यादव के पास कुल 18 लाख रुपये की संपत्ति थी और उन पर कोई कर्ज नहीं था। हालांकि राजनीतिक प्रभाव और रियल एस्टेट में सक्रियता को देखते हुए माना जा रहा है कि उनकी संपत्ति अब कई करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी थी।