द इनसाइडर….. सवर्णों की नाराजगी और श्री बाबू का दांव : क्या बिहार में अपना पुराना वोट बैंक वापस पा सकेगी कांग्रेस?

बिहार के जटिल और संवेदनशील राजनीतिक परिदृश्य में एक बार फिर बड़ा भूचाल देखने को मिल रहा है। ऐतिहासिक रूप से जातियों का ध्रुवीकरण और गठबंधनों का स्वरूप राज्य की सत्ता तय करता रहा है। लेकिन अक्टूबर 2026 के वर्तमान राजनीतिक परिवेश में बिहार एक नए वैचारिक और सामाजिक संक्रमण से गुजर रहा है। आइए, बिहार के इस नए राजनीतिक समीकरण, सवर्णों के मोहभंग के कारणों, प्रशांत किशोर के जन सुराज के प्रभाव और सवर्ण जातियों के ऐतिहासिक वोटिंग पैटर्न का विस्तृत विश्लेषण करते हैं।

न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को मिली अप्रत्याशित हार और सवर्ण यानी उच्च जाति के मतदाताओं के बीच पनप रहे भारी असंतोष ने राज्य के राजनीतिक विमर्श को पूरी तरह बदल दिया है। तीन दशकों से जिस सवर्ण वोट बैंक को भाजपा का ‘अभेद्य किला’ माना जाता था, उसमें अब दरारें साफ नजर आ रही हैं। इस बदलते घटनाक्रम के बीच, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अपने खोए हुए जनाधार को वापस पाने के लिए एक व्यापक रणनीतिक दांव चल रही है। 25 अक्टूबर 2026 को पटना के ऐतिहासिक बापू सभागार में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री ‘बिहार केसरी’ डॉ. श्रीकृष्ण सिंह यानी श्री बाबू की जयंती समारोह में हुंकार भरेंगे। यह केवल एक श्रद्धांजलि सभा नहीं है, बल्कि नाराज सवर्णों, विशेषकर भूमिहार समुदाय को लामबंद करने की एक सोची-समझी राजनीतिक पटकथा है।

‘बिहार केसरी’ डॉ. श्रीकृष्ण सिंह: कांग्रेस का मास्टरस्ट्रोक
आधुनिक बिहार के निर्माता डॉ. श्रीकृष्ण सिंह (श्री बाबू) का कार्यकाल (1946-1961) बिहार में औद्योगिक और कृषि सुधारों का स्वर्ण युग माना जाता है। मुंगेर के एक प्रतिष्ठित भूमिहार परिवार से ताल्लुक रखने वाले श्री बाबू केवल अपनी जाति के नेता नहीं थे, बल्कि सर्वसमाज में उनकी स्वीकार्यता थी। कांग्रेस आज श्री बाबू के उसी व्यक्तित्व को भुनाना चाहती है। एक तरफ वह भूमिहार (सवर्ण) अस्मिता का निर्विवाद प्रतीक थे, तो दूसरी तरफ वे प्रगतिशील नीतियों के संवाहक थे। देश में सबसे पहले जमींदारी प्रथा का उन्मूलन और देवघर मंदिर में दलितों का प्रवेश श्री बाबू के ही क्रांतिकारी कदम थे। कांग्रेस यह संदेश देना चाहती है कि सवर्ण नेतृत्व कभी दलित-विरोधी या विकास-विरोधी नहीं रहा है। मल्लिकार्जुन खरगे जो स्वयं एक बड़े दलित चेहरा हैं, का इस सवर्ण महाजुटान में शामिल होना कांग्रेस की इसी ‘दलित-सवर्ण एकता का प्रतीक है।

सवर्णों की जनसंख्या और उनका ऐतिहासिक वोटिंग पैटर्न
बिहार की 2023 की जाति आधारित गणना के अनुसार, राज्य की कुल जनसंख्या में हिंदू सवर्ण जातियों (सामान्य वर्ग) की हिस्सेदारी 10.57% है। इनमें ब्राह्मण (3.65%), राजपूत (3.45%), भूमिहार (2.87%) [cite: 2.3.2], और कायस्थ (0.60%) शामिल हैं। अपनी कम संख्या के बावजूद, ये जातियां हमेशा से ‘ओपिनियन मेकर’ की भूमिका में रही हैं और सत्ता के समीकरण तय करने में इनका बड़ा प्रभाव रहा है।

