‘सिर्फ पेट नहीं, हाथ और दिमाग भी लेकर आता है इंसान’, जनसंख्या पर मांझी ने बाबा के बयान को वैचारिक पटरी पर बदला

देश में जनसंख्या के बढ़ते आंकड़ों को अक्सर एक ‘संकट’ के रूप में देखा जाता है, लेकिन केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने इसे ‘अवसर’ में बदलने की नई बहस छेड़ दी है। ‘बागेश्वर धाम’ के धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री द्वारा हिंदुओं को चार बच्चे पैदा करने और एक बच्चा आरएसएस को देने के आह्वान पर मांझी ने एक समानांतर वैचारिक रेखा खींच दी है। मांझी ने स्पष्ट किया कि जनसंख्या को ‘संख्या बल’ के बजाय ‘उत्पादक शक्ति’ के चश्मे से देखना आज की बड़ी जरूरत है।

न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना/नई दिल्ली
हाल ही में बागेश्वर बाबा ने नागपुर में जनसंख्या असंतुलन की चिंता जताते हुए ‘चार बच्चों’ का फॉर्मूला दिया था। इस पर अपनी राय रखते हुए एमएसएमई मंत्री जीतन राम मांझी ने कहा कि समाज को इस मामले में संकीर्ण सोच से बचना चाहिए। उनका विश्लेषण कहता है कि हर जन्म लेने वाला बच्चा देश की अर्थव्यवस्था में योगदान देने वाला ‘कार्यबल’ बन सकता है, बशर्ते शासन का ढांचा प्रभावी हो।

जानिए कि मांझी ने क्या कहा
डेमोग्राफिक डिविडेंड: मांझी का तर्क है कि मनुष्य केवल ‘खपत’ के लिए नहीं, बल्कि ‘सृजन’ (Creativity) के लिए पैदा होता है। हाथ और दिमाग का सही उपयोग ही जनसंख्या को समस्या से शक्ति में बदलता है।

विश्व गुरु का ऐतिहासिक सूत्र: उन्होंने याद दिलाया कि भारत जब शिखर पर था, तब भी आबादी बड़ी थी। यानी समस्या ‘सिरों की गिनती’ नहीं, बल्कि ‘हाथों का हुनर’ है।

गवर्नेंस की चुनौती: उन्होंने अपनी ही सरकार के विजन को मजबूती देते हुए संकेत दिया कि अगर शिक्षा और उद्यमिता (Entrepreneurship) पर फोकस हो, तो 140 करोड़ की आबादी भारत को दुनिया की सबसे बड़ी ताकत बना देगी।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मांझी ने इस मुद्दे को ‘धार्मिक’ गलियारे से निकालकर ‘आर्थिक और विकासवादी’ गलियारे में ला खड़ा किया है। जहाँ बागेश्वर बाबा का बयान जनसांख्यिकीय सुरक्षा (Demographic Security) की बात करता है, वहीं मांझी का दृष्टिकोण जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) पर आधारित है।