जम्मू एयरपोर्ट की एक अनूठी परंपरा : जिसने तपोवर्धन प्राकृतिक चिकित्सा केंद्र को दिखाई ज्ञान के आदान-प्रदान की नई राह

यह एक यात्रा का अनुभव है। अनुभव बता रहे हैं तपोवर्धन चिकित्सा केंद्र, भागलपुर के निदेशक डॉ. जेता सिंह। वे बताते हैं…. यात्राएं सिर्फ दूरियां ही तय नहीं करतीं, कई बार जीवन को एक नया और सुंदर नजरिया भी दे जाती हैं। हाल ही उन्होंने जम्मू यात्रा के दौरान जम्मू एयरपोर्ट पर एक ऐसी अद्भुत और अनुकरणीय व्यवस्था देखी, जिसने न सिर्फ उनका दिल जीत लिया, बल्कि सामाजिक सहभागिता की एक नई सोच भी जगाई। ज्ञान और संवेदना से जुड़ी इस अनुपम परंपरा से सीख लेते हुए, उन्होंने इसे तपोवर्धन प्राकृतिक चिकित्सा केंद्र के नवनिर्मित चिकित्सा परिसर में भी लागू करने का निर्णय लिया है, ताकि यहाँ आने वाले रोगी, परिजन और आगंतुक भी इस सुंदर अभियान का हिस्सा बन सकें।

इसी सप्ताह जम्मू से दिल्ली आने के क्रम में मैं जम्मू एयरपोर्ट के अंदर समय से काफी पहले दाखिल हो गया। सिक्योरिटी चेकिंग की प्रक्रियाएँ पूरी करने के बाद एयरपोर्ट पर निश्चिंत होकर बैठना और घूमना मेरा पसंदीदा शगल है। जब भी एयरपोर्ट पहुँचने में देर हुई है, तब जो भाग-दौड़ और आपाधापी मचती है, वह बड़ी कष्टप्रद होती है। साथ ही मैंने यह भी अनुभव किया है कि जिस दिन एयरपोर्ट के लिए निकलने में देर हो जाती है, उसी दिन जैसे सारी अड़चनें एक साथ सामने आ खड़ी होती हैं। लाल बत्ती भी अधिक मिलती है, ट्रैफिक जाम भी मिलता है । दैवयोग से दो-चार बार ऐसा भी हुआ कि हवाई जहाज़ छूट गया जिससे पैसे तो व्यर्थ गए ही, पूरा शेड्यूल खराब हो गया वह अलग। इसलिए अब मैंने अपने लिए एक नियम सा बना लिया है कि बोर्डिंग टाइम से कम से कम दो घंटे पहले एयरपोर्ट के अंदर अवश्य प्रवेश कर जाना है। इससे मन में बड़ा इत्मीनान और सुकून रहता है, यात्रा भी सुखद हो जाती है।

बहरहाल, सिक्योरिटी चेक-इन के बाद अब मेरे पास काफ़ी समय था। ऐसे में आदतन मैंने एयरपोर्ट पर चहलक़दमी शुरू कर दी। जम्मू एयरपोर्ट बहुत बड़ा नहीं है। छोटे एयरपोर्ट मुझे सरल और सुखद लगते हैं, क्योंकि वे, बड़े एयरपोर्ट जैसी जटिलताओं और उलझनों से काफी हद तक मुक्त होते हैं। घूमते-घूमते मेरी नज़र लॉबी के बीचोंबीच रखे एक मध्यम आकार के लकड़ी के बुक-शेल्फ़ पर पड़ी। किताबों के प्रति बचपन से आकर्षणवश मैं उस शेल्फ़ के पास गया और किताबें देखने लगा। तभी ‘कार्यालयीन हिंदी’ नामक पुस्तक ने मेरा ध्यान आकर्षित किया। मैंने उसके पन्ने पलटने शुरू किए। विषय मेरा प्रिय था और रोचक विषय-सूची भी, इसलिए मैंने उस पुस्तक को खरीदने का मन बना लिया।

पुस्तक का मूल्य ₹695 था, लेकिन यह राशि दी किसे जाए, आसपास ऐसा कोई व्यक्ति या काउंटर दिखाई नहीं दिया। इसी बीच मेरी नज़र उस शेल्फ़ के ऊपर लिखी पंक्तियों पर पड़ी। वहाँ मोटे अक्षरों में लिखा था, “इसमें से एक किताब निःशुल्क ले जाइए और यदि आपके पास कोई ऐसी किताब हो, जिसकी अब आपको आवश्यकता न हो, तो उसे यहाँ रख जाइए। यहाँ से ली हुई किताब को पढ़ने के बाद किसी और एयरपोर्ट पर छोड़ दीजिए, ताकि वह किसी और यात्री के काम आ सके।”

इन पंक्तियों ने सचमुच मुझे भावुक कर दिया। दूसरा सुखद आश्चर्य यह कि उस रैक पर रखी सारी पुस्तकें हिंदी की थीं।

आज तक मैंने किसी एयरपोर्ट पर ऐसी अद्भुत व्यवस्था नहीं देखी थी। यह केवल पुस्तकों का आदान-प्रदान नहीं था, बल्कि ज्ञान, संवेदना और सामाजिक सहभागिता की एक अत्यंत सुंदर परंपरा थी। इस स्वस्थ और अनुकरणीय पहल के लिए मैंने जम्मू एयरपोर्ट के मैनेजर साहब को साधुवाद देते हुए धन्यवाद-पत्र भेजने का निश्चय किया।

मेरा विश्वास है कि यदि इस प्रकार का प्रचलन हमारे देश में अनेक स्थानों पर शुरू कर दिया जाए, तो इससे न केवल पढ़ने की संस्कृति को बल मिलेगा, बल्कि समाज में साझा करने, बचाकर रखने और उपयोगी वस्तु को आगे बढ़ाने की भावना भी विकसित होगी। इसके सकारात्मक परिणाम भी बहुत जल्द दिखाई देने लगेंगे।

मैंने यह भी निश्चय किया कि तपोवर्धन प्राकृतिक चिकित्सा केंद्र के नवनिर्मित चिकित्सा परिसर में जम्मू हवाई अड्डे की इस अनुपम व्यवस्था का अनुकरण करते हुए इसे आगे बढ़ाया जाए, ताकि यहाँ आने वाले रोगी, परिजन, आगंतुक और अतिथि भी इस सुंदर परंपरा से जुड़ सकें।