न्यूज स्कैन ब्यूरो, वैशाली/पटना
बिहार पुलिस के दामन पर भ्रष्टाचार का एक और गहरा दाग लगा है। वैशाली जिले के लालगंज थाने में तैनात ‘वर्दीधारी रक्षकों’ ने ही कानून की धज्जियां उड़ाते हुए करोड़ों की बरामदगी पर हाथ साफ कर दिया। तिरहुत रेंज के डीआईजी (DIG) चंदन कुमार कुशवाहा ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए लालगंज के तत्कालीन थानाध्यक्ष (SHO) और एक सब-इंस्पेक्टर (SI) के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने का आदेश दिया है।
छापेमारी के नाम पर ‘लूट’: क्या है पूरा मामला?
यह मामला बीते 30 दिसंबर का है, जब लालगंज पुलिस की एक टीम ने थानाध्यक्ष संतोष कुमार और सब-इंस्पेक्टर सुमनजी झा के नेतृत्व में बिलनपुर गांव स्थित रामप्रीत सहनी के घर पर दबिश दी थी। पुलिस ने अपनी कागजी खानापूर्ति में यह दिखाया कि उन्हें वहां से केवल तीन टीवी, दो कारतूस और तांबे के कुछ बर्तन मिले।
लेकिन पर्दे के पीछे की सच्चाई बेहद खौफनाक थी। जांच में खुलासा हुआ कि पुलिस ने वहां से लगभग 50 लाख रुपये नकद, 2 किलो सोना और 6 किलो चांदी बरामद की थी। इन कीमती सामानों को आधिकारिक जब्ती सूची (Seizure List) से पूरी तरह गायब कर दिया गया और आपस में बंदरबांट कर ली गई। नियमानुसार जब्ती की वीडियोग्राफी भी नहीं कराई गई थी, जो पुलिस की नीयत पर पहले ही सवाल खड़े कर रही थी।
ऐसे खुला ‘वर्दी के पीछे का खेल’
इस भ्रष्टाचार का भंडाफोड़ तब हुआ जब लालगंज एसडीपीओ (SDPO) गोपाल मंडल को विभाग के ही कुछ सूत्रों से इस हेराफेरी की गुप्त सूचना मिली। उन्होंने तत्काल इसकी जानकारी वैशाली एसपी ललित मोहन शर्मा को दी। एसपी की गुप्त जांच में जब्ती में बड़े पैमाने पर गबन की पुष्टि हुई। रिपोर्ट मिलने के बाद 4 जनवरी को ही दोनों आरोपियों को निलंबित कर दिया गया था और अब डीआईजी के आदेश पर उन पर आपराधिक मुकदमा दर्ज किया जा रहा है।
आरोपी दारोगा का पुराना ‘दागी’ इतिहास
हैरानी की बात यह है कि आरोपी सब-इंस्पेक्टर सुमनजी झा का रिकॉर्ड पहले से ही विवादित रहा है। साल 2024 में जब वे मुजफ्फरपुर में तैनात थे, तब निगरानी विभाग (Vigilance) ने उन्हें 11 हजार रुपये की रिश्वत लेते रंगे हाथों दबोचा था। विभागीय कार्यवाही और कोर्ट केस लंबित होने के बावजूद उन्हें थाने में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई थी, जिसका नतीजा इस ‘महा-घोटाले’ के रूप में सामने आया।

































