विदेश यात्रा बनाम जिम्मेदारी : क्या तेजस्वी की बार-बार की अनुपस्थिति राजद के लिए बन रही है बड़ी मुसीबत?

राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के इतिहास में रविवार का दिन एक अजीबोगरीब मिसाल के तौर पर दर्ज हो गया। मौका था पार्टी के 30वें स्थापना दिवस का। पटना के प्रदेश कार्यालय में मंच सजा था, वरिष्ठ नेता मौजूद थे, और कार्यकर्ता भी जुटे थे; लेकिन पार्टी की नई उम्मीद और कार्यकारी अध्यक्ष तेजस्वी यादव बिहार में नहीं, बल्कि दिल्ली से यूरोप उड़ान भरने की तैयारी में थे।

न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
30 साल में यह पहला मौका था जब राजद ने अपने सबसे बड़े संगठनात्मक उत्सव की तारीख सिर्फ इसलिए 5 दिन पहले (1 जुलाई) खिसका दी, क्योंकि तेजस्वी यादव को सपरिवार विदेश यात्रा पर जाना था। स्थापना दिवस के मुख्य दिन तेजस्वी ने महज कुछ मिनटों के लिए दिल्ली से ऑनलाइन जुड़कर औपचारिकता पूरी की और फिर यूरोप रवाना हो गए।
इस पूरे घटनाक्रम ने न सिर्फ विरोधियों को हमला करने का मौका दे दिया है, बल्कि खुद राजद के भीतर और उसके पारंपरिक वोट बैंक के बीच एक गंभीर बहस छेड़ दी है।

परिपक्वता पर उठते सवाल: पार्ट-टाइम राजनीति का ठप्पा?
यह पहली बार नहीं है जब तेजस्वी यादव अपनी विदेश यात्राओं या ऐन मौके पर बिहार से गायब रहने को लेकर चर्चा में आए हैं। लेकिन अब परिस्थिति बदल चुकी है। वे अब सिर्फ ‘लालू प्रसाद के बेटे’ नहीं हैं, बल्कि पार्टी के सर्वेसर्वा और सबसे बड़े जिम्मेदार चेहरे हैं।
बिहार जैसे राज्य में, जहाँ की राजनीति 24 घंटे जमीन पर पसीना बहाने की मांग करती है, वहां एक शीर्ष नेता का व्यक्तिगत सहूलियत के लिए पूरी पार्टी के स्थापना दिवस के कार्यक्रम को ही बदलवा देना सांगठनिक ढांचे पर व्यक्तिवाद के हावी होने का संकेत देता है। राजनीति के जानकारों का मानना है कि यह कदम तेजस्वी की राजनीतिक परिपक्वता और प्राथमिकताओं पर बड़ा सवालिया निशान लगाता है। जब पार्टी को जमीन पर धार देने का वक्त हो, तब डिजिटल माध्यमों का सहारा लेना कार्यकर्ताओं के बीच इस संदेश को पुख्ता करता है कि नेतृत्व उनसे दूर होता जा रहा है।

कार्यकर्ताओं में मायूसी और ‘गांव-गांव’ जाने की मजबूरी
स्थापना दिवस समारोह में मंच पर मौजूद अब्दुल बारी सिद्दीकी और प्रदेश अध्यक्ष मंगनी लाल मंडल जैसे वरिष्ठ नेताओं ने कार्यकर्ताओं को ढाढस बंधाते हुए कहा कि “हमें गांव-गांव जाना होगा और लोगों के बीच रहना होगा”। वरिष्ठ नेताओं का यह बयान कहीं न कहीं उस खालीपन को बयां कर रहा था, जो शीर्ष नेतृत्व की गैर-मौजूदगी से पैदा हुआ है।
पार्टी के भीतर का एक बड़ा वर्ग नाम न छापने की शर्त पर यह स्वीकार करता है कि जब मुख्य चेहरे ही मैदान से गायब रहेंगे, तो जमीनी कार्यकर्ताओं में जोश कैसे भरा जाएगा? जब तक मुख्य नेता खुद सड़कों पर नहीं दिखेगा, तब तक कार्यकर्ताओं को लामबंद करना नामुमकिन है।

जनता से बढ़ती दूरी और वैचारिक विरोधाभास
लालू प्रसाद यादव ने अपने स्थापना दिवस संदेश में फिर से याद दिलाया कि राजद की स्थापना ‘गरीबों, शोषितों, दबे-कुचले वर्गों और अल्पसंख्यकों’ के हक के लिए हुई थी। लेकिन यहीं पर पार्टी की कथनी और करनी में एक बड़ा विरोधाभास नजर आता है।
जिस वोट बैंक की बदौलत राजद आज खड़ी है, वह बिहार का आम, गरीब और पिछड़ा तबका है। जब उस तबके का नेता अपनी जिम्मेदारियों को छोड़कर यूरोप जैसे महंगे दौरों पर जाता है, तो जनता के बीच यह संदेश जाता है कि नेतृत्व अब उनके संघर्षों से दूर, एक अलग ग्रेड का हो चुका है। बिहार की जनता डिजिटल या ‘वर्क फ्रॉम होम’ वाली राजनीति को कभी स्वीकार नहीं करती; यहाँ नेता की ताकत उसकी जनता के बीच शारीरिक उपस्थिति से तय होती है।

आगे की राह क्या?
अगर राजद को बिहार की सत्ता में मजबूती से वापसी करनी है, तो तेजस्वी यादव को यह समझना होगा कि राजनीति एक पूर्णकालिक जिम्मेदारी है। त्योहारों, त्योहारों के मौसम या सांगठनिक उत्सवों पर जनता के बीच न रहना विपक्ष के उस नैरेटिव को सच साबित कर देता है जिसमें उन्हें ‘टूरिस्ट लीडर’ कहा जाता है। आने वाले समय में अगर यह दूरी कम नहीं हुई, तो पार्टी का कोर वोटर छिटक सकता है, जिसकी भरपाई डिजिटल संबोधनों से मुमकिन नहीं होगी।