बदहाल स्कूल, बेहाल छात्र… और शिक्षा विभाग में 35 करोड़ का ‘खेला’: वेतन-HRA के नाम पर कैसे लुट गया खजाना? क्या सरकार हो रही थी?

एक तरफ सरकारी स्कूलों की छतें टपक रही हैं, बच्चों के पास बैठने के लिए ढंग की बेंच नहीं है और पीने के पानी से लेकर शौचालयों तक की स्थिति रुलाने वाली है। अक्सर दलील दी जाती है कि ‘विभाग के पास फंड नहीं है’। लेकिन ठहरिए! उसी शिक्षा विभाग के भीतर वेतन और मकान किराया भत्ता के नाम पर 35 करोड़ रुपये की ‘बंदरबांट’ हो जाती है और किसी को कानों-कान खबर तक नहीं होती।

न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
आंतरिक ऑडिट की रिपोर्ट ने जब 7,202 मामलों में अतिरिक्त भुगतान की पोल खोली, तो पूरे महकमे में हड़कंप मच गया है। सवाल यह है कि जब शिक्षा का बुनियादी ढांचा वेंटिलेटर पर है, तब करोड़ों रुपये हवा में कैसे उड़ गए? आखिर सिस्टम की पहरेदारी करने वाली निगरानी व्यवस्था किस नींद में सो रही थी? क्या ये सरकार की पूरी व्यवस्था पर सवाल नहीं है?

7,202 मामलों में 35 करोड़ का अतिरिक्त भुगतान, आखिर कैसे?
शिक्षा विभाग के हालिया आंतरिक ऑडिट ने एक ऐसे वित्तीय गड़बड़झाले को उजागर किया है, जो किसी भी ईमानदार टैक्सपेयर का खून खौलाने के लिए काफी है। रिपोर्ट के मुताबिक, एक-दो नहीं बल्कि पूरे 7,202 मामलों में नियमों को ताक पर रखकर लगभग 35 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भुगतान किया गया। यह पैसा वेतन विसंगतियों और गलत तरीके से HRA (हाउस रेंट अलाउंस) क्लेम करने के नाम पर बांटा गया। यह कोई भूल-चूक नहीं, बल्कि एक सुनियोजित वित्तीय अनियमितता की ओर इशारा करता है। बिना मिलीभगत के इतने बड़े पैमाने पर सरकारी खजाने से पैसा निकालना संभव ही नहीं है।

सिस्टम पर सबसे बड़ा सवाल: कहां सो रहा था निगरानी विभाग?
इस खुलासे ने सबसे बड़ा सवाल सिस्टम की मॉनिटरिंग और निगरानी व्यवस्था पर खड़ा कर दिया है।
जब एक आम शिक्षक या कर्मचारी की छोटी सी फाइल महीनों तक बाबुओं की टेबल पर धूल फांकती है, तो 7 हजार से ज्यादा फाइलों में अतिरिक्त भुगतान कैसे पास हो गया?
क्या बिल पास करने वाले एकाउंटेंट, ट्रेजरी अफसर और जिला स्तर के अधिकारियों की आंखों पर पट्टी बंधी थी?
35 करोड़ रुपये कोई छोटी रकम नहीं होती। इतने बड़े पैमाने पर फंड का फ्लो हो रहा था और विजिलेंस तंत्र को इसकी भनक तक नहीं लगी। यह लापरवाही है या किसी बड़े सिंडिकेट की खामोश सहमति?

स्कूलों की बदहाली मुंह चिढ़ा रही है
यह 35 करोड़ का घोटाला ऐसे समय में सामने आया है, जब सरकारी स्कूलों की ग्राउंड रियलिटी किसी से छिपी नहीं है। आज भी कई स्कूलों में ब्लैकबोर्ड टूट चुके हैं, चॉक-डस्टर के लिए चंदा किया जाता है, और प्रयोगशालाएं कबाड़खाना बन चुकी हैं। जब भी स्कूलों के कायाकल्प की बात आती है, तो बजट का अभाव बताकर पल्ला झाड़ लिया जाता है। जरा सोचिए, इसी 35 करोड़ रुपये से कितने स्कूलों की मरम्मत हो सकती थी? कितने बच्चों को स्मार्ट क्लास और साफ-सुथरे शौचालय मिल सकते थे? यह सिर्फ पैसे की लूट नहीं, बल्कि उन लाखों बच्चों के भविष्य पर डाका है जो सरकारी स्कूलों के भरोसे बैठे हैं।

DEO को नोटिस: क्या सिर्फ दिखावे की कार्रवाई?
मामला तूल पकड़ने के बाद विभाग ने आनन-फानन में जिला शिक्षा पदाधिकारियों (DEO) को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया है। उनसे जवाब तलब किया जा रहा है कि आखिर उनके नाक के नीचे इतना बड़ा खेल कैसे हो गया। लेकिन जनता अब इन रस्मी कागजी कार्रवाइयों की हकीकत जानती है। अक्सर ऐसे मामलों में छोटे कर्मचारियों पर गाज गिराकर बड़ी मछलियों को बचा लिया जाता है।

आगे क्या?
यह सिर्फ एक आंतरिक ऑडिट का ट्रेलर है। अगर इसकी किसी स्वतंत्र जांच एजेंसी से निष्पक्ष और सघन पड़ताल कराई जाए, तो घपले का यह आंकड़ा 35 करोड़ से कहीं आगे जा सकता है। अब देखना यह है कि शिक्षा विभाग सिर्फ ‘कारण बताओ नोटिस’ खेलकर मामले को ठंडे बस्ते में डाल देता है, या उन सफेदपोशों की गर्दन तक पहुंचता है, जिन्होंने बच्चों के हक का पैसा अपनी तिजोरियों में भर लिया।