बाढ़ में बर्बाद हुई फसल, किसानों को 18 हजार: राहत कब और किसे?

बिहार में हर साल की तरह इस बार भी बाढ़ ने किसानों की कमर तोड़ दी है। लहलहाती फसलें पानी में डूबकर सड़ चुकी हैं और किसान अगली फसल की बुवाई को लेकर गहरी चिंता में हैं। इस बीच मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने बाढ़ की मार झेल रहे किसानों को प्रति हेक्टेयर 18 हजार रुपये का मुआवजा देने का बड़ा ऐलान किया है।

न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
विपक्ष के तीखे हमलों और किसानों की बढ़ती नाराजगी के बीच इसे सरकार का एक अहम कदम माना जा रहा है, लेकिन ग्राउंड जीरो पर इस घोषणा की हकीकत क्या होगी? आइए इन पांच अहम सवालों के जरिए इस पैकेज का ‘पोस्टमार्टम’ करते हैं। जरूरी इसीलिए भी है कि इस तरह के मुआवजे की घोषणा पहले भी हुई लेकिन जमीन पर पूरी तरह उतर ही नहीं पाई।

कितने किसानों के जख्मों पर लगेगा मरहम?
सरकारी फाइलों और शुरुआती अनुमानों के मुताबिक, कोसी, सीमांचल और उत्तर बिहार के करीब 10 से 15 लाख किसान इस भीषण बाढ़ की चपेट में आए हैं। हालांकि, 18 हजार रुपये का यह मुआवजा सिर्फ उन्हीं किसानों को मिलेगा जिनकी कम से कम 33 प्रतिशत फसल पूरी तरह बर्बाद हो गई है। फोकस छोटे और सीमांत किसानों पर है, लेकिन असली आंकड़ा पंचायत स्तर पर होने वाले सर्वे के बाद ही तय होगा कि असल में कितने किसान इस ‘कटऑफ’ को पार कर पाते हैं।

किन जिलों और फसलों को मिलेगा ‘कवर’?
सरकार के रडार पर ‘रेड जोन’ वाले वो जिले हैं, जहां नदियां सबसे ज्यादा कहर बरपाती हैं। सहरसा, सुपौल, मधेपुरा, पूर्णिया, कटिहार, अररिया, किशनगंज, दरभंगा, सीतामढ़ी और मुजफ्फरपुर जिले सबसे ज्यादा फोकस में रहेंगे। पानी में डूबकर गल चुके धान और मक्के की फसल के साथ-साथ सीमांचल में तबाह हुए केले के बागानों को भी इस मुआवजे के दायरे में लाया गया है। इसके अलावा सब्जी उत्पादकों को भी राहत मिलने की उम्मीद है।

नुकसान का गणित कैसे तय करेगा सिस्टम?
कागजी खानापूर्ति और मुखिया-अधिकारियों की मिलीभगत रोकने के लिए इस बार तकनीक का सहारा लिया जा रहा है।
अंचलाधिकारी (CO) और कृषि समन्वयकों की ज्वाइंट टीम सीधे खेतों में जाकर नुकसान का आकलन करेगी।
ड्रोन मैपिंग और सैटेलाइट तस्वीरों से सर्वे क्रॉस-चेक होगा।
सबसे बड़ी बात, किसान खुद कृषि विभाग के पोर्टल पर अपने डूबे हुए खेतों की जियो-टैग (Geo-tag) तस्वीरें अपलोड कर सकेंगे, ताकि कोई अधिकारी उन्हें मुआवजे की लिस्ट से बाहर न कर सके।

खाते में कब आएगी रकम?
किसानों का सबसे बड़ा सवाल यही है कि पैसा मिलेगा कब? सरकार का टारगेट है कि रबी सीजन (गेहूं-सरसों) की बुवाई शुरू होने से पहले किसानों के हाथ में यह कैश पहुंच जाए। सिस्टम के मुताबिक, सर्वे और पोर्टल पर डेटा फीडिंग में 15 से 20 दिन लगेंगे। अगर लालफीताशाही आड़े नहीं आई, तो अगले एक से डेढ़ महीने के भीतर डीबीटी (DBT) के जरिए सीधे किसानों के बैंक खातों में पैसा ट्रांसफर हो जाएगा।

क्या पुराने वादों का हिसाब चुकता हो गया?
यही वह सवाल है जो सिस्टम की पोल खोलता है। हकीकत यह है कि बिहार में पिछले साल के सूखे और बेमौसम बारिश का मुआवजा अब भी कई किसानों को नहीं मिला है। कभी आधार कार्ड में नाम की स्पेलिंग गलत होने का बहाना, तो कभी बैंक खाते का NPCI से लिंक न होना, इन तकनीकी खामियों के नाम पर हजारों किसानों का पैसा अटका हुआ है। इसके अलावा अंचल कार्यालयों की सुस्ती भी फंड को फाइलों में रोक देती है। 18 हजार के इस नए ऐलान को जमीन पर उतारने से पहले सरकार को उन पुराने अटके हुए भुगतानों को भी क्लियर करना होगा, वरना यह योजना भी महज एक हेडलाइन बनकर रह जाएगी।