कोसी के कछार में उतरे ‘सात समंदर पार’ के मेहमान : बिहार की नदियों में 76 प्रजातियों का डेरा, क्या यह बदलते पर्यावरण का शुभ संकेत है?

न्यूज स्कैन ब्यूरो, सहरसा
बिहार की फिजा बदल रही है। जिस कोसी नदी को हम अक्सर बाढ़ और तबाही के लिए याद करते हैं, वह आज जैव-विविधता का एक शानदार अध्याय लिख रही है। मंगोलिया के ठंडे रेगिस्तान से लेकर आर्कटिक की बर्फीली हवाओं को चीरते हुए हजारों पक्षियों ने बिहार को अपना ‘विंटर होम’ बना लिया है। सहरसा के कोसी दियारा क्षेत्र में हाल ही में हुए एक सर्वेक्षण के नतीजे बताते हैं कि बिहार का यह इलाका अब ‘सेंट्रल एशियन फ्लाईवे’ का एक महत्वपूर्ण पड़ाव बन गया है।
सहरसा के नवहट्टा से सलखुआ तक, कोसी नदी के लगभग 35 किलोमीटर के दायरे में वन विभाग और पक्षी विशेषज्ञों की टीम ने एक व्यापक सर्वे किया। एशियन वाटरबर्ड प्री-सेंसस 2025 के तहत किए गए इस सर्वे के आंकड़े चौंकाने वाले और सुखद हैं। करीब 3200 प्रवासी पक्षी इस क्षेत्र में देखे गए हैं। विशेषज्ञों ने कुल 76 अलग-अलग प्रजातियों की पहचान की है। पिछले साल की गणना के मुकाबले यह संख्या दोगुनी से भी ज्यादा है।

कौन-कौन से ‘वीआईपी गेस्ट’ पहुंचे बिहार?
इस सर्वे में कुछ बेहद दुर्लभ और विशेष पक्षी देखे गए हैं, जो हजारों किलोमीटर की उड़ान भरकर यहां पहुंचे हैं। बार हेडेड गूज हैं जो तिब्बत और मंगोलिया से आए हैं। इनकी खासियत यह है कि ये दुनिया के सबसे ऊंचाई पर उड़ने वाले पक्षी हैं, जो हिमालय को भी पार कर लेते हैं। हेन हरियर हैं जो यूरोप और साइबेरिया के जंगलों से निकलकर ये बिहार के खुले मैदानों में पहुंचे हैं।डनलिम हैं जो आर्कटिक क्षेत्र (ध्रुवीय इलाकों) से आते हैं और यहां की सर्दी को अपने लिए ‘गर्म’ मानते है।शॉर्ट इयर्ड उल्लू हैं जो छोटे कान वाले होते हैं।

पर्यावरण की दृष्टि से इस आगमन के क्या मायने क्या हैं?
सिर्फ पक्षियों का आना ही खबर नहीं है, बल्कि उनके आने का ‘कारण’ पर्यावरण विज्ञान की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है।

  1. हेल्दी इकोसिस्टम का प्रमाण:
    पक्षी और डॉल्फिन किसी भी नदी तंत्र की सेहत के सबसे बड़े बैरोमीटर (मापक) होते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, सर्वे टीम को कोसी नदी में न सिर्फ पक्षी, बल्कि गांगेय डॉल्फिन और विभिन्न प्रजातियों के कछुए भी मिले।
    यह बताता है कि कोसी के इस हिस्से में पानी की गुणवत्ता बेहतर है और नदी का पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) समृद्ध है। मछलियों की प्रचुरता है, तभी पक्षी और डॉल्फिन दोनों वहां टिके हैं।
  2. वेटलैंड्स का पुनर्जीवन:
    बिहार के वेटलैंड्स (आर्द्रभूमि) और दियारा क्षेत्र सुरक्षित हो रहे हैं। मानवीय दखल के बावजूद अगर 76 प्रजातियां मिल रही हैं, तो इसका मतलब है कि पक्षियों को यहां सुरक्षा और भोजन दोनों मिल रहा है।
  3. ग्लोबल वार्मिंग के बीच राहत:
    दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन के कारण पक्षियों ने अपने रास्ते बदले हैं। ऐसे में अगर वे बिहार आ रहे हैं, तो यह राज्य के लिए गर्व की बात है कि हमारा पर्यावरण अभी भी उन्हें सहारा देने में सक्षम है।

सहरसा के डीएफओ भरत चिन्तपल्ली और बर्ड मैन अरविंद मिश्रा के नेतृत्व में हुआ यह सर्वे एक शुरुआत है। पर्यावरणविदों का मानना है कि इन ‘अतिथि देवो भव:’ की परंपरा को बनाए रखने के लिए हमें नदियों में प्रदूषण (जैसा कि गंगा में देखा जा रहा है) को रोकना होगा और शिकार की घटनाओं पर लगाम लगानी होगी।
कोसी की धारा में इन विदेशी पक्षियों का कलरव यह गवाही दे रहा है कि अगर हम प्रकृति को थोड़ा सा मौका दें, तो वह खुद को संवारने की अद्भुत क्षमता रखती है। बिहार अब सिर्फ नक्शे पर एक राज्य नहीं, बल्कि ग्लोबल एविएशन मैप पर पक्षियों का एक सुरक्षित ‘रनवे’ बन चुका है।