1990 से पहले: कांग्रेस का स्वर्ण युग
श्री बाबू के जमाने से लेकर 1980 के दशक के अंत तक, ये सभी सवर्ण जातियां (भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण और कायस्थ) कांग्रेस की सबसे मजबूत रीढ़ थीं। उस दौर में बिहार की राजनीति और सत्ता मुख्य रूप से सवर्ण नेताओं के ही इर्द-गिर्द घूमती थी। कांग्रेस की सरकारें लगातार सवर्ण मुख्यमंत्रियों (विशेषकर ब्राह्मण और राजपूत) के नेतृत्व में काम करती रहीं।

1990 के बाद का बदलाव: मंडल की राजनीति और सवर्णों का पलायन
1990 के दशक में मंडल आयोग की सिफारिशों के लागू होने और लालू प्रसाद यादव के उदय के बाद बिहार की राजनीति में एक बड़ा बदलाव आया। सत्ता सवर्णों के हाथों से निकलकर पिछड़ी जातियों (OBC), विशेषकर यादवों के पास चली गई। “भूराबाल” (भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण, लाला/कायस्थ) को सत्ता से बेदखल करने के विमर्श ने सवर्णों में असुरक्षा पैदा की। जब कांग्रेस ने राजद के साथ गठबंधन किया, तो सवर्ण मतदाताओं ने खुद को राजनीतिक रूप से हाशिए पर महसूस किया और वे सामूहिक रूप से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की ओर मुड़ गए। तब से लेकर हाल तक, सवर्ण मतदाता भाजपा का सबसे भरोसेमंद ‘कोर वोट बैंक’ बने रहे।

वर्तमान में विधानसभा और लोकसभा में सवर्णों का दबदबा
भले ही सवर्णों की आबादी 10.57% हो, लेकिन चुनावी राजनीति में उनका दबदबा कायम है। लोकसभा 2019: 2019 के लोकसभा चुनाव में बिहार की 40 में से 13 सीटों पर सवर्ण सांसद चुने गए थे। लोकसभा 2024: 2024 के आम चुनाव में भी 12 सांसद सवर्ण जातियों (6 राजपूत, 3 भूमिहार, 2 ब्राह्मण, 1 कायस्थ) से चुनकर आए। विधानसभा 2020: 2020 के विधानसभा चुनाव में, 243 में से कुल 64 सवर्ण विधायक (28 राजपूत, 21 भूमिहार, 12 ब्राह्मण, 3 कायस्थ) चुने गए थे, जो 2015 की तुलना में 12 अधिक थे। यह दर्शाता है कि लगभग हर चौथा विधायक सवर्ण समुदाय से था।

भाजपा से सवर्णों का मोहभंग: आखिर वजह क्या है?
भाजपा, जो 1990 के दशक से सवर्णों की स्वाभाविक पसंद रही है, आज इस वर्ग के भारी असंतोष का सामना कर रही है।
इसके मुख्य कारण हैं :-
यूजीसी (UGC) के नए नियमों पर बवाल: 2026 में यूजीसी के नए दिशानिर्देशों ने सवर्णों में भारी आक्रोश पैदा कर दिया है। आरोप है कि नए नियमों में सामान्य वर्ग की सुनवाई का रास्ता बंद कर दिया गया है। हिसुआ से भाजपा विधायक अनिल सिंह की अपनी ही सरकार के खिलाफ खुली बगावत इस बात का प्रमाण है कि सवर्णों का यह असंतोष भाजपा के नियंत्रण से बाहर हो रहा है।
एससी/एसटी एक्ट का मुद्दा: सवर्ण समुदायों का मानना है कि ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में इस एक्ट का दुरुपयोग हो रहा है, और भाजपा ने अपने दलित वोट बैंक को साधने के लिए सवर्णों के हितों की बलि चढ़ा दी है।
‘टेकन फॉर ग्रांटेड’ रवैया: भाजपा का पूरा फोकस अब ‘अति-पिछड़ा’ (EBC) और दलित वोट बैंक पर है। सवर्णों को लगने लगा है कि भाजपा उन्हें ‘बंधुआ वोटर’ मान चुकी है, जिनके पास राजद के डर के कारण भाजपा को वोट देने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

