बिहार के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले आम आदमी, किसानों, मजदूरों और गरीबों के लिए एक बेहद राहत भरी खबर है। अपनी गाढ़ी कमाई से घर चलाने वाले ग्रामीणों पर अब होल्डिंग टैक्स, जल आपूर्ति और साफ-सफाई के नाम पर कोई अतिरिक्त आर्थिक बोझ नहीं पड़ेगा। 15 जुलाई को राज्य कैबिनेट ने गांवों में दो दर्जन से अधिक तरह के टैक्स लगाने के जिस प्रस्ताव पर मुहर लगाई थी, चौतरफा जनविरोध को देखते हुए सरकार अब उसे वापस लेने जा रही है। पंचायती राज विभाग ने इस फैसले में संशोधन की तैयारी कर ली है, जिसके तहत अब गांवों में आम आदमी के बजाय सिर्फ व्यावसायिक गतिविधियों पर ही कर लगाया जाएगा।
न्यूज स्कैन ब्यूरो, पटना
जुलाई में जब यह फैसला आया, तो गांवों में इसके खिलाफ भारी आक्रोश देखने को मिला। आम आदमी जो पहले से ही महंगाई की मार झेल रहा है, उस पर अपने ही पक्के या अर्द्ध-पक्के मकान का टैक्स और हर महीने सफाई-पानी का शुल्क देना एक बड़ा झटका था। विपक्ष भी इस मुद्दे को जोर-शोर से भुनाने की कोशिश कर रहा था। चूंकि अभी तक इस फैसले का गजट प्रकाशित नहीं हुआ था और ना ही अधिसूचना जारी हुई थी, इसलिए सरकार ने समय रहते आम जनता की नाराजगी को भांपते हुए कदम पीछे खींचने और ‘डैमेज कंट्रोल’ करने का बुद्धिमानी भरा फैसला लिया है।
आम आदमी के कितने पैसे बचेंगे?
यदि सरकार अपने पुराने फैसले पर कायम रहती, तो आम ग्रामीणों को निम्नलिखित कर चुकाने पड़ते, जिन्हें अब पूरी तरह हटाने की तैयारी है:
पक्का मकान: 100 रुपये प्रतिवर्ष
अर्द्ध पक्का मकान: 50 रुपये प्रतिवर्ष
(कच्चे मकान पर पहले भी कर नहीं था)
सफाई शुल्क: 30 रुपये प्रति घर (मासिक)
जलापूर्ति शुल्क: 30 रुपये (प्रतिमाह)
पीएम आवास के मकान: 25 रुपये प्रतिवर्ष (हालांकि, यह राशि ग्रामीण विकास विभाग को देनी थी, लेकिन अब इस प्रावधान को भी हटाया जा रहा है।)
अब कहां से आएगा पंचायतों का राजस्व? (सिर्फ इन पर लगेगा टैक्स)
पंचायतों की आय बढ़ाने का बोझ अब आम आदमी के कंधों से हटाकर व्यावसायिक, औद्योगिक और संस्थागत उपयोग वाले भवनों पर डाल दिया गया है। संशोधित प्रावधानों के अनुसार :
व्यावसायिक प्रतिष्ठान: व्यावसायिक और औद्योगिक उपयोग वाले भवनों पर सालाना 100 रुपये से लेकर 5,000 रुपये तक का कर लगेगा। साथ ही ‘पेशा शुल्क’ (Professional Tax) भी वसूला जाएगा।
5,000 रुपये सालाना टैक्स वाले बड़े व्यवसाय: पेट्रोल पंप, रसोई गैस एजेंसी, ईंट चिमनी, सिनेमा हॉल, विवाह भवन, होटल और 2 टन प्रति घंटा से अधिक क्षमता वाले चावल मिलों पर सालाना 5,000 रुपये का शुल्क तय किया गया है।
अन्य प्रावधान : ग्रामीण मेलों में पशुओं की बिक्री पर शुल्क लगेगा। इसके अलावा, पंचायत क्षेत्रों में मकान निर्माण कार्य के लिए आवश्यकतानुसार पंचायतों को कर वसूलने का अधिकार होगा।
(राहत की बात यह है कि संशोधन के बाद व्यावसायिक करों की इन दरों में भी कुछ कमी की जा सकती है।)
आखिर यह टैक्स थोपा क्यों गया था?
दरअसल, 16वें केंद्रीय वित्त आयोग ने देश भर की पंचायतों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए कर लगाने की सख्त अनुशंसा की थी। आयोग का सुझाव था कि ग्रामीण इलाकों में प्रत्येक घर से सालाना औसतन 1200 रुपये वसूले जाएं। इसी लक्ष्य को पूरा करने के लिए सरकार ने यह कदम उठाया था, लेकिन यह आम जनता की जमीनी हकीकत से मेल नहीं खा सका।
आंकड़ों की नजर में इस फैसले का इम्पैक्ट :
8 करोड़ से अधिक: उन आम लोगों की संख्या, जिन्हें इस कर-वापसी से सीधा फायदा होगा।
10 करोड़ से अधिक: सूबे के गांवों में निवास करने वाली कुल आबादी।
45,103: पूरे बिहार में गांवों की कुल संख्या।
8,049: बिहार में त्रि-स्तरीय पंचायतों की संख्या, जिनके कर-ढांचे में यह बड़ा बदलाव होगा।
लोकतंत्र में नीतियां वही सफल होती हैं, जो आम आदमी के हितों को ध्यान में रखकर बनाई जाएं। बिहार सरकार का यह ‘यू-टर्न’ स्पष्ट करता है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में अभी वह मजबूती नहीं आई है कि आम आदमी पर शहरी तर्ज पर हाउस टैक्स या यूटिलिटी टैक्स थोपा जा सके। अब पंचायतों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए सिर्फ व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर ही निर्भर रहना होगा।
































