दही-चूड़ा, बिखरता कुनबा और सियासी अस्तित्व: क्या ‘दावत’ से बचेगा लालू परिवार का वजूद? क्योंकि जान लीजिए कि राजनीति में सहानुभूति की भी एक्सपायरी डेट होती है!

न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
एक दौर था जब पटना के 10, सर्कुलर रोड पर मकर संक्रांति की धूप महकती थी। लालू प्रसाद यादव खुद अतिथियों के माथे पर दही का तिलक लगाते थे। वह सिर्फ एक भोज नहीं था, वह बिहार की राजनीति का ‘पावर सेंटर’ था जहाँ धुर विरोधी भी एक थाली में दही-चूड़ा सानते नजर आते थे। लेकिन आज? साल 2026 की यह संक्रांति राजद के लिए वैसी नहीं है। सत्ता हाथ से जा चुकी है, पार्टी की साख अदालती टिप्पणियों में उलझी है और ‘अपनों’ की रार सड़क पर है। सवाल बड़ा है, क्या महज एक भोज से बिखरती विरासत को समेटा जा सकता है? तेजप्रताप दही-चूड़ा के आयोजन में लगे हैं। वे तमाम पार्टियों के लोगों को न्यौता भेज रहे हैं।
कहते हैं कि जब घर की दीवारें दरकने लगें, तो बाहर वाले तमाशा देखते ही हैं। तेजस्वी, तेजप्रताप और अब रोहिणी आचार्य… इन तीन कोनों में बंटी राजद की शक्ति अब एकजुट होने के बजाय एक-दूसरे को ही काटने में लगी है। रोहिणी की बढ़ती सक्रियता ने घर के भीतर शक्ति के नए केंद्र बना दिए हैं, तो तेजप्रताप का ‘अंदाज’ पार्टी के लिए अक्सर असहजता पैदा करता रहा है। जो परिवार कभी एकता की मिसाल बनकर ‘सामाजिक न्याय’ का झंडा थामे था, वह आज विरासत की जंग में खुद उलझा हुआ है।
राजद के पतन की सबसे बड़ी वजह जो राजनैतिक गलियारों में चर्चा का विषय है, वह है तेजस्वी यादव के इर्द-गिर्द खड़ा एक खास ‘कॉकस’। संजय यादव और रमीज जैसे नामों पर आरोप लगते रहे हैं कि इन्होंने तेजस्वी को जमीन से काटकर ‘ड्राइंग रूम पॉलिटिक्स’ तक सीमित कर दिया है। पुराने दिग्गज नेता किनारे लगा दिए गए और समर्पित कार्यकर्ता अब खुद को ‘बेगाना’ महसूस करता है। जब सेनापति और सैनिक के बीच सलाहकारों की अभेद्य दीवार खड़ी हो जाए, तो युद्ध के मैदान में हार ही नसीब होती है। हालिया चुनावी शिकस्त इसी प्रशासनिक और राजनैतिक विफलता का प्रमाण है।
अदालत की वह टिप्पणी… ‘क्रिमिनल सिंडिकेट’, राजद के लिए किसी वज्रपात से कम नहीं है। जिस पार्टी ने गरीबों को ‘स्वर’ देने का वादा किया था, उस पर आज ‘संगठित भ्रष्टाचार’ का आरोप चस्पा है। तेजस्वी पर लगा यह दाग और चुनाव में पार्टी की करारी हार ने यह साबित कर दिया है कि अब सिर्फ ‘लालू’ के नाम पर वोट बैंक को बांधे रखना मुमकिन नहीं है। जनता अब सवाल पूछ रही है, और दावतों का शोर इन सवालों को दबा नहीं सकता।
राजनीति में सहानुभूति की एक्सपायरी डेट होती है। दही-चूड़ा का भोज एक परंपरा हो सकती है, लेकिन यह कोई राजनैतिक संजीवनी नहीं है। अगर तेजस्वी को अपना सियासी वजूद बचाना है, तो उन्हें अपने सलाहकारों की चौकड़ी से बाहर निकलकर कार्यकर्ताओं के बीच जाना होगा। उन्हें अपने घर की कलह को बंद कमरों में सुलझाना होगा और कोर्ट के गंभीर आरोपों का राजनैतिक जवाब तलाशना होगा। वरना, बिहार की बदलती राजनीति में ‘लालटेन’ की लौ अब धुंधली पड़ने लगी है।