बांकीपुर उपचुनाव और ‘जन सुराज’ की एंट्री: बदलता नैरेटिव
सवर्णों की नाराजगी का सबसे बड़ा प्रमाण अगस्त 2026 का बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव रहा। यह सीट कायस्थ बाहुल्य है और भाजपा का गढ़ रही है (जहां से नवीन किशोर सिन्हा और नितिन नवीन लगातार जीतते रहे)। लेकिन इस बार प्रशांत किशोर की ‘जन सुराज पार्टी’ (JSP) ने भाजपा के नीरज कुमार सिन्हा को लगभग 19,000 वोटों से हरा दिया। बांकीपुर के मतदाताओं ने यह संदेश दे दिया है कि वे पारंपरिक ‘पहचान की राजनीति’ से हटकर अब ‘आकांक्षा की राजनीति’ की ओर बढ़ रहे हैं। प्रशांत किशोर (जो खुद एक ब्राह्मण पृष्ठभूमि से आते हैं) ने सवर्णों को भाजपा का एक मजबूत विकल्प दे दिया है।

सभी की नजर सवर्ण वोट बैंक पर
बिहार में सवर्ण वोटों को लेकर एक बड़ी होड़ मची है।
राजद की ‘A to Z’ रणनीति: तेजस्वी यादव ‘माय’ (MY) समीकरण से बाहर निकलकर सवर्णों को टिकट (MLC चुनावों में) दे रहे हैं और परशुराम जयंती में शामिल होकर खुद को समावेशी नेता के रूप में पेश कर रहे हैं।
JDU का संतुलन: नीतीश कुमार ने ललन सिंह (भूमिहार) और विजय कुमार चौधरी के जरिए सवर्णों के एक वर्ग को अपने साथ जोड़े रखा है।
कांग्रेस का आंतरिक संघर्ष: कांग्रेस के भीतर भी सवर्ण वर्चस्व की लड़ाई जारी है। अखिलेश प्रसाद सिंह (भूमिहार) और अजित शर्मा (भूमिहार) के बीच का टकराव इसका उदाहरण है। हाल ही में शकील अहमद खान को विधायक दल का नेता बनाना पार्टी के भीतर मुस्लिम-सवर्ण संतुलन का प्रयास था, हालांकि कमान पूरी तरह अखिलेश सिंह के हाथ में है।

अब आगे क्या होगा
बिहार की राजनीति अब द्विध्रुवीय (NDA बनाम महागठबंधन) से त्रिकोणीय हो चुकी है। जन सुराज की एंट्री ने भाजपा के सामने अपने कोर वोट बैंक को बचाने का अस्तित्वगत संकट खड़ा कर दिया है। 25 अक्टूबर को कांग्रेस का ‘श्री बाबू दांव’ सीधे तौर पर प्रशांत किशोर के वैचारिक प्रभाव को सीमित करने और सवर्ण मतदाताओं को उनके पुराने ‘राजनीतिक घर’ (कांग्रेस) में वापस लाने की जद्दोजहद है। हालांकि, कांग्रेस के सामने चुनौती यह है कि उसे सवर्णों को यह विश्वास दिलाना होगा कि राजद (महागठबंधन) के साथ रहकर भी उनके हित सुरक्षित रहेंगे। अंततः, सवर्ण मतदाता अब अपनी कीमत (10.57%) पहचान चुके हैं। बिहार का आगामी चुनावी भविष्य इसी पर निर्भर करेगा कि कौन सा दल अतीत की स्मृतियों और भविष्य की आकांक्षाओं के बीच सबसे सटीक सामंजस्य बिठा पाता है।