सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद बिहार सरकार पर मंडरा रहा बड़ा संवैधानिक संकट आखिरकार टल गया है। पंचायती राज मंत्री और उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश की कुर्सी बचाने के लिए भाजपा ने बड़ी राजनीतिक कुर्बानी देते हुए अपने एमएलसी देवेश कुमार का इस्तीफा करा दिया है। अब दीपक प्रकाश राज्यपाल कोटे से उच्च सदन जाएंगे, जिससे मंत्री पद के लिए छह महीने की संवैधानिक मियाद का गतिरोध पूरी तरह समाप्त हो गया है। यह अहम घटनाक्रम एनडीए गठबंधन की मजबूत एकजुटता और बिहार की बिसात पर भाजपा की रणनीतिक दूरदर्शिता को साफ तौर पर दर्शाता है।
न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
बिहार में राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के बेटे और पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश का मंत्री पद फिलहाल सुरक्षित हो गया है। गैर-विधायक मंत्री के रूप में छह महीने की संवैधानिक समय-सीमा के दबाव और सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी के बाद राज्य सरकार के सामने उत्पन्न हुआ बड़ा संवैधानिक संकट अब पूरी तरह से टल गया है।
इस राजनीतिक व संवैधानिक गतिरोध को सुलझाने के लिए भारतीय जनता पार्टी (BJP) को अपने कोटे की एक मनोनीत सीट का त्याग करना पड़ा है। दरअसल, शुक्रवार शाम भाजपा के मनोनीत एमएलसी देवेश कुमार ने बिहार विधान परिषद पहुंचकर सभापति अवधेश नारायण सिंह को अपना त्यागपत्र सौंप दिया। इस दौरान उनके साथ भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी भी मौजूद थे। देवेश कुमार के इस इस्तीफे से खाली हुई सीट पर अब दीपक प्रकाश को राज्यपाल कोटे से विधान परिषद का सदस्य मनोनीत किया जाएगा। उच्च सदन में उनका यह नया कार्यकाल 16 मार्च 2027 तक का होगा।
संवैधानिक दबाव और सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164(4) के तहत कोई भी व्यक्ति बिना किसी सदन (विधानसभा या विधान परिषद) का सदस्य रहे केवल छह महीने तक ही मंत्री पद पर रह सकता है। इस निर्धारित अवधि के भीतर सदन की सदस्यता हासिल करना अनिवार्य होता है। दीपक प्रकाश को लेकर यह मियाद पूरी होने वाली थी, जिससे उनके मंत्री पद पर तलवार लटक रही थी। स्थिति तब और गंभीर हो गई जब बीते 30 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने बिना किसी सदन का सदस्य बने दीपक प्रकाश के मंत्री पद पर लगातार बने रहने की वैधता पर सवाल खड़े कर दिए। न्यायालय की इस सख्त टिप्पणी के बाद सरकार पर त्वरित और ठोस निर्णय लेने का भारी दबाव बन गया था।
राजनीतिक प्रभाव और एनडीए की रणनीति
इस पूरे घटनाक्रम को एनडीए गठबंधन की एकजुटता और कैबिनेट में संतुलन बनाए रखने की कवायद के तौर पर देखा जा रहा है। इस कदम से बिहार में सत्तारूढ़ गठबंधन ने उपेंद्र कुशवाहा के साथ अपने राजनीतिक संबंधों को और मजबूत किया है। हालांकि, सहयोगी दल के नेता की मंत्री की कुर्सी बचाने के लिए भाजपा द्वारा अपने ही एक सदस्य का इस्तीफा दिलाना राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है। सियासी जानकार इसे एनडीए को मजबूत रखने के लिए ‘भाजपा द्वारा दी गई एक बड़ी कुर्बानी’ के रूप में देख रहे हैं।
































