न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
बिहार की सियासत में “घुसपैठ” का मुद्दा फिर से केंद्र में है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सीमांचल दौरे के दौरान जिस आक्रामकता के साथ बयान दिया, उसने यह संकेत दिया है कि यह केवल प्रशासनिक अभियान नहीं, बल्कि व्यापक राजनीतिक और वैचारिक विमर्श का हिस्सा बनने जा रहा है… खासकर तब, जब पश्चिम बंगाल में चुनावी माहौल बनने लगा है।
सीमांचल से ‘अभियान’ की शुरुआत
शाह ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि घुसपैठियों को “चुन-चुन कर सीमा पार भेजा जाएगा” और यह कोई चुनावी जुमला नहीं, बल्कि भारतीय जनता पार्टी की प्रतिबद्धता है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि सीमा से 10 किलोमीटर के भीतर हुए अवैध अतिक्रमणों को हटाया जाएगा और सीमांचल से इस कार्रवाई की शुरुआत होगी।
सीमांचल… जिसमें कटिहार, पूर्णिया, अररिया और किशनगंज जैसे जिले आते हैं, भौगोलिक रूप से संवेदनशील माने जाते हैं। नेपाल और बंगाल के निकट होने के कारण यहां अवैध आवाजाही का मुद्दा समय-समय पर राजनीतिक बहस का केंद्र रहा है।
शाह का यह बयान केवल प्रशासनिक कार्रवाई की घोषणा नहीं है; यह एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश भी है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और जनसांख्यिकीय संतुलन का प्रश्न अब चुनावी एजेंडा बनेगा।
बंगाल चुनाव से पहले रणनीतिक आक्रामकता
पश्चिम बंगाल में घुसपैठ का मुद्दा लंबे समय से भाजपा की राजनीतिक रणनीति का हिस्सा रहा है। 2019 के लोकसभा चुनाव और 2021 के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा ने इसे प्रमुख मुद्दा बनाया था।
अब शाह का यह कहना कि “बंगाल में हम इसी मुद्दे पर चुनाव लड़ेंगे और जीतते ही सबसे पहले घुसपैठियों को खदेड़ेंगे”, संकेत देता है कि पार्टी इस नैरेटिव को और तेज करने जा रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, सीमांचल और बंगाल के सीमावर्ती जिलों में जनसांख्यिकीय बदलाव का सवाल भाजपा के लिए दोहरा लाभ देता है, एक तरफ राष्ट्रीय सुरक्षा का विमर्श, दूसरी तरफ पहचान की राजनीति का सुदृढ़ीकरण।
‘जनसांख्यिकी बदलाव’ बनाम सामाजिक ताना-बाना
शाह ने अपने भाषण में कहा कि अतिक्रमण और घुसपैठ से होने वाला जनसांख्यिकीय बदलाव किसी भी देश की संस्कृति, इतिहास और भूगोल के लिए खतरनाक है।
यह बयान सीधे तौर पर उस बहस को छूता है जो पिछले कुछ वर्षों में असम, बंगाल और बिहार में उठती रही है। खासकर असम में राष्ट्रीय नागरिक पंजी (NRC) और नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के संदर्भ में यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर उभरा था।
हालांकि बिहार में अभी तक NRC जैसा कोई औपचारिक अभियान लागू नहीं हुआ है, लेकिन सीमांचल को लेकर राजनीतिक बयानबाजी लगातार तेज होती रही है।
केवल मतदाता सूची नहीं, ‘कानूनी निष्कासन’
शाह ने यह भी कहा कि केवल मतदाता सूची से नाम हटाना पर्याप्त नहीं है; अवैध रूप से रह रहे लोगों को कानूनी प्रक्रिया के तहत देश से बाहर भेजना आवश्यक है।
यहां दो बड़े सवाल उभरते हैं:
पहचान की प्रक्रिया क्या होगी?
निष्कासन की कानूनी और कूटनीतिक जटिलताएं कैसे सुलझेंगी?
भारत-बांग्लादेश सीमा पर पहले भी अवैध प्रवासियों की पहचान और प्रत्यर्पण को लेकर कई स्तरों पर बातचीत होती रही है। लेकिन बड़े पैमाने पर निष्कासन की प्रक्रिया व्यवहारिक रूप से अत्यंत जटिल मानी जाती है… क्योंकि इसके लिए दस्तावेजी प्रमाण, न्यायिक प्रक्रिया और पड़ोसी देश की सहमति, तीनों आवश्यक होते हैं।
राशन, रोजगार और चुनावी प्रभाव का तर्क
शाह ने घुसपैठ को गरीबों के राशन और युवाओं के रोजगार से जोड़ा। यह राजनीतिक रूप से प्रभावी तर्क है, क्योंकि इससे मुद्दा केवल सुरक्षा का नहीं, बल्कि आर्थिक प्रतिस्पर्धा और संसाधनों के बंटवारे का बन जाता है।
हालांकि अर्थशास्त्रियों का एक वर्ग मानता है कि अवैध प्रवासन का वास्तविक आर्थिक प्रभाव क्षेत्र विशेष और सेक्टर विशेष पर निर्भर करता है। अनौपचारिक श्रम बाजार में सस्ते श्रम की उपलब्धता और स्थानीय रोजगार पर असर, दोनों पहलू जटिल और बहुआयामी हैं।
अवैध धार्मिक ढांचे और संवेदनशीलता
शाह ने सीमावर्ती क्षेत्रों में हाल के वर्षों में बने कथित अवैध धार्मिक ढांचों की रिपोर्ट भी मांगी है। यह बयान संकेत देता है कि प्रशासनिक कार्रवाई केवल घुसपैठ तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि भूमि और संरचनात्मक अतिक्रमण पर भी केंद्रित हो सकती है।
लेकिन यह क्षेत्र सामाजिक रूप से अत्यंत संवेदनशील है। किसी भी प्रकार की कार्रवाई का स्थानीय सामाजिक सौहार्द और कानून-व्यवस्था पर सीधा प्रभाव पड़ सकता है।
निर्णायक दौर या चुनावी ध्रुवीकरण?
सवाल यह है कि क्या यह अभियान वास्तविक प्रशासनिक प्रक्रिया में बदल पाएगा, या फिर चुनावी ध्रुवीकरण का औजार बनेगा?
बिहार, बंगाल और झारखंड में जनसांख्यिकी के मुद्दे को लेकर उच्च स्तरीय समिति बनाने की घोषणा यह दर्शाती है कि केंद्र सरकार इसे संस्थागत रूप देना चाहती है। लेकिन राजनीतिक पर्यवेक्षक यह भी मानते हैं कि सीमांचल जैसे इलाकों में इस मुद्दे का सीधा असर वोटिंग पैटर्न पर पड़ सकता है।
स्पष्ट है कि घुसपैठ का सवाल अब केवल सीमा सुरक्षा का विषय नहीं रहा; यह राष्ट्रीय सुरक्षा, संसाधन वितरण, सांस्कृतिक पहचान और चुनावी गणित… चारों के संगम पर खड़ा मुद्दा बन चुका है।
आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह आक्रामक बयानबाजी प्रशासनिक कार्रवाई में कितनी बदलती है, और कितनी चुनावी मंचों पर ही सीमित रह जाती है।


























