मानसून की बेरुखी और सिंचाई संकट के चलते बिहार में इस बार धान की खेती पर सूखे का साया मंडरा रहा है। कृषि विभाग के लक्ष्य 37 लाख हेक्टेयर के मुकाबले राज्य भर में अब तक केवल 39% ही रोपनी हो सकी है। सबसे बदतर स्थिति दक्षिण बिहार की है, जहाँ नवादा, जमुई, भोजपुर, औरंगाबाद और मुंगेर जैसे जिलों में रोपनी का आंकड़ा 5% भी नहीं पहुँच पाया है। खेतों में दरारें पड़ रही हैं और नर्सरी में तैयार बिचड़े पानी के अभाव में पीले पड़कर सूख रहे हैं, जिससे न केवल किसानों की लागत डूब रही है बल्कि राज्य में चावल की कीमतों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर पड़ना तय माना जा रहा है। राज्य में अब तक महज 39% रोपनी हुई है। दक्षिण बिहार में सूखे जैसे हालात होते जा रहे हैं। संकट यह भी कि भूजल का स्तर तेजी से गिर रहा है।
न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
मानसून की बेरुखी और सिंचाई के गहराते संकट ने बिहार के किसानों की कमर तोड़ दी है। राज्य में खरीफ सीजन के दौरान 37 लाख हेक्टेयर में धान बोने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा गया था, लेकिन आलम यह है कि जुलाई का तीसरा हफ्ता बीतने के बावजूद राज्य में महज 39 प्रतिशत रोपनी ही हो सकी है। सबसे भयावह स्थिति दक्षिण और मध्य बिहार की है, जहां नवादा, जमुई, भोजपुर, मुंगेर और औरंगाबाद समेत पांच जिलों में रोपनी का आंकड़ा 5 प्रतिशत भी पार नहीं कर पाया है। खेतों में दरारें पड़ रही हैं और नर्सरी में तैयार बिचड़े पानी के अभाव में पीले पड़कर सूख रहे हैं।
उत्तर बिहार हरा-भरा, दक्षिण बिहार में पानी को तरस रहे खेत
कृषि विभाग के ताजा आंकड़ों से राज्य में एक गहरा क्षेत्रीय विभाजन साफ नजर आ रहा है। उत्तर बिहार के चंपारण और सीमांचल इलाकों में नदियों और स्थानीय बारिश के भरोसे रोपनी काफी हद तक गति पकड़ चुकी है:
पश्चिम चंपारण: 97% | किशनगंज: 90% | सहरसा: 82%
कटिहार: 75% | गोपालगंज: 75% | मुजफ्फरपुर: 67%
इसके ठीक विपरीत, दक्षिण एवं मध्य बिहार के जिलों की स्थिति अत्यंत चिंताजनक है:
नवादा: 1% | जमुई: 1% | भोजपुर: 3%
मुंगेर: 3% | औरंगाबाद: 4% | लखीसराय: 5%
जानिए कि इसका असर क्या होगा?
धान रोपनी में हो रही यह अभूतपूर्व देरी सिर्फ इस सीजन की फसल तक सीमित नहीं रहने वाली है। इसका सीधा असर राज्य की समूची ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।
- बिचड़े की ओवर-एजिंग और उपज में 40% तक की भारी गिरावट
धान की पौध यानी बिचड़ा रोपने की आदर्श समय-सीमा 20 से 25 दिन मानी जाती है। बारिश न होने से किसानों के बिचड़े अब 40 दिन से भी अधिक पुराने हो चुके हैं। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, अतिपक्व (Over-aged) बिचड़ों को खेत में लगाने पर पौधों में कल्ले फूटने की क्षमता काफी घट जाती है, जिससे कुल पैदावार में 25% से 40% की सीधी कमी आ सकती है। - सिंचाई लागत 5,000 रु/एकड़ तक बढ़ी
नहरों के टेल-एंड तक पानी न पहुंचने के कारण किसान निजी डीजल पंपसेट और बोरिंग के जरिए खेतों में पानी भरने को मजबूर हैं। इससे धान की शुरुआती सिंचाई की लागत 3,000 रुपये से 5,000 रुपये प्रति एकड़ तक बढ़ गई है। जिन किसानों ने निजी सिंचाई के बल पर शुरुआती रोपनी की भी थी, बारिश न होने पर उनके खेत सूख रहे हैं और पूरी इनपुट पूंजी (बीज, खाद, मजदूरी) डूब गई है। - गहराता वाटर लेबल और भीषण पेयजल संकट की आहट
बारिश न होने के कारण पूरे राज्य में बोरिंग के जरिए लगातार भूजल खींचा जा रहा है। दक्षिण बिहार के मैदानी व पठारी इलाकों में लगातार बोरिंग चलने से ग्राउंड वाटर लेबल तेजी से नीचे गिर रहा है। यदि जल्द बारिश नहीं हुई तो अगस्त-सितंबर में सिंचाई के साथ-साथ चापाकलों के सूखने से भीषण पेयजल संकट उत्पन्न हो जाएगा। - चावल के दामों में 20% तक उछाल की आशंका
राज्य में धान उत्पादन में भारी गिरावट का असर खुले बाजार में चावल की कीमतों पर पड़ेगा। बाजार विशेषज्ञों का अनुमान है कि आने वाले महीनों में चावल के खुदरा दामों में 15% से 20% तक की तेजी आ सकती है, जिससे आम आदमी का रसोई बजट बिगड़ेगा। साथ ही, सरकार के अधप्राप्ति (Procurement) लक्ष्य भी प्रभावित होंगे। - मौसमी पलायन और रबी फसल चक्र का बिगड़ना
रोपनी का काम ठप होने से भूमिहीन कृषि मजदूरों के हाथ खाली हैं। काम न मिलने के कारण ग्रामीण क्षेत्रों से पंजाब, हरियाणा और दिल्ली की ओर मौसमी पलायन शुरू हो गया है। इसके अलावा, धान की कटाई में देरी होने से आगामी रबी फसल (गेहूं और सरसों) की बोआई में भी देरी होगी, जिससे पूरा फसल चक्र प्रभावित होगा।
सरकार का क्या है रुख और क्या होने चाहिए कदम?
कृषि विभाग के अनुसार, नहर वाले क्षेत्रों में पचवन और पटवन के माध्यम से सिंचाई उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं। हालांकि, स्थिति को देखते हुए निम्नलिखित तत्काल कदमों की दरकार है :
डीजल सब्सिडी का तुरंत वितरण: किसानों को बिना कागजी अड़चनों के शत-प्रतिशत डीजल अनुदान दिया जाए।
कृषि फीडरों को 18 घंटे बिजली: गांवों में कृषि विद्युत फीडरों को कम से कम 18 घंटे अबाध बिजली आपूर्ति दी जाए ताकि बोरिंग चलाने की लागत कम हो सके।
वैकल्पिक फसल योजना: जिन क्षेत्रों में 5% से कम रोपनी हुई है, वहां तुरंत मक्का, उड़द, मूंग और कुलथी जैसी कम पानी वाली वैकल्पिक फसलों के निशुल्क बीज बांटे जाएं।
































