सियासी रण : नारी शक्ति का ‘सम्मान’ या आंकड़ों का ‘पाखंड’? सम्राट और तेजस्वी के बीच आर-पार

बिहार की राजनीति में ‘आधी आबादी’ को लेकर संग्राम छिड़ गया है। एक तरफ मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने महिला आरक्षण बिल के गिरने को ‘नारी शक्ति का अपमान’ करार देते हुए विपक्ष पर धोखे का आरोप लगाया है, तो दूसरी तरफ तेजस्वी यादव ने इसे एनडीए का ‘पाखंड’ बताते हुए आंकड़ों की ऐसी झड़ी लगा दी है, जिसने बहस को ‘संवैधानिक प्रक्रिया’ से हटाकर ‘प्रतिनिधित्व की वास्तविकता’ पर लाकर खड़ा कर दिया है।

न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
सम्राट चौधरी और तेजस्वी यादव आमने सामने हैं। दोनों के बीच सियासी तलवार खिंच चुकी है। आइए विस्तार से समझते हैं –

सम्राट का प्रहार: “गरीब की बेटी को रोकना चाहता है विपक्ष”
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने साफ शब्दों में कहा कि कांग्रेस, राजद और टीएमसी जैसे दलों ने बिल के खिलाफ वोट कर यह साबित कर दिया कि वे नहीं चाहते कि ‘गरीब घर की बेटी’ संसद तक पहुंचे। उन्होंने इसे एक ऐतिहासिक अवसर को गंवाने जैसा बताया। सम्राट चौधरी ने भविष्य का एक बड़ा खाका भी खींचा:

सीटों का गणित: यदि बिल पास होता, तो बिहार विधानसभा में महिला विधायकों की संख्या 29 से बढ़कर 122 हो जाती।

परिवारवाद पर निशाना: उन्होंने लालू प्रसाद की बेटी और राहुल गांधी की बहन का उदाहरण देते हुए कटाक्ष किया कि विपक्ष सिर्फ अपने परिवार की महिलाओं को ही संसद में देखना चाहता है।

तेजस्वी का पलटवार: “आंकड़े झूठ नहीं बोलते”
राजद नेता तेजस्वी यादव ने सम्राट चौधरी के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए एनडीए को ‘कट्टर महिला विरोधी’ करार दिया। तेजस्वी ने अपनी पार्टी की नीतियों को आंकड़ों के जरिए पेश किया:

टिकट वितरण: लोकसभा चुनाव में राजद ने 29% महिलाओं को टिकट दिया, जबकि विधानसभा में यह आंकड़ा 17% था।

संसदीय भागीदारी: विधान परिषद में भी राजद का महिला प्रतिनिधित्व 21.4% है, जो किसी भी अन्य दल से अधिक है।

इतिहास का हवाला: तेजस्वी ने याद दिलाया कि बिहार की ‘प्रथम और अंतिम’ महिला मुख्यमंत्री राबड़ी देवी भी राजद की ही देन हैं।

असली पेच: आरक्षण या परिसीमन का डर?
इस पूरे विवाद की जड़ में वह ‘परिसीमन’ (Delimitation) है, जिसे लेकर विपक्ष सशंकित है। तेजस्वी और ममता बनर्जी जैसे नेताओं का तर्क है कि सरकार आरक्षण की आड़ में देश का राजनीतिक भूगोल बदलना चाहती है। विपक्ष का सवाल है कि जब बिल तीन साल पहले ही पारित हो चुका था, तो उसे अब तक लागू क्यों नहीं किया गया और इसे जनगणना व परिसीमन जैसी जटिल शर्तों में क्यों फंसाया गया?

निष्कर्ष: 2026 की चुनावी बिसात
यह केवल बयानबाजी नहीं, बल्कि आगामी चुनावों के लिए एक मजबूत ‘वोट बैंक’ को साधने की कवायद है। सम्राट चौधरी जहाँ भाजपा को ‘महिला हितैषी’ के रूप में ब्रांड कर रहे हैं, वहीं तेजस्वी ‘पिछड़ा-अति पिछड़ा’ (कोटा के भीतर कोटा) और ‘जमीनी प्रतिनिधित्व’ की बात कर एनडीए के दावों की हवा निकालने की कोशिश कर रहे हैं।